मोहिंद्र प्रताप सिंह राणा/ ग्राम परिवेश

लगभग एक सदी से सैकड़ों पीढ़ियों को “तमसो मा ज्योतिर्गमय”, यानी अज्ञान के अंधेरे से ज्ञान के उजाले की ओर ले जाता शैले डे स्कूल शिमला शहर के बीचोंबीच अपनी विशिष्ट पहचान बना चुका है। छोटा-सा परिसर, लेकिन उसके वार्षिक समारोह की मंचीय दुनिया इतनी बड़ी थी कि उस पर गांव से पलायन, बूढ़े होते माता-पिता, मोबाइल में सिमटते रिश्ते और उपेक्षित होता बचपन—हमारे समय के कई बड़े सवाल एक साथ दिखाई दे रहे थे। नाटक, एकांकी, सामूहिक संगीत और कविता पाठ की प्रस्तुतियों ने मन को तृप्त किया, लेकिन लौटते हुए दिमाग में कई प्रश्न भी छोड़ गए। लगा, बच्चे मंच पर केवल अभिनय नहीं कर रहे थे, वे हमारे समय का आईना हमारे सामने रख रहे थे।

इन प्रस्तुतियों में विशेष रूप से ‘बूढ़ों का गांव’ और कक्षा दूसरी की एक बालिका की कविता ‘मोबाइल का भूत’ देर तक भीतर गूंजती रही। दोनों की कथावस्तु अलग थी, लेकिन दोनों के केंद्र में एक ही पीड़ा थी—मनुष्य अपने ही रिश्तों के बीच धीरे-धीरे अकेला क्यों होता जा रहा है?
‘बूढ़ों का गांव’ : पलायन के पीछे छूटता बचपन और बूढ़े होते गांव की कथा

इस प्रस्तुति की परिकल्पना और तैयारी शिमला में अपने शुरुआती दौर से ही बच्चों की रचनात्मकता और सामाजिक सरोकारों को मंच देने वाली किक्ली चैरिटेबल ट्रस्ट ने की है। बचपन की संवेदनाओं से शुरू हुई संस्था की यह रंगमंचीय यात्रा अब उन सवालों को मंच पर ला रही है, जिनसे गांव और समाज दोनों जूझ रहे हैं। ‘बाल रंगमंच महोत्सव-2026’ के तहत ‘बूढ़ों का गांव’ का पुनः मंचन गेयटी थिएटर में होने जा रहा है।

‘बूढ़ों का गांव’ केवल गांव से युवाओं के पलायन की कहानी नहीं थी। वह उन गांवों की करुण कथा थी, जहां घर तो बचे हैं, लेकिन घरों में रहने वाली पीढ़ियां बिखर गई हैं।

नौकरी और बेहतर भविष्य की तलाश में गांव के युवा देश-विदेश के शहरों की ओर चले जाते हैं। पीछे रह जाते हैं बूढ़े माता-पिता—अपने खेतों, पशुओं, घरों और रोजमर्रा की जरूरतों के साथ। कभी जिन हाथों ने बच्चों को उंगली पकड़कर चलना सिखाया था, वही हाथ बुढ़ापे में अपनी छोटी-बड़ी जरूरतों के लिए सहारे तलाशते दिखाई देते हैं।

नाटक का सबसे मार्मिक प्रसंग तब आता है, जब एक युवक पढ़ाई पूरी करने के बाद नौकरी के लिए दूर शहर जाने को तैयार होता है। माता-पिता उसे रोकना चाहते हैं। उनकी आंखों में बेटे को बांध लेने की इच्छा नहीं, बल्कि उस भविष्य का भय है जिसमें उनका अपना वर्तमान सूना पड़ जाने वाला है। बेटे की अपनी मजबूरियां हैं। वह जाना चाहता है। माता-पिता अंततः ग्राम मुखिया के पास पहुंचते हैं और उससे बेटे को समझाने की गुहार लगाते हैं।

यहीं नाटक अपनी भावनात्मक ऊंचाई पर पहुंचता है।

ग्राम मुखिया स्वयं अपनी विवशता स्वीकार करता है—वह अपने बच्चों को नहीं रोक पाया, तो दूसरे के बच्चे को कैसे रोक सकता है?

