मोहिंद्र प्रताप सिंह राणा/ ग्राम परिवेश
रणधीर शर्मा भाजपा के उस अप्रयुक्त राजनीतिक सामर्थ्य का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिसकी वास्तविक क्षमता हिमाचल प्रदेश विधानसभा में बीते साढ़े तीन वर्षों के दौरान बार-बार सामने आई है। सदन में सत्तापक्ष को घेरने की उनकी शैली महज शोर-शराबे या आक्रामक मुद्रा पर निर्भर नहीं रहती; वे नियमों की बारीक समझ, प्रासंगिक सवालों, तथ्यपरक बहस और रणनीतिक हस्तक्षेप के जरिए सरकार को जवाब देने के लिए विवश करते रहे हैं। उनकी राजनीतिक उपयोगिता इस बात में भी दिखाई देती है कि वे मुद्दे को केवल सदन की कार्यवाही तक सीमित नहीं रखते, बल्कि उसे उसके तार्किक परिणाम तक ले जाने की कोशिश करते हैं।
हालिया मानसून सत्र इसका एक सशक्त उदाहरण रहा। उन्होंने श्री नैना देवी विधानसभा क्षेत्र से जुड़े सड़क, स्वास्थ्य और शिक्षा के ज्वलंत सवालों को विभिन्न नियमों, प्रस्तावों, ध्यानाकर्षण और प्रश्नों के माध्यम से सदन में उठाया, वहीं प्रदेश के युवाओं के लिए रोजगार और सरकार द्वारा तदर्थ रोजगार की व्यवस्था जैसे व्यापक सवालों पर सरकार को कठघरे में खड़ा किया। यानी उनके सवालों का दायरा स्थानीय समस्याओं से शुरू होकर प्रदेशव्यापी जनचिंताओं तक जाता है।
हिमाचल प्रदेश राज्य विश्वविद्यालय संशोधन विधेयक पर उनका हस्तक्षेप उनकी सूक्ष्म विधायी समझ का संकेत देता है। विश्वविद्यालय की स्वायत्तता और राज्यपाल के प्रतिनिधि के रूप में कुलपति को वित्त सचिव की अध्यक्षता वाली समिति में सदस्य बनाए जाने जैसे बारीक और संवेदनशील प्रावधानों पर उन्होंने सरकार को आगाह किया। इसी तरह युवाओं को रोजगार देने की नीति और तदर्थ रोजगार की व्यवस्था को लेकर उन्होंने सरकार से केवल आंकड़े नहीं मांगे, बल्कि रोजगार नीति की बुनियादी दिशा पर सवाल खड़ा किया।
सड़कों के सवाल पर भी उनकी भूमिका केवल शिकायत दर्ज कराने तक सीमित नहीं रही। ध्यानाकर्षण प्रस्ताव के माध्यम से श्री नैना देवी क्षेत्र में संपर्क सड़कों की कमी और मौजूदा सड़कों की खस्ता हालत का सवाल उठाते हुए उन्होंने लोक निर्माण विभाग की कार्यप्रणाली को आईना दिखाया और सरकार से सुधार का आश्वासन लिया। नियम 130 के तहत स्वास्थ्य सेवाओं पर चर्चा में भाग लेते हुए उन्होंने अपने क्षेत्र की समस्याओं को प्रदेश की व्यापक स्वास्थ्य व्यवस्था की कमियों से जोड़ा। इस तरह स्थानीय सरोकार को व्यापक नीतिगत विमर्श से जोड़ना उनकी कार्यशैली की एक विशिष्ट विशेषता बनकर उभरता है।
विधानसभा के नियमों—विशेषकर नियम 62, 67 और 130, ध्यानाकर्षण प्रस्ताव तथा प्वाइंट ऑफ ऑर्डर—के माध्यम से उनके सवालों, बहसों और हस्तक्षेपों ने सदन का ध्यान खींचा है। उनकी खासियत यह है कि वे बिना अनावश्यक हंगामा खड़ा किए अपनी बात इस तरह रखते हैं कि उसका राजनीतिक असर शोर से कहीं अधिक गहरा दिखाई देता है। यही उनकी राजनीतिक और रणनीतिक सूझबूझ की बड़ी कसौटी है। लेकिन जब राजनीति और रणनीति को शोर की आवश्यकता होती है, तब रणधीर शर्मा की बुलंद आवाज़ भी सदन में उतनी ही स्पष्टता से गूंजती है।
