मोहिंद्र प्रताप सिंह राणा

मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू के नेतृत्व वाली प्रदेश सरकार ने जनसुविधाओं को अधिक सुलभ बनाने और प्रशासनिक ढांचे के पुनर्गठन की संभावनाएं तलाशने के लिए आयोग गठित किया है। इस पहल के साथ ही हिमाचल प्रदेश में एक पुराना, लेकिन संवेदनशील सवाल फिर बहस के केंद्र में आ गया है—क्या छोटे से पहाड़ी राज्य में नए जिले बनाना प्रशासनिक आवश्यकता है या मौजूदा व्यवस्था को अधिक सक्षम, जवाबदेह और जनोन्मुख बनाना ही पर्याप्त होगा?

इस सवाल पर प्रबुद्ध वर्ग से लेकर दूरदराज के गांवों और दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रों में रहने वाले आम लोगों तक अलग-अलग मत सामने आ रहे हैं। एक पक्ष के लिए जिला मुख्यालय तक पहुंचने में लगने वाला समय और दूरी निर्णायक हैं, तो दूसरे के लिए नए प्रशासनिक ढांचे पर पड़ने वाला वित्तीय बोझ और उसकी दीर्घकालिक उपयोगिता। हिमाचल की विषम भौगोलिक परिस्थितियों में पुनर्गठन का औचित्य जिलों की संख्या से नहीं, बल्कि इस कसौटी पर तय होना चाहिए कि इससे सरकारी सेवाएं आम नागरिक के कितने करीब पहुंचेंगी और सीमित संसाधनों का उपयोग कितना प्रभावी होगा। विडंबना यह है कि जनजीवन और शासन-व्यवस्था से सीधे जुड़े इस मुद्दे पर आम जनमानस में बहस तेज हो रही है, लेकिन विपक्ष की ओर से अब तक अपेक्षित गंभीरता और स्पष्टता सामने नहीं आई है।

मुख्यमंत्री की इस पहल पर राज्यपाल ने भी सरकार की सोच के कुछ पहलुओं से सहमति जताई है। वहीं, प्रदेश हितों से सरोकार रखने वाले जागरूक नागरिकों के बीच प्रशासनिक इकाइयों के पुनर्गठन को लेकर दो स्पष्ट मत उभर रहे हैं। विरोध करने वालों का तर्क है कि प्रदेश पहले ही गंभीर वित्तीय दबाव और बढ़ते कर्ज से जूझ रहा है। ऐसे में नए जिले, उपमंडल और विकास खंड बनाने से प्रशासनिक व्यय बढ़ेगा तथा राज्यकोष पर अतिरिक्त बोझ पड़ेगा। उनके अनुसार, जब मौजूदा वित्तीय संसाधन ही जरूरतों के अनुरूप नहीं हैं, तब नए प्रशासनिक ढांचे का विस्तार आर्थिक विवेक की कसौटी पर भी परखा जाना चाहिए।

इसके विपरीत, प्रशासनिक इकाइयों के पुनर्गठन के समर्थकों का तर्क है कि नए जिले और प्रशासनिक केंद्र केवल सरकारी कार्यालयों की संख्या बढ़ाने का माध्यम नहीं, बल्कि शासन को जनता के करीब लाने और स्थानीय अर्थव्यवस्था को नई गति देने वाले केंद्र बन सकते हैं। इससे सरकारी योजनाओं का लाभ लेने, प्रशासन तक अपनी बात पहुंचाने और स्थानीय समस्याओं का समयबद्ध समाधान पाने में लोगों को सहूलियत होगी। जिला मुख्यालयों की दूरी घटने से नागरिकों का समय, श्रम और यात्रा पर होने वाला खर्च बचेगा। साथ ही, प्रशासन और जनता के बीच सीधा संवाद मजबूत होगा तथा ‘जनता के द्वार’ और ‘जनमंच’ जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से समस्याएं सुनने पर होने वाले करोड़ रुपए के खर्च की उपयोगिता पर भी नए सिरे से विचार किया जा सकेगा।

पुनर्गठन का सबसे महत्वपूर्ण आधार इसका आर्थिक प्रभाव है। नए प्रशासनिक केंद्र अपने साथ सरकारी कार्यालयों, कर्मचारियों, बाजारों, परिवहन, आवास, कारोबार और विभिन्न सेवाओं की मांग लेकर आते हैं। इससे स्थानीय स्तर पर आर्थिक गतिविधियों का विस्तार होता है, रोजगार के नए अवसर पैदा होते हैं और स्वरोजगार को प्रोत्साहन मिलता है। इसका लाभ केवल शहरी कारोबार तक सीमित नहीं रहता। खेती-किसानी, बागवानी और पशुपालन से जुड़े ग्रामीण उत्पादकों को बाजार, बैंकिंग, परिवहन, तकनीकी सहायता और अन्य संस्थागत सुविधाओं तक बेहतर पहुंच मिलती है। स्थानीय मांग बढ़ने से छोटे कारोबारियों, दुकानदारों, सेवा प्रदाताओं और उद्यमियों के लिए भी नए अवसर खुलते हैं। इस तरह प्रशासनिक पुनर्गठन को केवल सरकारी खर्च के खाते में रखकर नहीं देखा जा सकता; इसके साथ पैदा होने वाली आर्थिक गतिविधियों, रोजगार और स्थानीय विकास से होने वाले लाभों को भी आकलन का हिस्सा बनाना होगा।