इस संवाद को कलाकार ने जिस रूंधे गले, ठहरे हुए स्वर और नियंत्रित भाव-भंगिमा के साथ प्रस्तुत किया, उसने संवाद को महज संवाद नहीं रहने दिया। वह पूरे गांव की सामूहिक विवशता बन गया। यहां अभिनय शब्दों से आगे निकलकर मौन, आंखों और आवाज के कंपन में बोलता है। वॉयस मॉड्यूलेशन ने दृश्य की संवेदना को और गहरा किया—कहीं धीमा पड़ता स्वर, कहीं गले में अटकती बात और कहीं असहाय होकर निकलती आवाज दर्शकों को पात्र के भीतर तक ले जाती है।

फिर कहानी में एक अप्रत्याशित मोड़ आता है। नौकरी की तलाश में एक नेपाली युवक गांव में पहुंचता है। गांव के लोगों को लगता है जैसे उजड़ते गांव को कोई सहारा मिल गया हो। हर परिवार उसे अपने गांव के भविष्य की संभावना के रूप में देखने लगता है। उनके सपनों में सूने खेत फिर हरे होने लगते हैं, पक्षियों की चहचहाहट लौट आती है और गांव के मातम जैसे वातावरण में जीवन की आहट सुनाई देने लगती है।

लोग उसकी खातिरदारी में जुट जाते हैं। लेकिन वह युवक इस अपनत्व को दूसरे अर्थ में लेता है। उसे आशंका होती है कि कहीं इतनी खातिरदारी के पीछे कोई स्वार्थ तो नहीं, कहीं उसे किसी ‘बलि के बकरे’ की तरह तो नहीं लाया जा रहा। भय उसे वहां से भाग जाने के लिए विवश कर देता है।

यह प्रसंग हास्य और करुणा के बीच एक महीन रेखा खींचता है। दर्शक हंसते भी हैं, लेकिन उस हंसी के भीतर गांव की विडंबना छिपी है—जिस गांव में कभी लोगों की जरूरत थी, वहां अब एक अकेला कामगार भी उम्मीद का केंद्र बन जाता है।

तभी देश कोविड महामारी की चपेट में आ जाता है। शहरों में फंसे बच्चे अपने परिवारों के साथ गांव लौटते हैं। लंबे समय बाद घरों में फिर चूल्हे जलते हैं, आंगन आबाद होते हैं और गांव में जीवन लौट आता है। दादा-दादी और पोते-पोतियों के बीच वह आत्मीयता जन्म लेती है, जिसकी जगह आधुनिक जीवन की आपाधापी ने धीरे-धीरे खाली कर दी थी।

यहां नाटक का दृश्य बहुत कुछ कहता है—बिना भाषण दिए।

बच्चों का दादा-दादी के साथ घुलना-मिलना, उनका साथ रहने की जिद और फिर परिस्थितियों के हाथों वापस शहर लौटना, दर्शकों के सामने एक बड़ा सवाल छोड़ जाता है—क्या हम विकास की दौड़ में उस आत्मीयता की कीमत तो नहीं चुका रहे, जिसकी तलाश में अंततः हमें फिर अपने घरों की ओर लौटना पड़ता है?

कोविड खत्म होता है, जीवन सामान्य होता है और बच्चे वापस जाने लगते हैं। लेकिन इस बार उनके बच्चे गांव में दादा-दादी के साथ रहना चाहते हैं। उनकी जिद में उस रिश्ते की गर्माहट दिखाई देती है, जो शहर की सुविधाओं से नहीं मिलती। अंततः उन्हें भी जाना पड़ता है।

मंच पर यह विदाई केवल पात्रों की विदाई नहीं लगती। वह जैसे गांव और उसकी अगली पीढ़ी के बीच टूटती एक अदृश्य डोर की विदाई बन जाती है।

‘मोबाइल का भूत’ : एक बच्ची ने बड़े सवाल को छोटी कविता में कह दिया

इसके बाद कक्षा दूसरी की एक बालिका की कविता—‘मोबाइल का भूत’।

उम्र इतनी छोटी कि शायद वह सामाजिक विघटन, डिजिटल निर्भरता या पारिवारिक संवाद जैसे भारी शब्दों से परिचित भी न हो, लेकिन उसकी कविता ने इन्हीं बड़े सवालों को बेहद सहजता से मंच पर रख दिया।