उनकी कार्यशैली का एक दूसरा पहलू सदन के बाहर दिखाई देता है। वे किसी मुद्दे को विधानसभा की कार्यवाही में दर्ज हो जाने को उसका अंत नहीं मानते। संबंधित मंत्रियों और अधिकारियों के कार्यालयों तक जाकर उसकी पैरवी करना, प्रगति की निगरानी करना और जहां उन्हें ढील दिखाई दे वहां सड़क पर संघर्ष का रास्ता अपनाना उनकी राजनीति का हिस्सा है। जुखाला कॉलेज में प्राध्यापकों की नियुक्तियों का मामला हो या दावींधाटी सड़क का सवाल—इन मुद्दों पर उन्होंने सदन से आगे संघर्ष का रास्ता चुना। यही वह बिंदु है जहां उनका विधायी हस्तक्षेप जमीनी राजनीतिक सक्रियता से जुड़ता है।
रणधीर शर्मा की एक और उल्लेखनीय क्षमता तत्काल उभरते राजनीतिक विमर्श को पकड़कर उसे प्रभावशाली राजनीतिक संदेश में ढालने की है। वे नए राजनीतिक तंज गढ़ने और उन्हें मुद्दे का रूप देने में तेजी दिखाते हैं। राष्ट्रगीत के मुद्दे पर सदन में उनकी तीखी लेकिन मर्यादित टिप्पणियां इसी राजनीतिक शैली का उदाहरण हैं। वे जानते हैं कि कब तथ्य बोलने हैं, कब तर्क को धार देनी है और कब एक सटीक राजनीतिक वाक्य पूरे विमर्श की दिशा बदल सकता है।
अचानक उपजी राजनीतिक परिस्थितियों में उनकी त्वरित रणनीति बनाने की क्षमता भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। सदन में जब परिस्थितियां अचानक करवट लेती हैं, तब वे उपलब्ध तथ्यों, सत्ता पक्ष की स्थिति और विपक्ष के राजनीतिक अवसर को तेजी से पढ़कर अपनी रणनीति बदलने की क्षमता दिखाते हैं। कई मौकों पर वे ऐसी परिस्थितियों में विपक्ष की बाजी को अपने पक्ष में मोड़ने की रणनीतिक कुशलता प्रदर्शित कर चुके हैं। सत्ता पक्ष और विधानसभा अध्यक्ष द्वारा उनके तर्कों और तथ्यों को गंभीरता से लिया जाना भी उनकी विधायी प्रभावशीलता का एक संकेत है।
पार्टी नेतृत्व को जब सदन में मुखर और आक्रामक हस्तक्षेप की आवश्यकता होती है, तब उनकी भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। उनकी शैली में आक्रामकता और संयम का संतुलन, तथ्यों और राजनीतिक संकेतों का मेल तथा मौके के अनुरूप मुद्दे को धार देने की क्षमता दिखाई देती है। वे उन विपक्षी नेताओं में हैं जिनके लिए सदन केवल भाषण देने का मंच नहीं, बल्कि राजनीतिक रणनीति को जमीन पर उतारने का एक महत्वपूर्ण अखाड़ा है।
भाजपा के लिए इसलिए रणधीर शर्मा की भूमिका का मूल्यांकन केवल उनके द्वारा पूछे गए सवालों या सदन में किए गए भाषणों की संख्या से नहीं, बल्कि इस कसौटी पर किया जाना चाहिए कि पिछले साढ़े तीन वर्षों में उन्होंने कितनी बार सरकार को जवाब देने के लिए मजबूर किया, कितनी बार जनहित के मुद्दों को राजनीतिक विमर्श के केंद्र में लाया, कितनी बार सदन के भीतर की लड़ाई को सदन के बाहर जनसंघर्ष से जोड़ा और कितनी प्रभावी ढंग से विपक्ष की आवाज को धार दी।
यहीं से बड़ा सवाल भी उठता है—क्या भाजपा ने विधानसभा में उपलब्ध इस राजनीतिक और रणनीतिक क्षमता का पूरा इस्तेमाल किया है? क्योंकि रणधीर शर्मा की ताकत केवल उनकी बुलंद आवाज़ में नहीं, बल्कि उस आवाज़ के पीछे मौजूद नियमों की समझ, तथ्यों की पकड़, मुद्दे को अंजाम तक ले जाने की जिद और बदलती राजनीतिक परिस्थितियों में बाजी पलटने की रणनीतिक क्षमता में निहित है।