मोहिंद्र प्रताप सिंह राणा: संपादक ग्राम परिवेश साप्ताहिक

भारतीय लोकतंत्र के आधुनिक इतिहास में इससे बड़ा विरोधाभास क्या होगा कि जो सरकार महीनों तक जनता के ज्वलंत सवालों, लाखों मतदाताओं के नाम काटे जाने की टीस (वोट चोरी का मुद्दा) और देश के युवाओं के आक्रोश पर पूर्णतः ‘सुप्त’ और मूकदर्शक बनी रही, वह अचानक अपनी राजनीतिक ढाल तलाशने के लिए अति-सक्रिय हो उठी। जब देश की संसद का पूरा मानसून सत्र बीत गया और सरकार का शीर्ष नेतृत्व राष्ट्रीय राजधानी में मौजूद रहकर भी सदन की दहलीज लांघने का साहस नहीं जुटा सका, तो यह देश की लोकतांत्रिक परंपराओं का एक मूक और दुखद दमन था। यह मौन इस बात का अकाट्य प्रमाण था कि सत्ता के पास न तो विपक्ष के तीखे तर्कों का कोई नैतिक उत्तर था और न ही पीड़ित जनता की आँखों में झांकने का साहस।

परंतु, इस रणनीतिक चुप्पी का अर्थ संवेदनशीलता या पश्चाताप कतई नहीं था; यह दरअसल एक ‘राजनीतिक काट’ और एक ऐसे आख्यान की खोज थी, जो जन-आक्रोश की दिशा को मोड़ सके। कभी चुनाव आयुक्त की प्रेसवार्ताओं के तकनीकी तर्कों के पीछे छिपने की कोशिश की गई, तो कभी न्यायपालिका को एक अभेद्य कवच की तरह इस्तेमाल कर जनता की आवाज को दबाने का प्रयास हुआ। लेकिन जब संस्थागत दबाव भी नाकाम होने लगा और वोट चोरी का जमीनी सच सत्ता को घेरने लगा, तब शासन की इस घबराहट को एक ‘राजनीतिक संजीवनी’ बांग्लादेश शब्द से मिल गई। लैटिन अमेरिका के संदर्भों, वेनेजुएला की घटनाओं, फ्रांस के छात्र आंदोलन और अमेरिकी मुनरो सिद्धांत जैसे विदेशी संदर्भों को खींच-तानकर भारतीय परिदृश्य पर थोपने का एक सुनियोजित और हास्यास्पद सर्कस शुरू कर दिया गया।

यहीं से मुख्यधारा के गोदी मीडिया को वह धुरी मिली, जिसके सहारे उसने ‘वोट चोरी’ जैसे ठोस और बुनियादी मुद्दे को ‘विदेशी ताकतों के रिजीम चेंज’ (Regime Change) के खोखले गुब्बारे में तब्दील करने का राग  अलापना शुरू कर दिया। जो मुद्दा सीधे तौर पर भारत के आम नागरिक के सबसे बड़े संवैधानिक अधिकार—‘मतदान की शुचिता’—से जुड़ा था, उसे रातों-रात एक अंतरराष्ट्रीय साजिश का रंग दे दिया गया, ताकि सरकार को एक ‘पीड़ित’ (Victim) के रूप में पेश किया जा सके।

यह सत्ता का एक अत्यंत चतुर और खतरनाक चक्रव्यूह है, जहाँ बुनियादी प्रशासनिक जवाबदेही और लाखों युवाओं के कटे हुए वोटों की टीस को राष्ट्रवाद के छद्म मुखौटे के पीछे छिपाने का प्रयास किया जा रहा है। सत्ता को यह भली-भांति समझ लेना चाहिए कि विदेशी ताकतों और ‘रिजीम चेंज’ के इस काल्पनिक भय को कब तक आसमान बनाकर पेश किया जाएगा? जमीन का सच यह है कि युवा और देश का नागरिक आज अपनी चुराई गई लोकतांत्रिक ताकत का हिसाब मांग रहा है और इस आवाज को किसी विदेशी साजिश के शोर में दबाया नहीं जा सकता।

सख्त अकादमिक परिभाषा (Strict Academic Definition): शुद्ध राजनीतिक विज्ञान के सिद्धांतों के अनुसार, ‘रिजीम चेंज’  का अर्थ केवल सरकार बदलना नहीं, बल्कि बाहरी ताकतों के हस्तक्षेप या सैन्य बल के सहारे शासन-व्यवस्था को बदलना है। अब प्रश्न उठता है कि भारत की मौजूदा स्थापित सरकार का, किस ताकतवर देश द्वारा वेनेजुएला की तर्ज पर या फंडिंग के सहारे, रिजीम चेंज किया जा रहा है? क्या अमेरिका है, जो मौजूदा सरकार के दावे के अनुसार मित्र राष्ट्र है? क्या पाकिस्तान है, जिसके संबंध में भाजपा के राजस्थान अध्यक्ष मदन राठौड़ ने कहा था कि, “भविष्य में अगर कभी अमेरिका और पाकिस्तान के बीच युद्ध हुआ, तो हम पाकिस्तान के साथ हैं। क्योंकि वह हमारा पड़ोसी है। यह बात हमें समझनी होगी,” या फिर कोई और देश है?

