मोहिंद्र प्रताप सिंह राणा
संपादक ग्राम परिवेश

सर्वोच्च न्यायालय ने पंजाब और हरियाणा को 20 वर्षों तक प्रतिवर्ष लगभग 598 मिलियन यूनिट बिजली देने के निर्देश दिए; 420.77 करोड़ रुपये की पूंजीगत देनदारी का बिजली में होगा समायोजन

नई दिल्ली, 6 नवंबर। भाखड़ा-नंगल और ब्यास जलविद्युत परियोजनाओं में हिमाचल प्रदेश के 7.19 प्रतिशत हिस्से को लेकर करीब छह दशक से चले आ रहे अंतरराज्यीय विवाद पर सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णायक व्यवस्था देते हुए पंजाब और हरियाणा को हिमाचल प्रदेश के हिस्से की 11,973 मिलियन यूनिट बिजली आगामी 20 वर्षों में उपलब्ध करवाने के निर्देश दिए हैं। इस फैसले के साथ वर्ष 1966 से चली आ रही हिस्सेदारी और बकाया बिजली की गणना से जुड़ी लंबी कानूनी लड़ाई को अंतिम निष्कर्ष तक पहुंचाने का रास्ता साफ हो गया है। न्यायालय ने केंद्र सरकार के नकद रहित निपटान प्रस्ताव को स्वीकार करते हुए हिमाचल की परियोजनाओं में पूंजीगत लागत की देनदारी को भी बिजली के बकाये से समायोजित करने का निर्णय सुनाया है।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत तथा न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने स्पष्ट किया कि पंजाब और हरियाणा अगले 20 वर्षों तक प्रत्येक वर्ष अक्टूबर से मार्च के बीच के कम बिजली उत्पादन वाले मौसम (लीन सीजन) में हिमाचल को लगभग 598 मिलियन यूनिट बिजली उपलब्ध करवाएंगे। इस अवधि में भाखड़ा-नंगल परियोजना की बिजली का दायित्व पंजाब और हरियाणा के बीच 58:42 तथा ब्यास परियोजनाओं का 60:40 के अनुपात में रहेगा। हिमाचल प्रदेश को प्राप्त होने वाली प्रत्येक वार्षिक खेप के लिए संबंधित वर्ष में भाखड़ा ब्यास प्रबंधन बोर्ड (बीबीएमबी) द्वारा निर्धारित दरों के अनुसार भुगतान करना होगा।

420.77 करोड़ की देनदारी का बिजली में समायोजन

न्यायालय ने हिमाचल प्रदेश की भाखड़ा-नंगल और ब्यास परियोजनाओं की कुल पूंजीगत लागत में 7.19 प्रतिशत हिस्सेदारी की देनदारी 420.77 करोड़ रुपये निर्धारित की है। इसमें पंजाब के हिस्से की देनदारी 249.23 करोड़ रुपये और हरियाणा की 171.55 करोड़ रुपये आंकी गई है। यह राशि वर्ष 1966-67 से पंजाब और हरियाणा द्वारा चुकाए गए ऋणों की उस आनुपातिक पूंजीगत लागत से संबंधित है, जिसका पुनर्भुगतान हिमाचल की हिस्सेदारी के अनुरूप होना शेष था।

इस देनदारी को नकद में वसूलने अथवा अलग से भुगतान करने के बजाय न्यायालय ने बिजली के बकाये में ही समायोजित करने का निर्देश दिया है। इसके लिए बिजली का मूल्य 3.85 रुपये प्रति यूनिट निर्धारित किया गया है। इस दर से 420.77 करोड़ रुपये के बराबर लगभग 1,093 मिलियन यूनिट बिजली हिमाचल के कुल बकाये से घटाई जाएगी।

