
मोहिंद्र प्रताप सिंह राणा/ग्राम परिवेश
शिमला, 20 अगस्त।
हिमाचल प्रदेश विधान सभा अध्यक्ष कुलदीप सिंह पठानियां ने बुधवार को सदन को संबोधित करते हुए कहा कि आज का दिन हम सभी के लिए ऐतिहासिक और हर्षोल्लास का क्षण है। जिस काउंसिल चैम्बर में हम आज विराजमान हैं, उसने अपने अस्तित्व के 100 वर्ष पूरे कर लिए हैं। ठीक आज ही के दिन, 20 अगस्त 1925 को तत्कालीन भारत के वायसराय लॉर्ड रीडिंग ने इस भवन का लोकार्पण किया था। यह भवन केवल पत्थरों और दीवारों का ढांचा नहीं, बल्कि भारतीय लोकतांत्रिक यात्रा और संघर्ष का एक जीवंत दस्तावेज है।
पठानियां ने कहा कि यह चैम्बर ब्रिटिश शासन के दौरान निर्मित अंतिम वास्तुशिल्पीय चमत्कारों में गिना जाता है। इसके निर्माण से पूर्व तत्कालीन लोक निर्माण सदस्य सर क्लॉड हिल ने इसकी प्रकृति और स्वरूप को लेकर विशेष परामर्श प्रक्रिया चलाई। देशभर से चुने गए पंद्रह विधायकों की समिति ने हर पहलू पर गहन मंथन किया और परिणामस्वरूप मात्र ₹8.5 लाख की लागत से यह भव्य भवन आकार ले सका।
उन्होंने कहा कि पिछले सौ वर्षों में यह भवन भारतीय राजनीति और विधायी इतिहास के अनेक निर्णायक क्षणों का साक्षी और प्रहरी रहा है। यही वह जगह है जहाँ कभी केंद्रीय विधान सभा की गूंज हुआ करती थी। इन दीवारों ने वायसरायों की भव्यता के साथ-साथ विठ्ठलभाई पटेल, मोतीलाल नेहरू जैसी महान विभूतियों की आवाज़ों को सुना और उनके चिंतन को आत्मसात किया।
स्वतंत्रता के बाद भी इस भवन का महत्व किसी भी रूप में कम नहीं हुआ। कभी यह पंजाब सरकार और हिमाचल सरकार के सचिवालय का केंद्र रहा, तो कभी आकाशवाणी का स्टूडियो। 1 अक्तूबर, 1963 को यहीं से हिमाचल प्रदेश विधान सभा का पहला सत्र आरंभ हुआ और यह भवन हिमाचल की लोकतांत्रिक धड़कनों का केंद्र बन गया।
पठानियां ने यह भी उल्लेख किया कि इस चैम्बर में स्थित ऐतिहासिक अध्यक्ष पीठ, जिसे तत्कालीन बर्मा सरकार ने केंद्रीय विधान सभा को उपहार स्वरूप भेंट किया था, आज भी हिमाचल प्रदेश विधान सभा के अध्यक्ष की पीठ के रूप में उसी गरिमा और उद्देश्य की पूर्ति कर रही है। यह केवल एक आसन नहीं, बल्कि हमारी संसदीय परंपराओं का जीवंत प्रतीक और लोकतंत्र की अविरल धारा का शाश्वत सेतु है।
उन्होंने कहा कि इस भवन की भव्यता, स्थापत्य कला और शताब्दियों की गवाही केवल अतीत की स्मृतियाँ नहीं हैं, बल्कि यह आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा-स्रोत और लोकतांत्रिक चेतना का दीपस्तंभ भी है।
भवन के कुछ अतिरिक्त तथ्य
इस भवन का निर्माण ब्रिटिशकालीन स्थापत्य शैली में ग्रेनेड पत्थरों और लम्बी खिड़कियों के साथ किया गया था, जिसकी झलक आज भी दर्शकों को आकर्षित करती है।
स्वतंत्र भारत में यह भवन संवैधानिक बदलाव, राज्यों के पुनर्गठन और लोकतांत्रिक विमर्श का केंद्र रहा है।
शिमला की ठंडी वादियों में स्थित यह चैम्बर आज भी अपनी गंभीरता, शांति और गरिमा के लिए विशेष पहचान रखता है।