वैश्विक स्तर पर थोपे गए हिंसक सैन्य हस्तक्षेपों और भारत के जन-आंदोलनों के बीच की लकीर संप्रभुता और जनमत के बुनियादी अंतर से तय होती है। जहाँ इराक और वेनेजुएला जैसे देशों में विदेशी बंदूकें और बम शासन तय करते हैं, वहीं भारतवर्ष का इतिहास गवाह है कि यहाँ व्यवस्था केवल नागरिकों के नैतिक बल और ‘मतपेटी की शक्ति’ से बदली है। इसके दो जीवंत गवाह 1977 का जेपी आंदोलन और 2011-14 का अन्ना हजारे आंदोलन हैं, जहाँ दमन और भ्रष्टाचार के खिलाफ लाखों युवा सड़कों पर उतरे, लेकिन इन विशाल संघर्षों की अंतिम परिणति पूरी तरह अहिंसक, संवैधानिक और बैलेट बॉक्स के जरिए शांतिपूर्ण सत्ता हस्तांतरण में हुई।

अतः, जब आज का मुख्यधारा मीडिया युवाओं के आक्रोश और ‘वोट चोरी’ के गंभीर संस्थागत सवालों को ‘विदेशी साजिश’ या ‘रिजीम चेंज’ का नाम देता है, तो वह वास्तव में भारतीय नागरिकों के सबसे बड़े संवैधानिक अधिकार का अपमान कर रहा होता है। भारत के युवाओं की यह बेचैनी देश को अस्थिर करने के लिए नहीं, बल्कि चुनाव आयोग की निष्पक्षता और परीक्षाओं की शुचिता को बहाल करने के लिए है। इराक या वेनेजुएला में साम्राज्यवादी ताकतें भाग्य-विधाता बनती हैं, जबकि भारत में देश का युवा और मतदाता स्वयं अपना भाग्य लिखते हैं। यह अंतर इतना गहरा है कि सत्ता पक्ष इसे किसी भी भ्रमित नैरेटिव या गोदी मीडिया के शोर से मिटा नहीं सकता।

इस पूरे गतिरोध का अंतिम और सबसे गंभीर पहलू देश की सर्वोच्च लोकतांत्रिक संस्था—संसद की जवाबदेही—से जुड़ा है। लोकतंत्र केवल पांच साल में एक बार वोट देने का नाम नहीं है, बल्कि यह संसद के भीतर जनता के प्रति निरंतर जवाबदेह (Continuous Accountability) रहने की एक पवित्र संवैधानिक प्रक्रिया है। जब ‘वोट चोरी’ और ‘पेपर लीक’ जैसे बुनियादी और मानवीय मुद्दों पर देश का युवा सड़कों पर आक्रोशित हो, तब सरकार का यह नैतिक दायित्व बनता है कि वह संसद के पटल पर सामने आए, विपक्ष के तीखे सवालों का सामना करे और देश को एक पारदर्शी व संतोषजनक उत्तर दे।

परंतु, महीनों तक संसद से नदारद रहना, सार्थक चर्चाओं से भागना और फिर अपनी इस विफलता को छिपाने के लिए ‘विदेशी साजिश’ या ‘रिजीम चेंज’ जैसे छद्म आख्यानों (Narratives) की शरण लेना, संसदीय गरिमा का घोर अवमूल्यन है। सत्ता को यह स्मरण रखना होगा कि जब संसद के भीतर संवाद के सारे रास्ते बंद कर दिए जाते हैं, तब सड़कों पर गांधीवादी आंदोलन का जन्म होना अनिवार्य हो जाता है। भारत की संसद किसी दल या सरकार की जागीर नहीं, बल्कि देश के एक सौ चालीस करोड़ नागरिकों की संप्रभुता का प्रतीक है। इसलिए, गोदी मीडिया के शोर और भ्रमित आख्यानों से परे, सरकार अपनी संवैधानिक जवाबदेही से भाग नहीं सकती; उसे देर-सवेर देश के युवाओं और संसद के प्रति जवाबदेह होना ही पड़ेगा, क्योंकि लोकतंत्र में अंतिम शक्ति ‘महलों’ के पास नहीं, बल्कि ‘मतपेटी’ और ‘संसद’ के पास होती है।

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