विपक्ष का जनता के सरोकारों के प्रति गांभीर्य की कसौटी 

हिमाचल प्रदेश विधानसभा का बजट सत्र 14 मार्च 2023 से शुरू हो रहा है। विपक्ष और सत्तापक्ष दोनों एक दूसरे पर संस्थान बंद व खोलने के मुद्दे पर हावी होने का कोई अवसर नहीं छोड़ेंगे।  कोई भी आम जनता के गम्भीर व जटिल सरोकारों को छूने तक की हिम्मत नहीं करेगा। सेकेंडरी व  महत्वहीन मुद्धों को दोनों पक्ष इतना उछालेंगे की जनता के अति महत्वपूर्ण मुद्दे उनके सामने तुच्छ लगेंगे। मीडिया भी अपनी सुर्ख़ियों के लिए विपक्ष के  बहिर्गमन और सदन में नारेबाजी पर केंद्रित होगा।  17 मार्च को बजट आएगा। बजट की बारीकियां और कंसट्रेन को समझे बिना सत्ता पक्ष के सदस्य बजट को आज तक का महानतम बजट और विपक्ष आंकड़ों का मायाजाल व जन विरोधी कहकर नकार देगा। मीडिया भी अपने माइक व कलम लेकर सत्ताधारी और विपक्षी सदस्यों से प्रश्न करेगा कि बजट कैसा है? कोई इन पत्रकारों से पूछे की लोहार कैसे लोहे का स्वाद बताएगा स्वाद तो घोड़ा बताएगा जिसके मुंह में लोहे की लगाम डालेगी। अगर बजट के बारे में प्रश्न पूछना है कि बजट कैसा है, तो पूछो नौजवानों, किसानों, दुकानदारों, महिलाओं और उद्यमियों से जिन पर बजट की मार, भार और  सुअवसरों की बहार आएगी

        बुद्धिजीवियों व राजनीतिज्ञों का अनुमान है कि बजट सत्र में ₹75000 का कर्ज व 11000 करोड की  अन्य देनदारियां और 900 से अधिक संस्थानों को बंद करने जैसे मुद्दे हावी रहेंगे। यद्यपि कई दशकों के अंतराल के बाद विधानसभा में दोनों पक्षों की कमान नई पीढ़ी के हाथ में है। प्रदेश की जनता को आस है कि नई पीढी  का नेतृत्व पूर्व की आरोप-प्रत्यारोप घिसी-पिटी रणनीति से हटकर प्रदेश की जनता के वास्तविक मुद्दों पर चर्चा करें और उन बिंदुओं की निशानदेही करें जिनके कारण आज प्रदेश कर्ज के दलदल में धंसता जा रहा है। प्रदेश के लोग बजट सत्र की 18 बैठकों में सत्ता पक्ष की दूरगामी सोच को अपनी परखनली में डालकर देखने को आतुर है। लोग विपक्ष की जनता के सरोकारों के प्रति गांभीर्य को भी अपनी कसौटी पर परखने को बेचैन है।

क्या सत्ता पक्ष और विपक्ष जनता के सरोकारों को मान देंगे?

