मोहिंद्र प्रताप सिंह राणा

हिमाचल प्रदेश की वित्तीय सेहत पर नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की रिपोर्ट के अनुसार सुक्खू सरकार को प्रतिकूल परिस्थितियों में वित्तीय दबाव संभालने का श्रेय दिया जा सकता है, लेकिन उपलब्ध आंकड़े गत चार वर्षों में प्रदेश की मूल वित्तीय संरचना मजबूत हुई को लेकर गंभीर सवाल भी खड़े कर दिए हैं। बढ़ता कर्ज, भारी प्रतिबद्ध दायित्व, राजकोषीय घाटे का निर्धारित सीमा से लगातार बाहर रहना और विकास के लिए पूंजीगत खर्च की सिकुड़ती गुंजाइश प्रदेश के वित्तीय प्रबंधन की उस तस्वीर को सामने लाती है, जिसमें आय पर खर्च का दबाव और खर्च के लिए कर्ज पर बढ़ती निर्भरता साफ दिखाई देती है।

मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने वीरवार को विधानसभा में वर्ष 2024-25 की कैग रिपोर्ट पेश की। रिपोर्ट के अनुसार 2024-25 में प्रदेश का राजकोषीय घाटा ₹12,611.05 करोड़ रहा, जो राज्य के सकल घरेलू उत्पाद (GSDP) का 5.44 प्रतिशत है। यह एफआरबीएम कानून में निर्धारित तीन प्रतिशत की सीमा से करीब 1.8 गुना है। यानी राजकोषीय अनुशासन की निर्धारित लक्ष्मण रेखा से हिमाचल काफी आगे निकल गया है।

वित्तीय दबाव की दूसरी बड़ी तस्वीर राजस्व खाते में उभरती है। वर्ष 2024-25 में राज्य की राजस्व प्राप्तियां ₹40,872.35 करोड़ रहीं, जबकि राजस्व व्यय ₹47,676.96 करोड़ तक पहुंच गया। यानी सरकार की नियमित आय से करीब ₹6,805 करोड़ अधिक खर्च हुआ। यह अंतर बताता है कि राज्य की मौजूदा आय व्यवस्था अपने ही नियमित दायित्वों का पूरा बोझ उठाने की स्थिति में नहीं है।

इस वित्तीय दबाव का सबसे चिंताजनक संकेत पूंजीगत खर्च और ब्याज भुगतान के बीच का बदलता समीकरण है। वर्ष 2024-25 में पूंजीगत व्यय ₹5,956.83 करोड़ रहा, जबकि पुराने कर्ज पर ब्याज चुकाने में ही ₹6,260.93 करोड़ खर्च हो गए। यानी विकास और परिसंपत्ति निर्माण के लिए किए गए पूंजीगत खर्च से करीब ₹304 करोड़ अधिक रकम केवल कर्ज के ब्याज में चली गई। कर्ज का बोझ अब विकास की गुंजाइश को ही पीछे छोड़ने लगा है।

कैग रिपोर्ट में तीन बिंदु अत्यंत चिंताजनक है एक पूंजीगत खर्च की सिकुड़ती गुंजाइश,दो बढ़ता राजकोषीय घटा तीसरा विरासत में मिले क़र्ज़ का ब्याज चुकाने की राशि पूंजीगत खर्च से 304 करोड़ से अधिक ।
अब प्रश्न उठता है कि क्या सुक्खू सरकार के वित्तीय कुप्रबंधन के चलते प्रदेश की आर्थिकी गर्त की ओर फिसल रही है या फिर केंद्र सरकार की वित्तीय पोटली की हर क्षण कसती डोर इसका कारण है? ग्राम परिवेश की टीम ने सुक्खू सरकार की राजस्व प्राप्तियों, व्यय और केंद्र से मिली वित्तीय सहायता का गहन विश्लेषण किया। पड़ताल में सामने आया कि वर्ष 2021-22 की तुलना में 2024-25 में केंद्र सरकार द्वारा आरडीजी में ₹3,363 करोड़ और जीएसटी क्षतिपूर्ति में ₹3,863.21 करोड़ की कमी किए जाने के बावजूद प्रदेश की राजस्व प्राप्तियों में ₹3,463 करोड़ की वृद्धि हुई। यह पहलू सुक्खू सरकार के पक्ष में जाता है और उसे श्रेय देता है। लेकिन दूसरी ओर, इसी अवधि में राजस्व व्यय करीब ₹11,482 करोड़ बढ़ गया। यही तथ्य सरकार के वित्तीय प्रबंधन पर एक गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।

यही वह जगह है जहां वित्तीय प्रबंधन की वास्तविक परीक्षा के लिए विरासत मिला वकाया बनाम वर्तमान” वित्तीय बैलेंस शीट जोड़ी जाए। ₹10,000 करोड़ की विरासत में मिली देनदारी में से सुक्खू सरकार ने कितना वकाया चुकाया और आज कितना शेष है। दिसम्बर 2025 में विधानसभा में सरकार ने ₹2,155 करोड़ भुगतान और ₹8,555 करोड़ शेष बताया था। उसके बाद भी 2026 में विभिन्न श्रेणियों के कर्मचारियों-पेंशनरों के 281करोड़ रुपए बकाये का भुगतान हुआ है और किया जा रहा है।
विरासत का बोझ, आपदाओं की मार और वित्तीय प्रबंधन की कसौटी पर उपलब्ध आंकड़ों की समग्र तस्वीर बताती है कि सुक्खू सरकार को सत्ता संभालते समय भारी कर्मचारी देनदारियों, बढ़ते वेतन-पेंशन दायित्व और कमजोर वित्तीय आधार की विरासत मिली। उसके कार्यकाल में केंद्र से मिलने वाला राजस्व घाटा अनुदान और जीएसटी क्षतिपूर्ति भी लगातार घटे। इसके बावजूद राज्य की अपनी कर आय बढ़ी और पुरानी कर्मचारी देनदारियों का कुछ हिस्सा चुकाया गया।
इस आकलन में वर्ष 2023 की विनाशकारी मानसूनी आपदा और 2025 की दूसरी बड़ी प्राकृतिक आपदा से पैदा हुए अतिरिक्त वित्तीय दबाव को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। फिर भी वित्तीय प्रबंधन की अंतिम कसौटी पर तस्वीर मिश्रित है। सुक्खू सरकार को जहां विपरीत परिस्थितियों में वित्तीय प्रबंधन का श्रेय मिलता वहीं राजकोषीय घाटे पर कैग रिपोर्ट सवाल भी खड़े करती है। कैग रिपोर्ट में असली चुनौती अब यही है कि बढ़ती आय को प्रतिबद्ध खर्च और कर्ज के ब्याज में खपने से बचाकर उसे पूंजी निर्माण, रोजगार और भविष्य की आय पैदा करने वाले क्षेत्रों में लगाया जाए।

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