मोहिंद्र प्रताप सिंह राणा/ग्राम परिवेश

कुछ लोग संसाधनों के सहारे अपनी मंजिल तक पहुंचते हैं और कुछ ऐसे होते हैं जो संसाधनों के अभाव को ही अपनी उड़ान का आधार बना लेते हैं। विजय सेन की क्रिकेट यात्रा इसी दूसरी श्रेणी की कहानी है। हाल ही में हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल द्वारा सम्मानित किए गए सेन उस दौर के क्रिकेटिंग सितारे रहे हैं, जब प्रदेश में क्रिकेट की अधोसंरचना आज की तरह विकसित नहीं थी। मैदान सीमित थे, सुविधाएं बेहद सामान्य थीं और क्रिकेट के लिए संस्थागत अवसर भी बहुत कम थे। लेकिन सेन के भीतर खेल के प्रति जुनून, जिद और जज्बा इतना प्रबल था कि उन्होंने उपलब्ध थोड़े से साधनों को ही अपनी प्रतिभा तराशने की प्रयोगशाला बना लिया।

स्कूली दिनों से क्रिकेट की शुरुआत करने वाले विजय सेन ने धीरे-धीरे अपनी प्रतिभा को उस मुकाम तक पहुंचाया, जहां वे हिमाचल की रणजी टीम की कप्तानी करने लगे। यह बदलाव महज एक खिलाड़ी की व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं था, बल्कि उस दौर के हिमाचली क्रिकेट की संभावनाओं का उद्घोष था। जिस प्रदेश में क्रिकेट के लिए आधारभूत ढांचा लगभग न के बराबर था, वहीं से एक खिलाड़ी का निकलकर राष्ट्रीय स्तर की प्रतिस्पर्धा में हिमाचल का नेतृत्व करना अपने आप में एक मिसाल थी।

हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय से बीए और एलएलबी, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय से एमबीए तथा एचपीयू से पीजीडीपीएम एंड एलडब्ल्यू और पीजीडीएमएम जैसी उच्च शिक्षा हासिल करने वाले सेन ने खेल को अपनी शिक्षा के रास्ते की बाधा नहीं बनने दिया। बल्कि उन्होंने मैदान और कक्षा, दोनों में अपनी जगह बनाई। उत्तर क्षेत्र अंतर-विश्वविद्यालय क्रिकेट चैंपियनशिप में हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय का प्रतिनिधित्व करते हुए वे छह बार ऑलराउंडर के रूप में खेले। सी.के. नायडू प्रतियोगिता में हिमाचल की कप्तानी भी की।

हिमाचल की अंतर-जिला क्रिकेट चैंपियनशिप में लगातार पांच वर्षों तक सर्वश्रेष्ठ ऑलराउंडर घोषित होना उनकी निरंतरता और बहुआयामी प्रतिभा का प्रमाण रहा। इसके बाद रणजी ट्रॉफी में हिमाचल का नेतृत्व करने का अवसर आया। 1985 से 1988 के बीच तीन सत्रों में उन्होंने हिमाचल रणजी टीम की कप्तानी की और 1985 से 1990 के बीच कुल 20 रणजी ट्रॉफी मुकाबले खेले। इस तरह लगभग एक दशक तक वे हिमाचल क्रिकेट की पहचान और उसके उभरते आत्मविश्वास के प्रतिनिधि बने रहे।

सेन की कहानी इसलिए भी अलग है कि उन्होंने क्रिकेट को जीवन की अंतिम मंजिल नहीं बनने दिया। खेल के साथ अपनी पढ़ाई को प्राथमिकता देते हुए उन्होंने समय रहते अपने करियर की दिशा कॉरपोरेट जगत की ओर मोड़ी। क्रिकेट के मैदान पर ऑलराउंडर रहे सेन पेशेवर जीवन में भी बहुआयामी भूमिका में नजर आए। एयरटेल में हिमाचल के सीओओ के रूप में कार्य करने के बाद उन्होंने SU-KAM में उपाध्यक्ष, SKIL Infrastructure में अध्यक्ष और GMR में Head–Corporate Affairs जैसे महत्वपूर्ण पदों पर जिम्मेदारियां निभाईं।

लेकिन कॉरपोरेट दुनिया में पहुंचने के बाद भी खेल उनसे दूर नहीं हुआ। क्रिकेट उनके लिए केवल अतीत की उपलब्धि नहीं रहा, बल्कि व्यक्तित्व का वह हिस्सा बना रहा जिसने अनुशासन, नेतृत्व, टीम भावना और दबाव में निर्णय लेने की क्षमता को आकार दिया। शायद यही कारण है कि सेन के जीवन में क्रिकेट और करियर दो समानांतर रास्ते नहीं दिखते, बल्कि एक-दूसरे को मजबूत करते हुए दिखाई देते हैं।

विजय सेन की यात्रा का असली मर्म उनके आंकड़ों से कहीं आगे है। उन्होंने उस समय क्रिकेट खेला, जब हिमाचल में क्रिकेट के लिए परिस्थितियां अनुकूल नहीं थीं; फिर भी उन्होंने परिस्थितियों को अपनी सीमा नहीं बनने दिया। सीमित संसाधनों में प्रतिभा को तराशना, खेल के साथ शिक्षा को साधना और अंततः कॉरपोरेट जगत में उच्च जिम्मेदारियों तक पहुंचना बताता है कि उपलब्धियां केवल सुविधाओं की उपज नहीं होतीं—उनके पीछे संकल्प, अनुशासन और निरंतरता की भी उतनी ही बड़ी भूमिका होती है।

आज जब हिमाचल में क्रिकेट के लिए कहीं बेहतर अधोसंरचना और अवसर उपलब्ध हैं, विजय सेन का दौर पीछे मुड़कर देखने पर एक महत्वपूर्ण संदेश देता है—प्रतिभा को अवसर चाहिए, लेकिन अवसरों के अभाव में भी प्रतिभा यदि अपने भीतर आग बचाए रखे तो वह अपना रास्ता स्वयं बना सकती है। सेन ने इसी आग को लंबे समय तक जीवित रखा और क्रिकेट की पिच से लेकर कॉरपोरेट बोर्डरूम तक अपनी पहचान स्वयं गढ़ी।

उनकी कहानी इसलिए केवल एक क्रिकेटर की कहानी नहीं है। यह उस पीढ़ी की कहानी है जिसने सीमित साधनों में बड़े सपने देखे, उन्हें श्रम से सींचा और फिर खेल के मैदान से निकलकर जीवन के दूसरे क्षेत्रों में भी अपनी छाप छोड़ी। विजय सेन ने हिमाचल की क्रिकेट पिच पर जो पारी शुरू की थी, उसका विस्तार आज भी उनके व्यक्तित्व और पेशेवर जीवन में दिखाई देता है।

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