मोहिंद्र प्रताप सिंह राणा/ ग्राम परिवेश
हिमाचल की पहाड़ियों से निकलने वाली जलधाराएं सिर्फ नदियों का पानी लेकर मैदानों की ओर नहीं बहतीं, वे राजस्थान के हनुमानगढ़ से लेकर देश के दूरदराज इलाकों तक खेतों की प्यास बुझाने, अन्न उगाने और अर्थव्यवस्था को सींचने वाली हजारों-सहस्रों जीवनधाराओं में बदल जाती हैं। विडंबना यह है कि जिन प्राकृतिक संसाधनों से देश के बड़े हिस्से की समृद्धि को निरंतर ऊर्जा और जीवन मिलता है, उन्हीं संसाधनों के उद्गम प्रदेश हिमाचल को लंबे समय से अपनी आर्थिक जरूरतों के लिए केंद्र की सहायता और कर्ज के सहारे आगे बढ़ना पड़ा है। प्रदेश की पूर्ववर्ती सरकारें इन प्राकृतिक संसाधनों में छिपी आर्थिक संभावनाओं को उस व्यापक दृष्टि से नहीं देख सकीं, जिसकी आज जरूरत है।
मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविन्द्र सिंह सुक्खू ने सत्ता संभालने के साथ ही इस दिशा में हिमाचल के जल, ऊर्जा और पर्यावरणीय संसाधनों को केवल प्राकृतिक विरासत नहीं, बल्कि प्रदेश के वैध आर्थिक अधिकार के रूप में देखना शुरू किया और उनके उचित प्रतिफल के लिए केंद्र तथा परियोजनाओं से जुड़े राज्यों और संस्थाओं के समक्ष हिमाचल का पक्ष मजबूती से रखा। किशाऊ परियोजना पर हुआ नया समझौता इसी बदलती सोच का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। इसे महज एक और बांध या बिजली परियोजना के रूप में देखना हिमाचल के सामने खुल रही संभावनाओं को छोटा करके देखना होगा—यह उस व्यापक आर्थिक सोच का सेतु बन सकता है, जिसके एक छोर पर हिमाचल की जलधाराएं हैं और दूसरे छोर पर प्रदेश की आर्थिक आत्मनिर्भरता। भविष्य की सरकारें यदि इस सोच और अधिकार-आधारित दृष्टिकोण को निरंतरता देती हैं तो किशाऊ हिमाचल के लिए पानी के बहाव को समृद्धि के प्रवाह में बदलने वाले एक भव्य सेतु का रूप ले सकता है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि हिमाचल प्रदेश के इतिहास में किशाऊ परियोजना एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। प्रदेश के जल संसाधनों को लंबे समय से ‘बहता हुआ सोना’ कहा जाता रहा है, लेकिन अब आवश्यकता इस बहते सोने का उचित आर्थिक मूल्य प्रदेश के हित में सुनिश्चित करने की है। इसी दिशा में किशाऊ परियोजना से हिमाचल को वर्तमान आकलन के अनुसार प्रतिवर्ष लगभग 1,200 करोड़ रुपये की आय होने की संभावना है। इससे प्रदेश की आर्थिकी को मजबूती मिलेगी और इसका लाभ प्रदेश के लोगों तक पहुंचाया जाएगा।
किशाऊ को लेकर हिमाचल के हितों की यह लड़ाई केवल आय सुनिश्चित करने तक सीमित नहीं रही। पूर्व में हुए समझौते में परियोजना से बनने वाली बिजली की लागत का भार हिमाचल प्रदेश पर डाला गया था। वर्तमान प्रदेश सरकार ने इस शर्त को स्वीकार नहीं किया और करीब तीन वर्षों तक लगातार बातचीत के माध्यम से अपने अधिकारों का पक्ष रखा। नए समझौते में अब परियोजना से बनने वाली बिजली की लागत उन राज्यों द्वारा वहन की जाएगी, जो किशाऊ के पानी का उपयोग करेंगे। यही बदलाव उस दृष्टिकोण को रेखांकित करता है जिसमें हिमाचल अपने संसाधनों के उपयोग को केवल विकास परियोजना नहीं, बल्कि अपने हिस्से और अधिकार के प्रश्न के रूप में देख रहा है।