बजट सत्र में नई पीढ़ी का नेतृत्व प्रदेश के गंभीर मुद्दों पर चर्चा करता है या फिर पूर्ववर्ती नेतृत्व का अनुकरण करते हुए गौण मुद्दों को उछाल उछाल कर सदन की कार्यवाही  में व्यवधान डालता है या सदन से बहिर्गमन कर जनता के हितो का रक्षक होने का ढोंग करता है।  विगत कुछ दशकों में देखा गया है कि विपक्ष सेकंडरी मुद्दों, जैसे  कि  अमुक नेता ने दिल्ली के कितने दौरे किए उसका उत्तर नहीं मिला पर सदन की कार्रवाई में बाधा डाल दी। विपक्ष कई बार सदन में कई घंटों तक इसलिए नारेबाजी करता है रहा कि उसे प्रश्नकाल में अपने प्रश्न पर 3 या 4 बार से ज्यादा पूरक प्रश्न पूछने की इजाजत नहीं दी। विपक्षी सदस्यों की बात उचित है कि सत्तापक्ष उसके प्रश्नों के उत्तर दें और यह उसका जानने का हक भी है परंतु उसकी यह भी जिम्मेदारी है कि वह प्रश्न पूछती बार प्रश्न को सही ढंग से निर्मित करें। वह आधे अधूरे प्रश्न ना पूछे ऐसे महत्वहीन मुद्दों पर नारेबाजी कर और सदन की कार्यवाही मे रुकावट डालने से कई अन्य लोकहित व प्रदेशहित के महत्वपूर्ण प्रश्न, जो उस दिन की कार्यवाही में सूचित होते हैं, छूट जाते हैं। सत्ता पक्ष भी कई बार इस तरह की नारेबाजी करने के लिए रणनीति के तहत विपक्ष को उकसाता है ताकि वह गंभीर प्रश्नों के उत्तर देने से बचा रहे। विपक्ष ने बजट सत्र की “बैटल लाइन” का खाका खींच दिया है। विपक्ष में बैठी भाजपा ने सुक्खू सरकार की “तालाबंदी की नीति” को अपनी लड़ाई का मुख्य औजार बनाया है। भाजपा ने बजट सत्र से पहले ही सरकार द्वारा विभिन्न संस्थानों की अधिसूचना रद्द करने पर प्रदेश भर में धरना प्रदर्शन किए हैं।  इसी मुद्दे पर वह बजट सत्र में सरकार को घेरने की उक्ति लगाती नजर आएगी। भाजपा विधानसभा अध्यक्ष को भी घेरने की रणनीति बना चुकी है। इसकी शुरुआत पूर्व विधानसभा अध्यक्ष विपिन परमार ने विधानसभा अध्यक्ष कुलदीप पठानिया द्वारा दिए गए एक भाषण पर आपत्ति जताते हुए अध्यक्ष को चेंबर के बाहर घेरने का ऐलान किया है। विपक्ष कानून व्यवस्था के मुद्दे पर भी सरकार को घेरेगा क्योंकि हाल ही में मुख्यमंत्री के विधानसभा क्षेत्र में हुए गोलीकांड, मणिकरण में हुई तोड़फोड़ व दाड़़लाघाट में पंचायत के उपप्रधान पर हुए जानलेवा हमले को विपक्ष सुक्खू सरकार की नाकामी बताएगा। सत्ता पक्ष भी प्रदेश की खस्ता आर्थिक हालत पर विपक्ष को दबोचेगा। सत्ता पक्ष पूर्व भाजपा सरकार द्वारा धड़ाधड़ लिए गैर जरूरी कर्ज पर विपक्ष को दबाने की रणनीति बना रहा है। सरकार प्रदेश की खस्ता आर्थिक स्थिति पर श्वेत पत्र लाकर जयराम सरकार का भंडा फोड़ेगा।
विपक्ष और सत्तापक्ष की आरोप-प्रत्यारोप की रणनीति में प्रदेश की जनता क्या फिर ठगे से मुंह 5 साल देखती रहेगी?  अगर सत्ता पक्ष और विपक्ष पूर्ववर्ती सरकारों की तरह ही उपरोक्त रणनीति पर चलते हैं तो पहले की तरह हजारों शिक्षित नौजवान आयु सीमा के कारण नौकरी के लिए अयोग्य हो जाएंगे और हजारों नए युवा नौकरी की अंधी दौड़ में शामिल हो जाएंगे।  हजारों किसान अपने बच्चों को स्कूली शिक्षा, उच्च शिक्षा व तकनीकी शिक्षा दिलवाने के लिए अपने बचे हुए भूखंड को बेचने पर मजबूर होंगे। लचर स्वास्थ्य व्यवस्था के चलते हैं हजारों मरीज वक्त से पहले दम तोड़ देंगे, सैकड़ों मरीज हर दिन स्वास्थ्य संस्थानों में खून टेस्ट ,एक्स-रे ,व्हीलचेयर, स्टैचर ढूंढने ,टेस्टों की फीस जमा करवाने और फिर उनकी रिपोर्ट लेने के लिए दसों बार संस्थानों की सीढ़ियां चढ़ेगे और उतरेंगे और अंत में हताश होकर इलाज के लिए किसी निजी क्लीनिक पहुंच जाएंगे। किसान  कुव्यवस्था के कारण दिनों,महीनों कई बार तो वर्षों अपनी भूमि की मात्र निशानदेही के लिए तहसील व पटवारी के चक्कर काटते रहते हैं ।यह मुद्दे अभी तक की सरकारों के लिए प्राथमिकता वाले नहीं रहे। देखना यह है की “व्यवस्था बदलने के मिशन” से आई कांग्रेस सरकार लोगों के इन सरोकारों को प्राथमिकता के आधार पर लेने की दिशा में बजट सत्र में कोई कदम उठाती है या नहीं ?

One Response

  1. Absolutely best advice.Ruliing party must read gGramParivesh and should set a new culture.It will be appreciated around the country

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