उसकी कविता में मां मोबाइल में व्यस्त है, पिता अपने फोन में, भाई-बहन अपनी डिजिटल दुनिया में और संगी-साथी भी स्क्रीन के भीतर उलझे हैं। बच्चा सामने है, लेकिन उसके पास समय देने वाला कोई नहीं।

यहां कविता की सबसे बड़ी ताकत उसकी सरलता है।

बच्ची ने किसी बड़े दार्शनिक की तरह उपदेश नहीं दिया। उसने एक बच्चे की आंख से परिवार को देखा। उसकी आवाज में बालसुलभ मासूमियत थी, लेकिन विषय में हमारे समय की गंभीर विडंबना।

स्वर का उतार-चढ़ाव, शब्दों के बीच ठहराव, चेहरे की सहज भाव-भंगिमा और कहीं-कहीं उभरती शिकायत—इन सबने कविता को केवल पाठ नहीं रहने दिया। वह जैसे एक बच्चे की मौन पुकार बन गई।

सबसे चिंताजनक बात यह है कि मोबाइल ने केवल हमारा समय नहीं छीना; उसने कई जगह साथ बैठने की संस्कृति, संवाद की सहजता और रिश्तों की ऊष्मा को भी प्रभावित किया है। एक ही कमरे में बैठे लोग अलग-अलग स्क्रीन पर मौजूद हैं। बातचीत घट रही है और संपर्क बढ़ रहा है; संबंध मौजूद हैं, लेकिन संवाद कम हो रहा है।

रिश्ते टूटते हमेशा शोर के साथ नहीं हैं। कई बार वे धीरे-धीरे रिसते हैं—बातचीत कम होने से, समय न देने से, एक-दूसरे की आंखों में न देखने से और अपने ही घर में किसी दूसरे की डिजिटल दुनिया का दर्शक बन जाने से।

कक्षा दूसरी की उस बच्ची ने शायद अनजाने में यही प्रश्न हमारे सामने रख दिया—हम बच्चों को मोबाइल दे रहे हैं या मोबाइल के बदले अपना समय उनसे वापस ले रहे हैं?

छोटे मंच पर बड़े सवाल

इस पूरे समारोह की सबसे बड़ी उपलब्धि शायद यही थी कि मंच पर बच्चों ने हमें मनोरंजन से आगे सोचने के लिए विवश किया। सामूहिक संगीत में तालमेल था, कविता में संवेदना थी, एकांकी में संवाद और अभिनय था, लेकिन इन सबके पीछे बच्चों की कल्पनाशीलता और शिक्षकों का मार्गदर्शन भी दिखाई दे रहा था।

अच्छा विद्यालय वही नहीं, जहां बच्चे केवल पाठ्यक्रम याद करें। अच्छा विद्यालय वह भी है, जहां बच्चे समाज को देखें, प्रश्न करें, महसूस करें और अपनी अनुभूति को अभिव्यक्ति दे सकें।

‘बूढ़ों का गांव’ ने पलायन के पीछे छूटते माता-पिता का अकेलापन दिखाया और ‘मोबाइल का भूत’ ने घर में मौजूद होकर भी उपेक्षित होते बचपन की तस्वीर खींच दी।

एक नाटक ने पूछा—हम अपने गांवों से क्या खोकर शहरों में जा रहे हैं?

एक छोटी-सी कविता ने पूछा—हम अपने घरों में रहते हुए भी अपने बच्चों से कितनी दूर चले गए हैं?

शायद इन दोनों प्रश्नों का उत्तर किसी पाठ्यपुस्तक में नहीं मिलेगा। इनके उत्तर हमें अपने घरों, गांवों और अपने व्यवहार में तलाशने होंगे।

उस छोटे विद्यालय का मंच इसलिए बड़ा लगा—क्योंकि वहां बच्चे अभिनय कर रहे थे, लेकिन कटघरे में हमारा समय खड़ा था।यदि इसे आप अखबारी फीचर/कॉलम “बस यूं ही उकेर दिया…” के लिए रखना चाहते हैं, तो इसकी भाषा को थोड़ा और धारदार, कम वर्णनात्मक और अधिक पत्रकारिता-केंद्रित किया जा सकता है।

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