मोहिंद्र प्रताप सिंह राणा/ग्राम परिवेश
खुद को सियासत में ‘पैराशूट से उतरा हुआ’ कहने वाले बेबाक भवानी सिंह पठानिया ने अपनी राजनीतिक पारी की शुरुआत ही उस सवाल से की है, जो कांगड़ा की सियासत में लंबे समय से हाशिये पर पड़ा रहा—कांगड़ा की आर्थिक बदहाली आखिर क्यों? तर्कों की धार, तथ्यों के ठोस आधार और राजनीतिक तंज की शमशीर से पठानिया सदन में कई बार विपक्ष को जवाबदेही के घेरे में खड़ा कर चुके हैं। उनकी शैली में शोर कम और तथ्य अधिक हैं; तंज में चुभन है, लेकिन निशाना मुद्दा होता है।
कांगड़ा की राजनीतिक यात्रा में बक्शी प्रताप सिंह से लेकर पंडित संत राम शर्मा, चौधरी हरदयाल और किशन कपूर तक अनेक राजनीतिक चेहरे आए। किसी ने सत्ता के गलियारों में अपनी पहचान फील्ड मार्शल की बनाई तो किसी ने नेता विशेष का हनुमान बनकर संगठन और सरकार में अपनी पकड़ मजबूत की। पद बदले, चेहरे बदले, सियासी पीढ़ियां बदलीं, लेकिन पठानिया के तर्क के मुताबिक कांगड़ा की आर्थिक तस्वीर बदलने की प्राथमिकता राजनीति के केंद्र में नहीं आ सकी। पद और प्रतिष्ठा के इर्द-गिर्द घूमती राजनीति में कांगड़ा और कांगड़ियों की आर्थिक संभावनाएं अपेक्षित राजनीतिक विमर्श नहीं बन पाईं।
यहीं से पठानिया की सोच सदन में अपना अलग सुर पकड़ती दिखाई देती है। उन्होंने अपनी राजनीतिक पारी की पहली बड़ी दस्तक कांगड़ा की आर्थिक सूरत बदलने के सवाल से दी। सदन में कांगड़ा की प्रति व्यक्ति आय के आंकड़े रखकर उन्होंने केवल एक आंकड़ा नहीं पढ़ा, बल्कि प्रदेश की आर्थिक असमानता का वह आईना सामने रखा, जिसमें हिमाचल के सबसे बड़े जिले की तस्वीर साफ दिखाई देती है।
फतेहपुर के विधायक पठानिया ने सदन में कहा कि हिमाचल प्रदेश के सबसे बड़े जिला कांगड़ा की प्रति व्यक्ति आय जिला सोलन की करीब छह लाख रुपये की तुलना में महज 1.20 लाख रुपये है। आंकड़े को तर्क का आधार बनाते हुए उनका सवाल सीधा था—यदि हिमाचल को देश के सबसे समृद्ध राज्यों की कतार में खड़ा करना है तो कांगड़ा के आर्थिक नक्शे को बदले बिना यह लक्ष्य कैसे हासिल होगा?
