
मोहिंद्र प्रताप सिंह राणा/ ग्राम परिवेश
हिमाचल प्रदेश की हरियाली पर अवैध कब्जों की काली परछाई कितनी गहरी हो चुकी है, इसका खुलासा अब स्वयं राज्य सरकार के हलफनामे ने कर दिया है। राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) के समक्ष प्रस्तुत शपथपत्र में हिमाचल सरकार ने स्वीकार किया है कि मार्च 2024 तक प्रदेश की लगभग 0.11 प्रतिशत वन भूमि अवैध अतिक्रमण की चपेट में पाई गई। यह अतिक्रमण संरक्षित वन, आरक्षित वन, डीम्ड फॉरेस्ट, अभयारण्यों तथा अन्य वन श्रेणियों तक फैला हुआ है।
किन्तु सरकार का यह शपथपत्र जितना तथ्य प्रस्तुत करता है, उससे कहीं अधिक प्रश्नों को अनुत्तरित छोड़ देता है। सरकार ने केवल कब्जाधारियों की संख्या और कुल अतिक्रमित भूमि का ब्यौरा देकर औपचारिकता निभाई है, परंतु यह स्पष्ट नहीं किया कि इनमें कितने अतिक्रमण जीविका की विवशता से जुड़े छोटे किसानों के हैं और कितने प्रभावशाली लोगों द्वारा किए गए व्यापक भू-दोहन के उदाहरण हैं। एक-दो बीघा तक सीमित कब्जों और पांच बीघा से अधिक फैले अतिक्रमणों के बीच का अंतर ही इस पूरे संकट की वास्तविक सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक परतों को उजागर कर सकता था, किंतु शपथपत्र इस सबसे महत्वपूर्ण वर्गीकरण पर मौन है।
यही नहीं, वन भूमि पर अतिक्रमण के पीछे दशकों से पनपती प्रशासनिक ढिलाई, राजनीतिक संरक्षण, राजस्व अभिलेखों की विसंगतियां, पुनर्वास की विफल नीतियां और ग्रामीण आजीविका के संकट जैसे मूल कारणों का भी शपथपत्र में कोई सम्यक विश्लेषण नहीं है। परिणामस्वरूप यह हलफनामा समस्या की जड़ों तक पहुंचने के बजाय केवल सतही आंकड़ों का दस्तावेज बनकर रह गया है। ऐसे में यह प्रश्न और अधिक प्रासंगिक हो उठता है कि क्या सरकार वास्तव में वन संरक्षण की गंभीर मंशा रखती है, अथवा यह शपथपत्र केवल न्यायिक औपचारिकता निभाने का एक प्रशासनिक प्रयास भर है।
वन विभाग द्वारा 6 मई को एनजीटी में दायर एफिडेविट के अनुसार प्रदेश के कुल 34,06,534.8745 हेक्टेयर वन क्षेत्र में से 3,816.830211 हेक्टेयर भूमि पर अवैध कब्जे पाए गए। सरकार ने यह भी बताया कि इनमें से लगभग 2,573.5807 हेक्टेयर भूमि से अतिक्रमण हटाया जा चुका है, जबकि शेष क्षेत्र अब भी अवैध कब्जाधारियों के नियंत्रण में है।
हलफनामे में यह भी स्वीकार किया गया कि सैकड़ों मामलों में बेदखली आदेश पारित किए गए, लेकिन अनेक मामलों में अपीलीय प्राधिकरणों अथवा हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट में सुनवाई लंबित है। यह एफिडेविट एनजीटी में स्वतः संज्ञान (सुओ-मोटो) कार्यवाही के तहत दायर किया गया, जिसमें देशभर में “दिल्ली के भौगोलिक क्षेत्रफल से पांच गुना अधिक वन भूमि पर अतिक्रमण” संबंधी रिपोर्टों पर सुनवाई चल रही है। हिमाचल उन 29 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में शामिल है जिन्होंने वन अतिक्रमण पर अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए हलफनामे दाखिल किए हैं।

सबसे गंभीर स्थिति राजधानी शिमला जिले की सामने आई है। प्रदेश में कुल अवैध अतिक्रमित वन भूमि का लगभग आधा हिस्सा अकेले शिमला में दर्ज हुआ। जिले के 3,32,253.2645 हेक्टेयर वन क्षेत्र में से 1,839.7284 हेक्टेयर भूमि पर अवैध कब्जे पाए गए। प्रतिशत के हिसाब से देखें तो शिमला में 0.55 प्रतिशत वन भूमि अतिक्रमण की भेंट चढ़ी, जो प्रदेश में सर्वाधिक है। यह आंकड़ा केवल भूमि पर कब्जे का नहीं, बल्कि उस पारिस्थितिक संतुलन पर बढ़ते दबाव का संकेत है जिस पर हिमालयी जीवन-व्यवस्था टिकी हुई है।
कुल्लू जिला अतिक्रमण के मामले में दूसरा सबसे प्रभावित क्षेत्र बनकर उभरा, जहां 4,65,420.65 हेक्टेयर वन क्षेत्र में से 815.0641 हेक्टेयर भूमि पर अवैध कब्जे दर्ज हुए। मंडी में 263.2944 हेक्टेयर, कांगड़ा में 318.9396 हेक्टेयर तथा चंबा में 137.8226 हेक्टेयर वन भूमि अतिक्रमण की जद में पाई गई। सिरमौर में 166.5814 हेक्टेयर और किन्नौर में 206.3483 हेक्टेयर भूमि पर कब्जे दर्ज किए गए। वहीं बिलासपुर, हमीरपुर, ऊना, सोलन और लाहौल-स्पीति जैसे जिलों में भी वन भूमि पर अवैध अतिक्रमण के मामले सामने आए हैं।
दरअसल, एनजीटी के समक्ष हिमाचल सरकार द्वारा दायर यह एफिडेविट केवल आंकड़ों का दस्तावेज नहीं, बल्कि उस विडंबना का आईना भी है जिसमें एक ओर हिमाचल खुद को “ग्रीन स्टेट” के रूप में प्रस्तुत करता है और दूसरी ओर उसके जंगल धीरे-धीरे अतिक्रमण, भू-माफिया, अवैध निर्माण और प्रशासनिक ढिलाई के दबाव में सिमटते जा रहे हैं।
गौरतलब है कि बीते वर्षों में एनजीटी ने हिमाचल सरकार से बार-बार वन अतिक्रमण, अवैध निर्माण और पर्यावरणीय क्षरण पर जवाब तलब किया है। सरकार ने अपने हलफनामे में यह भी संकेत दिया है कि वन भूमि से कब्जे हटाने की कार्रवाई जारी है, लेकिन कानूनी विवादों और लंबित अपीलों के कारण प्रक्रिया अपेक्षित गति नहीं पकड़ पा रही। पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि यदि हिमालयी राज्यों में वन संरक्षण को केवल कागजी कार्रवाई तक सीमित रखा गया, तो आने वाले वर्षों में भूस्खलन, जल संकट और पारिस्थितिक असंतुलन जैसी समस्याएं और विकराल रूप ले सकती हैं।