किशाऊ परियोजना से प्रभावित होने वाले परिवारों के हितों को भी सरकार ने मुआवजे के प्रावधानों के साथ जोड़ा है। मुख्यमंत्री के अनुसार हिमाचल में प्रभावित होने वाले गांवों की संख्या उत्तराखंड की तुलना में कम है और प्रभावित परिवारों को भूमि अधिग्रहण से संबंधित प्रावधानों के अनुरूप उचित मुआवजा प्रदान किया जाएगा। विकास की कीमत चुकाने वाले लोगों के हितों का संरक्षण इस परियोजना के आर्थिक लाभ जितना ही महत्वपूर्ण पक्ष है।
सुक्खू ने कहा कि आने वाले समय में जल और अधिक महत्वपूर्ण तथा मूल्यवान संसाधन बनने जा रहा है। ऐसे में हिमाचल के लिए अपने जल अधिकारों की रक्षा और उनसे मिलने वाले उचित आर्थिक प्रतिफल को सुनिश्चित करना महज वर्तमान का सवाल नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के आर्थिक भविष्य से जुड़ा विषय है। भाखड़ा ब्यास प्रबंधन बोर्ड से जुड़े मुद्दों के साथ शानन पावर प्रोजेक्ट का मामला भी इसी व्यापक अधिकार-चर्चा का हिस्सा है।
मुख्यमंत्री के अनुसार हिमाचल प्रदेश में लगभग 14,000 मेगावाट जलविद्युत एवं नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता से बड़े सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम लाभान्वित हो रहे हैं, जबकि प्रदेश को वर्तमान में 12 प्रतिशत मुफ्त बिजली रॉयल्टी और एक प्रतिशत लोकल एरिया डेवलपमेंट फंड प्राप्त होता है। उनका कहना है कि जब कोई विद्युत परियोजना 12 वर्ष बाद अपनी परियोजना लागत वसूल कर लागत-मुक्त हो जाती है तो 12 से 30 वर्ष की अवधि में हिमाचल को 30 प्रतिशत मुफ्त बिजली रॉयल्टी मिलनी चाहिए। 40 वर्ष की अवधि पूरी होने पर परियोजना राज्य सरकार को हस्तांतरित की जानी चाहिए और यदि इसके बाद भी कोई संस्था उसका संचालन जारी रखना चाहती है तो हिमाचल को 50 प्रतिशत मुफ्त बिजली रॉयल्टी मिलनी चाहिए।
इस मांग के पीछे तर्क सीधा है—हिमाचल के जल संसाधनों के दोहन से बड़ी-बड़ी सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियां आर्थिक रूप से मजबूत हो रही हैं, तो संसाधनों के उद्गम प्रदेश को भी उसके प्राकृतिक योगदान के अनुरूप आर्थिक लाभ मिलना चाहिए। यही सवाल जलविद्युत परियोजनाओं से आगे बढ़कर हिमाचल की पूरी प्राकृतिक संपदा पर लागू होता है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि हिमाचल प्रदेश देश को प्रतिवर्ष लगभग 90,000 करोड़ रुपये की पारिस्थितिकी सेवाएं प्रदान करता है। इनमें स्वच्छ हवा, ग्लेशियरों का संरक्षण और देश की नदियों के लिए जल उपलब्ध करवाना शामिल है। दूसरी ओर, प्राकृतिक आपदाओं के कारण प्रदेश को हर वर्ष हजारों करोड़ रुपये का आर्थिक नुकसान भी उठाना पड़ता है। ऐसे में प्रदेश सरकार का तर्क है कि हिमाचल की प्राकृतिक संपदा से लाभ उठाने वाली संस्थाओं और कंपनियों से प्रदेश को उसके योगदान के अनुरूप उचित आर्थिक प्रतिफल मिलना चाहिए।
किशाऊ इसी बदलती सोच की एक महत्वपूर्ण मिसाल बन सकता है—जहां पहाड़ से बहता पानी केवल नीचे की ओर जाने वाला संसाधन नहीं रहेगा, बल्कि उसके साथ हिमाचल का आर्थिक अधिकार भी प्रवाहित होगा। असली चुनौती अब इस सोच को किसी एक परियोजना तक सीमित रखने की नहीं, बल्कि आने वाली सरकारों द्वारा इसे निरंतरता देने की है। यदि जल, ऊर्जा, पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधनों को प्रदेश की आर्थिक ताकत में बदलने की यह दृष्टि आगे भी कायम रहती है, तो किशाऊ वास्तव में हिमाचल की जलधारा को समृद्धि की धारा से जोड़ने वाला सेतु सिद्ध हो सकता है।