कांगड़ा की विडंबना यही है कि जिस जिले की पहचान पहले कभी आम, लीची, धान और चाय के उत्पादन से होती थी, वही जिला आज बागवानी की संभावनाओं के दोहन में पिछड़ता दिखाई देता है। प्राकृतिक संपदा मौजूद है, कृषि की जमीन मौजूद है, विविध जलवायु मौजूद है, बाजार की संभावनाएं मौजूद हैं—कमी उस समन्वित आर्थिक दृष्टि की रही, जो इन संसाधनों को रोजगार, निवेश और आय में बदल सके।
पर्यटन कांगड़ा की दूसरी बड़ी संभावना है। धार्मिक, प्राकृतिक और सांस्कृतिक विविधता के साथ जिले के पास सड़क, रेल और हवाई संपर्क भी है। भौगोलिक स्थिति इसे वर्षभर पर्यटन की व्यापक संभावनाएं देती है। यानी कांगड़ा के पास संसाधनों की कमी नहीं, उन्हें आर्थिक शक्ति में बदलने वाली राजनीतिक प्राथमिकता और प्रभावी क्रियान्वयन की जरूरत है।
लेकिन पठानिया की सोच व सियासत का दायरा केवल कांगड़ा की चौहद्दी तक सीमित नहीं है। प्रदेश की अर्थव्यवस्था, ग्रामीण विकास और किसान के खेत से लेकर देश की कृषि नीति तक के सवालों पर भी उनकी बहस आंकड़ों, तर्कों और राजनीतिक व्यंग्य के सहारे आगे बढ़ती है। राजस्व घाटा अनुदान यानी आरडीजी का सवाल हो, सुक्खू सरकार की ग्रामीण विकास नीतियां हों, मनरेगा की कार्यप्रणाली को लेकर बहस हो या एमएसपी के दायरे में हल्दी, दूध, अदरक, मक्का, गेहूं और जौ जैसे कृषि उत्पादों का सवाल—पठानिया मुद्दे को सतह पर नहीं छोड़ते, उसके आर्थिक और राजनीतिक संदर्भ तक जाने की कोशिश करते हैं।
सदन में उनकी शैली का एक और पहलू अक्सर दिखाई देता है। विपक्ष जब उन्हें किसी मुद्दे पर घेरने की कोशिश करता है तो पठानिया जवाब को केवल प्रतिवाद तक सीमित नहीं रखते। तथ्य सामने रखते हैं, तर्क को आगे बढ़ाते हैं और फिर उसी मुद्दे पर ऐसा राजनीतिक तंज कसते हैं, जिसकी चुभन देर तक बनी रहती है। उनकी भाषा तीखी जरूर होती है, लेकिन मर्यादा की सीमा नहीं लांघती। यही कारण है कि कई मौकों पर जिस बहस की शुरुआत उन्हें घेरने से होती है, उसका रुख अंततः विपक्ष की ही राजनीतिक असहजता की ओर मुड़ता दिखाई देता है।
यही पठानिया की राजनीतिक शैली का दिलचस्प पक्ष है—वे बहस को हंगामे में नहीं, तर्क में बदलते हैं और तंज को हथियार की तरह नहीं, राजनीतिक प्रत्युत्तर की धार की तरह इस्तेमाल करते हैं। उनकी बेबाकी केवल बोलने की बेबाकी नहीं, बल्कि आंकड़ों को राजनीतिक सवाल में बदलने की बेबाकी है।
पठानिया के तर्क का मूल बिंदु भी यही है—कांगड़ा को केवल राजनीतिक संख्या नहीं, आर्थिक शक्ति के केंद्र के रूप में देखने की जरूरत है। इस दिशा में मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू द्वारा कांगड़ा को पर्यटन और विकास की नई धुरी के रूप में आगे बढ़ाने की पहल को वह राजनीतिक इच्छाशक्ति के रूप में रेखांकित करते हैं।
इसी क्रम में उन्होंने अपने विशिष्ट अंदाज में कांगड़ा के सभी विधायकों का आह्वान किया कि वे सरकार की परियोजनाओं को केवल घोषणाओं और कोसने के रूप में न देखें, बल्कि उन्हें समझें, उनकी दिशा और उपयोगिता को जानें और अपने-अपने क्षेत्रों में उन्हें जमीन पर उतारने के लिए सक्रिय भूमिका निभाएं। क्योंकि विकास की असली कसौटी सदन में कही गई बात नहीं, बल्कि जमीन पर दिखाई देने वाला बदलाव है।
भवानी सिंह पठानिया की सियासत का यह पक्ष उन्हें महज बेबाक वक्ता से आगे ले जाता है। तथ्यों को तर्क में, तर्क को सवाल में और सवाल को राजनीतिक विमर्श में बदल देना उनकी शैली की खासियत बनती जा रही है। कांगड़ा की आर्थिक तस्वीर हो या प्रदेश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था, किसान की फसल हो या सरकार की नीतियां—पठानिया की सियासी भाषा में मुद्दे की गर्मी के साथ आंकड़ों की ठंडक भी दिखाई देती है। यही संयोजन उनकी बेबाकी को महज बयानबाजी से अलग करता है।