धर्मशाला में प्रशासनिक सुधारों पर राष्ट्रीय सम्मेलन में हिमाचल की डिजिटल पहलों का उल्लेख; पहाड़ी राज्यों के पर्यावरणीय योगदान और वित्तीय अधिकारों का न्यायसंगत आकलन करने की भी पैरवी

ग्राम परिवेश

धर्मशाला। डिजिटल शासन की सार्थकता तकनीकी तंत्र के विस्तार में नहीं, बल्कि सरकारी व्यवस्था को पारदर्शी, जवाबदेह और आम नागरिक के लिए सुलभ बनाने में है। विशेषकर दुर्गम क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को सरकारी सेवाओं के लिए दफ्तरों के चक्कर न काटने पड़ें और कल्याणकारी योजनाओं का लाभ बिना अनावश्यक बाधाओं के उन तक पहुंचे—ई-गवर्नेंस की सफलता की कसौटी यही होनी चाहिए। मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविंद्र सिंह सुक्खू ने शनिवार को धर्मशाला में प्रशासनिक सुधार एवं ई-गवर्नेंस पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन को संबोधित करते हुए सुशासन को सरकार के संचालन की अनिवार्य शर्त बताया। उन्होंने पारंपरिक नौकरशाही व्यवस्था से आगे बढ़कर नागरिक-केंद्रित शासन प्रणाली विकसित करने पर बल दिया।

मुख्यमंत्री ने कहा कि वर्तमान राज्य सरकार ने सत्ता संभालते ही स्पष्ट कर दिया था कि शासन का उद्देश्य सत्ता-सुख भोगना नहीं, बल्कि व्यवस्था परिवर्तन के माध्यम से प्रदेशवासियों के जीवन में ठोस सुधार लाना है। सरकार का लक्ष्य हिमाचल के संसाधनों का लाभ जनता तक पहुंचाते हुए आने वाले वर्षों में प्रदेश को देश के समृद्ध और आत्मनिर्भर राज्यों में स्थापित करना है। इस दिशा में ई-गवर्नेंस को जनसेवाओं की गुणवत्ता सुधारने और कल्याणकारी योजनाओं का लाभ जमीनी स्तर तक पहुंचाने के प्रभावी माध्यम के रूप में विकसित किया जा रहा है।

उन्होंने कहा कि स्पष्ट नीतिगत दृष्टिकोण के तहत सरकार ने कई ऐसे निर्णय लिए हैं, जिन्हें राष्ट्रीय स्तर पर भी सराहना मिली है। शिक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकताओं में शामिल करते हुए प्री-नर्सरी से बारहवीं कक्षा तक शैक्षणिक गुणवत्ता सुधारने के प्रयास किए गए हैं। मुख्यमंत्री के अनुसार, इन प्रयासों के परिणामस्वरूप हिमाचल प्रदेश शिक्षा के क्षेत्र में देशभर में पांचवें स्थान पर पहुंच गया है, जबकि वर्ष 2021 में पूर्व भाजपा सरकार के कार्यकाल के दौरान प्रदेश 21वें स्थान पर था।

स्वास्थ्य सेवाओं के आधुनिकीकरण पर जोर

मुख्यमंत्री ने स्वास्थ्य क्षेत्र को सरकार की दूसरी सर्वोच्च प्राथमिकता बताते हुए कहा कि प्रदेश के चिकित्सा संस्थानों में रोबोटिक सर्जरी की सुविधाएं शुरू की गई हैं। 15 से 19 वर्ष पुराने चिकित्सा उपकरणों को बदलने की प्रक्रिया भी आरंभ की गई है। इन पहलों का उद्देश्य चिकित्सा महाविद्यालयों में आधुनिक स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार करना और प्रदेशवासियों को महंगे उपचार के लिए दूसरे राज्यों का रुख करने की मजबूरी से राहत दिलाना है।