केंद्र सरकार की गणना के अनुसार हिमाचल प्रदेश को कुल 13,066 मिलियन यूनिट बिजली मिलनी थी। पूंजीगत लागत के समायोजन के बाद शेष 11,973 मिलियन यूनिट बिजली पंजाब और हरियाणा को आगामी 20 वर्षों में लगभग 598 मिलियन यूनिट प्रतिवर्ष की दर से उपलब्ध करवानी होगी। इस प्रकार न्यायालय ने दोनों राज्यों की देनदारी और हिमाचल की पूंजीगत हिस्सेदारी के बीच नकद लेन-देन के बजाय बिजली के माध्यम से संतुलित समाधान निर्धारित किया है।

पंजाब की आपत्तियां न्यायालय ने की खारिज

सुनवाई के दौरान पंजाब सरकार ने केंद्र द्वारा निर्धारित 13,066 मिलियन यूनिट के बकाये पर आपत्ति जताई थी। उसका तर्क था कि हिमाचल को पहले से प्रतिदिन दी जा रही 1.2 लाख यूनिट बिजली का समुचित हिसाब नहीं लगाया गया है और इसे घटाने के बाद वास्तविक बकाया कम होना चाहिए। पंजाब ने पूंजीगत लागत के समायोजन के लिए 3.85 रुपये प्रति यूनिट की दर पर भी सवाल उठाया और इसके स्थान पर परिचालन एवं रखरखाव की दर लागू करने की दलील दी। उसने बकाया बिजली की आपूर्ति के लिए 20 वर्षों की अवधि पर भी आपत्ति की थी।

हालांकि, सर्वोच्च न्यायालय ने इन आपत्तियों को अस्पष्ट और सतही बताते हुए खारिज कर दिया। पीठ ने कहा कि पंजाब की दलीलें 27 सितंबर, 2011 के उस फैसले में पहले ही तय हो चुके मुद्दों को दोबारा खोलने का प्रयास हैं। न्यायालय के अनुसार प्रतिदिन 1.2 लाख यूनिट बिजली की आपूर्ति से संबंधित पहलू को केंद्र सरकार द्वारा तैयार गणना में पहले ही ध्यान में रखा गया है।

गौरतलब है कि केंद्र सरकार ने पहले 15 वर्षों में बकाया बिजली की आपूर्ति का प्रस्ताव रखा था, लेकिन दोनों राज्यों पर एकमुश्त अधिक भार न पड़े और विवाद का व्यावहारिक समाधान निकल सके, इसके लिए सर्वोच्च न्यायालय ने यह अवधि बढ़ाकर 20 वर्ष कर दी। हालांकि, न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि अवधि बढ़ाने का अर्थ हिमाचल के घोषित अधिकार अथवा बकाया हिस्से में किसी प्रकार की कटौती नहीं है।

2011 के फैसले के अनुपालन में हुई दशकों की देरी पर सख्त टिप्पणी

इस प्रकरण का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि सर्वोच्च न्यायालय ने वर्ष 2011 में ही हिमाचल प्रदेश के 7.19 प्रतिशत बिजली हिस्से के अधिकार को मान्यता दे दी थी, लेकिन उस निर्णय के वित्तीय एवं ऊर्जा संबंधी बकाये का निर्धारण और वास्तविक भुगतान लंबे समय तक विवादों में उलझा रहा। इस पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए पीठ ने कहा कि न्यायालय के निर्देश सभी संबंधित पक्षों के लिए बाध्यकारी हैं और उनका बिना किसी शर्त के अनुपालन किया जाना चाहिए।

पीठ ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि कई दशकों से लंबित न्यायिक आदेश को किसी निर्णय के देनदार पक्ष की अनिच्छा अथवा असहयोग के कारण निष्फल नहीं होने दिया जा सकता। न्यायालय ने यह भी टिप्पणी की कि इतने लंबे समय से लंबित विवाद को अंतिम निष्कर्ष तक पहुंचाने के लिए बार-बार न्यायिक समय और संसाधन खर्च करना दुर्भाग्यपूर्ण है। साथ ही सभी संबंधित पक्षों से फैसले की भावना और शब्दशः निर्देशों के अनुरूप क्रियान्वयन सुनिश्चित करने की अपेक्षा जताई।