हिमाचल की दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियां इस तर्क को और मजबूत करती हैं। प्रदेश के कई दूरदराज क्षेत्रों में जिला मुख्यालय तक पहुंचने में लोगों को दो से तीन दिन तक लग जाने की स्थिति सामने आती है। ऐसी दूरी का अर्थ केवल आवागमन की परेशानी नहीं, बल्कि समय और धन की बर्बादी के साथ सरकारी योजनाओं, प्रशासनिक सेवाओं और बाजार तक पहुंच में बाधा भी है। छोटे और स्थानीय स्तर पर सुलभ प्रशासनिक केंद्र इस दूरी को कम कर सकते हैं। जब किसान-बागवान अपनी उपज के विपणन, पशुपालक अपनी गतिविधियों और आम नागरिक अपने प्रशासनिक कार्यों के लिए कम समय और संसाधन खर्च करेंगे, तो उसका लाभ व्यापक स्थानीय अर्थव्यवस्था में भी दिखाई देगा। लिहाजा, पुनर्गठन की लागत का आकलन करते समय यह भी देखना होगा कि मौजूदा व्यवस्था में दूरी के कारण जनता और स्थानीय अर्थव्यवस्था को कितनी कीमत चुकानी पड़ रही है।

इस पहल को चुनावी वर्ष से जोड़कर देखने वाले लोग भी हैं। अतीत में वीरभद्र सिंह और प्रेम कुमार धूमल के कार्यकाल में चुनाव के आसपास नए जिलों के गठन की घोषणाएं और चर्चाएं हुईं, लेकिन वे साकार नहीं हो सकीं। इसी पृष्ठभूमि में कुछ लोग मौजूदा पहल को भी चुनावी घोषणा मान रहे हैं।

दूसरी ओर, लोगों के एक बड़े वर्ग को विश्वास है कि मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने यदि प्रशासनिक पुनर्गठन की दिशा में आयोग गठित करने का निर्णय लिया है, तो वे इसे तार्किक परिणति तक पहुंचाने का प्रयास भी करेंगे। इस भरोसे को उनकी कार्यशैली और फैसलों को अमलीजामा पहनाने की क्षमता से जोड़कर देखा जा रहा है। मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य में किसी नेता के प्रति जनता का यह विश्वास अपने आप में उसके नेतृत्व के लिए एक बड़ा कॉम्प्लीमेंट है—खासकर तब, जब लोगों को उसकी कथनी और करनी के बीच अंतर न होने की उम्मीद हो। हालांकि, आयोग का गठन अपने आप में नए जिलों, उपमंडलों या विकास खंडों के गठन की गारंटी नहीं है; अंतिम निर्णय प्रशासनिक जरूरतों, आर्थिक आकलन और सरकार की नीतिगत प्राथमिकताओं पर निर्भर करेगा।

हिमाचल में प्रशासनिक पुनर्गठन की असली कसौटी केवल यह नहीं हो सकती कि नए जिले बनाने पर कितना खर्च आएगा; यह भी देखना होगा कि मौजूदा व्यवस्था की भौगोलिक दूरियां जनता से कितना समय, श्रम और पैसा छीन रही हैं तथा नए प्रशासनिक केंद्र स्थानीय अर्थव्यवस्था को कितना विस्तार दे सकते हैं। यदि पुनर्गठन से सरकारी सेवाएं सुलभ होती हैं, ग्रामीण उत्पादकों को बाजार मिलता है, रोजगार के अवसर बढ़ते हैं और स्थानीय कारोबार को गति मिलती है, तो उसका मूल्यांकन केवल अतिरिक्त प्रशासनिक खर्च के आधार पर करना अधूरा होगा।

आखिरकार, सवाल केवल नए जिले बनाने का नहीं, हिमाचल के दूरदराज क्षेत्रों को प्रशासन, बाजार और विकास की मुख्यधारा से जोड़ने का है—क्योंकि जहां प्रशासन पहुंचता है, वहां केवल सुविधा नहीं बढ़ती, आर्थिक अवसरों के नए द्वार भी खुलते हैं।

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