उन्होंने कहा कि विशेषज्ञ चिकित्सकों की उपलब्धता बढ़ाने के लिए स्नातकोत्तर सीटों की संख्या में वृद्धि की गई है। विशेषज्ञ चिकित्सकों के वेतन में बढ़ोतरी के साथ चिकित्सकों और पैरामेडिकल कर्मचारियों के सैकड़ों पद भी प्राथमिकता के आधार पर भरे गए हैं।

ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती देने की पहल

मुख्यमंत्री ने कहा कि हिमाचल प्रदेश की लगभग 90 प्रतिशत आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है। इसलिए ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करना सरकार की तीसरी सर्वोच्च प्राथमिकता है। ग्रामीण परिवारों की आय में सम्मानजनक वृद्धि सुनिश्चित करने के लिए कई महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए हैं। सरकार ने गाय और भैंस के दूध के लिए देश में सर्वाधिक न्यूनतम समर्थन मूल्य निर्धारित किया है। प्राकृतिक खेती को प्रोत्साहित करते हुए इसके उत्पादों की खरीद के लिए भी निर्धारित दरें तय की गई हैं।

उन्होंने बताया कि प्राकृतिक खेती से उत्पादित गेहूं 80 रुपये प्रति किलोग्राम, कच्ची हल्दी 150 रुपये, मक्का 50 रुपये और अदरक 30 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से खरीदा जा रहा है। इन प्रयासों का उद्देश्य ग्रामीण उत्पादकों को उनकी उपज का बेहतर मूल्य दिलाना और कृषि को अधिक टिकाऊ तथा आयोन्मुख बनाना है।

घर बैठे सेवाएं, शिकायतों पर जवाबदेही

ई-गवर्नेंस की पहलों का उल्लेख करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि सिंगल विंडो सिटीजन पोर्टल के माध्यम से नागरिक सेवाओं का दायरा बढ़ाया गया है। अब लोग घर बैठे अथवा लोक मित्र केंद्रों के माध्यम से विभिन्न सरकारी सेवाओं का लाभ उठा सकते हैं। मुख्यमंत्री हेल्पलाइन और शिकायत निवारण पोर्टल ने प्रशासनिक जवाबदेही सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

उन्होंने कहा कि दूरदराज के क्षेत्रों से मिलने वाली शिकायतों पर संबंधित अधिकारियों को कार्रवाई करनी होती है। शिकायतकर्ता की संतुष्टि के बिना किसी शिकायत को निस्तारित नहीं माना जाता। इस व्यवस्था का उद्देश्य केवल शिकायतों का निपटारा दर्ज करना नहीं, बल्कि नागरिकों की समस्याओं का वास्तविक समाधान सुनिश्चित करना है।

मुख्यमंत्री ने कहा कि इंतकाल, भूमि विभाजन और निशानदेही जैसे राजस्व मामलों के लंबित रहने से लोगों को लंबे समय तक परेशानी उठानी पड़ती थी। इन समस्याओं के समाधान के लिए राजस्व प्रबंधन प्रणाली और राजस्व लोक अदालतों जैसी पहल की गई हैं। इससे राजस्व प्रशासन में पारदर्शिता बढ़ाने और हजारों लंबित मामलों के निपटारे में तेजी लाने में मदद मिली है।

सामाजिक सुरक्षा से हरित हिमाचल तक

सामाजिक सुरक्षा के क्षेत्र में राज्य सरकार की पहलों का उल्लेख करते हुए सुक्खू ने कहा कि निराश्रित बच्चों को कानूनी रूप से ‘चिल्ड्रन ऑफ द स्टेट’ के रूप में अपनाया गया है। सरकार उनकी शिक्षा, पालन-पोषण, उच्च शिक्षा, कोचिंग, वस्त्र, विवाह और आवास जैसी आवश्यकताओं की जिम्मेदारी उठा रही है।

उन्होंने बताया कि जिन परिवारों की वार्षिक आय 12 लाख रुपये से अधिक नहीं है, उनके देश-विदेश में पढ़ाई करने वाले विद्यार्थियों को एक प्रतिशत ब्याज दर पर 20 लाख रुपये तक का ऋण उपलब्ध करवाया जा रहा है।

मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रदेश सरकार हरित हिमाचल के लक्ष्य की प्राप्ति के लिए भी प्रतिबद्धता से काम कर रही है। इलेक्ट्रिक बसों को प्रोत्साहन देने सहित पर्यावरण संरक्षण के लिए विभिन्न कदम उठाए जा रहे हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि विकास की दिशा ऐसी होनी चाहिए, जिसमें आर्थिक प्रगति के साथ पर्यावरणीय संतुलन भी कायम रहे।

राष्ट्रीय विकास में पहाड़ी राज्यों के योगदान का न्यायसंगत आकलन हो

हिमाचल प्रदेश की भौगोलिक परिस्थितियों और पर्यावरणीय चुनौतियों का उल्लेख करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रदेश के वन, नदियां और जलविद्युत संसाधन देश की पर्यावरणीय एवं ऊर्जा सुरक्षा में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। इसके बावजूद प्राकृतिक आपदाओं से निपटने और पर्यावरण संरक्षण की लागत का असंगत बोझ राज्य को उठाना पड़ता है।

उन्होंने राष्ट्रीय विकास में पहाड़ी राज्यों के योगदान का निष्पक्ष आकलन करने तथा जलविद्युत परियोजनाओं, रॉयल्टी, जल उपकर और केंद्रीय वित्तीय सहायता से जुड़े मामलों में उनके हितों पर न्यायसंगत विचार करने की आवश्यकता रेखांकित की। मुख्यमंत्री ने कहा कि हिमाचल प्रदेश तथ्यों, रचनात्मक संवाद और संवैधानिक माध्यमों के जरिए अपने जायज हकों के लिए निरंतर प्रयास करता रहेगा।

उन्होंने धर्मशाला में राष्ट्रीय सम्मेलन के आयोजन के लिए भारत सरकार के प्रशासनिक सुधार एवं लोक शिकायत विभाग (डीएआरपीजी), आयोजकों और राज्य प्रशासनिक टीम का आभार व्यक्त किया। मुख्यमंत्री ने उम्मीद जताई कि सम्मेलन से ऐसी समावेशी डिजिटल शासन व्यवस्था विकसित करने में मदद मिलेगी, जो आत्मनिर्भर और विकसित भारत के निर्माण में योगदान देने के साथ प्रौद्योगिकी का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाएगी।

इससे पहले, डीएआरपीजी की सचिव निवेदिता शुक्ला वर्मा ने स्वागत संबोधन में कहा कि हिमाचल प्रदेश सहित विभिन्न राज्य प्रशासनिक सुधारों के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य कर रहे हैं। उन्होंने नवाचारों को व्यापक स्तर पर लागू करने के लिए नियमित संवाद और अनुभवों के आदान-प्रदान की आवश्यकता पर बल दिया।

हिमाचल प्रदेश के मुख्य सचिव कमलेश कुमार पंत ने नागरिकों को पारदर्शी और उत्तरदायी सेवाएं उपलब्ध करवाने के लिए प्रौद्योगिकी को समय-समय पर उन्नत करने की आवश्यकता रेखांकित की।

सचिव प्रशासनिक सुधार शैनामोल ए. ने हिमाचल की सर्वोत्तम कार्यप्रणालियों पर आयोजित सत्र को संबोधित किया। स्वास्थ्य सचिव आशीष सिंहमार ने ई-गवर्नेंस के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता और उभरती प्रौद्योगिकियों से प्रेरित डिजिटल परिवर्तन एवं नवाचार पर विचार रखे। सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता तथा महिला एवं बाल विकास विभाग के सचिव सी.पी. वर्मा ने ‘ई-गवर्नेंस के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार—राज्य एवं जिला स्तर’ विषय पर आयोजित सत्र को संबोधित किया। डीएआरपीजी के अतिरिक्त सचिव पुनीत यादव ने धन्यवाद प्रस्ताव प्रस्तुत किया।

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