न्यायालय ने इस विवाद के समाधान के लिए मध्यस्थता के प्रयासों और व्यावहारिक निपटान का ढांचा तैयार करने में भारत के अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी की सतत भूमिका की भी सराहना की।

1996 में शुरू हुई थी हिमाचल की कानूनी लड़ाई

इस विवाद की जड़ें पंजाब पुनर्गठन अधिनियम, 1966 के बाद अस्तित्व में आए नए राज्यों के बीच परिसंपत्तियों और बिजली की हिस्सेदारी के निर्धारण से जुड़ी हैं। हिमाचल प्रदेश का तर्क था कि पूर्ववर्ती अविभाजित पंजाब की जलविद्युत परियोजनाओं में उत्तराधिकारी राज्य होने के नाते उसे भी निर्धारित अनुपात में बिजली का अधिकार मिलना चाहिए। लंबे समय तक आपसी सहमति से समाधान नहीं निकलने पर हिमाचल प्रदेश ने वर्ष 1996 में संविधान के अनुच्छेद 131 के तहत सर्वोच्च न्यायालय में मूल वाद दायर किया था।

27 सितंबर, 2011 को सर्वोच्च न्यायालय ने हिमाचल प्रदेश के पक्ष में फैसला सुनाते हुए उसे भाखड़ा-नंगल परियोजना से 1 नवंबर, 1966 से तथा ब्यास परियोजनाओं से संबंधित इकाइयों में बिजली उत्पादन शुरू होने की तिथियों से 7.19 प्रतिशत हिस्सेदारी का हकदार घोषित किया था। उस समय पंजाब का हिस्सा 51.80 प्रतिशत और हरियाणा का 37.51 प्रतिशत निर्धारित किया गया था, जबकि चंडीगढ़ का हिस्सा 3.50 प्रतिशत तय हुआ था। राजस्थान की हिस्सेदारी मुख्य रूप से पूर्ववत रही थी।

वर्ष 2011 के फैसले के बाद केंद्र सरकार ने बिजली आवंटन में संशोधन की प्रक्रिया शुरू की और वर्ष 2013 में हिमाचल के ऐतिहासिक बकाये की गणना न्यायालय के समक्ष रखी। भाखड़ा-नंगल परियोजना से 8,523 मिलियन यूनिट, ब्यास यूनिट-एक से 3,145 मिलियन यूनिट और ब्यास यूनिट-दो से 1,398 मिलियन यूनिट का हिसाब जोड़कर कुल 13,066 मिलियन यूनिट बकाया निर्धारित किया गया था। पंजाब और हरियाणा की असहमतियों तथा पूंजीगत लागत के पुनर्निर्धारण के चलते इसका निपटारा आगे खिंचता रहा। केंद्र सरकार ने वर्ष 2026 में संबंधित ऋण और पुनर्भुगतान के अभिलेखों के आधार पर पूंजीगत देनदारी का पुनर्निर्माण कर अंतिम समझौता प्रस्ताव न्यायालय के समक्ष रखा।

सर्वोच्च न्यायालय का 6 नवंबर, 2026 का यह निर्णय अब केवल बिजली की बकाया मात्रा निर्धारित करने तक सीमित नहीं है, बल्कि वर्ष 2011 में घोषित अधिकार को वास्तविक लाभ में बदलने की दिशा में अंतिम न्यायिक व्यवस्था भी है। इसके साथ मूल वाद का निस्तारण कर दिया गया है। अब इस फैसले का वास्तविक महत्व पंजाब और हरियाणा द्वारा निर्धारित समय-सारिणी के अनुसार बिजली की नियमित आपूर्ति और हिमाचल प्रदेश को उसके संवैधानिक एवं न्यायिक रूप से मान्य हिस्से का लाभ मिलने से तय होगा।

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