
मोहिंद्र प्रताप सिंह राणा/ ग्राम परिवेश
गुरुकुल इंटरनेशनल सीनियर सेकेंडरी स्कूल सोलन ने 24 अप्रैल 2026 को आयोजित विशेष प्रार्थना सभा मात्र एक औपचारिक आयोजन नहीं, बल्कि विचार, संवेदना और वैश्विक जिम्मेदारी का सजीव मंच बनकर उभरी। कक्षा 12 के विद्यार्थियों द्वारा सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) पर केंद्रित यह आयोजन समाज में जागरूकता की एक गंभीर और सार्थक पहल के रूप में सामने आया।
इस विशेष सभा में एस.डी.जी. 1 (गरीबी उन्मूलन) और एस.डी.जी. 16 (शांति, न्याय एवं सशक्त संस्थाएं) को केंद्र में रखकर विद्यार्थियों ने जिस परिपक्वता और संवेदनशीलता के साथ अपने विचार प्रस्तुत किए, वह शिक्षा के वास्तविक उद्देश्य की पुनर्परिभाषा करता प्रतीत हुआ।
सभा केवल शब्दों तक सीमित नहीं रही—यह विचारों की जीवंत अभिव्यक्ति बन गई। विद्यार्थियों द्वारा प्रस्तुत विविध कार्यक्रमों में एस.डी.जी. 16 पर केंद्रित रचनात्मक प्रस्तुतियों ने यह स्पष्ट किया कि शांति और न्याय केवल आदर्श नहीं, बल्कि समाज की अनिवार्य आवश्यकता हैं।
विद्यालय परिसर में निकाली गई जागरूकता रैली ने वातावरण को एक संदेशात्मक ऊर्जा से भर दिया। पोस्टरों, नारों और प्रभावी संदेशों के माध्यम से विद्यार्थियों ने समाज के समक्ष यह प्रश्न रखा कि-

“क्या हम वास्तव में एक न्यायपूर्ण और समतामूलक व्यवस्था की ओर बढ़ रहे हैं?”
कार्यक्रम की आत्मा बनकर उभरी नृत्य-नाटिका ने दर्शकों को भावनात्मक स्तर पर झकझोर दिया, वहीं नुक्कड़ नाटक ने समाज में व्याप्त गरीबी, भ्रष्टाचार और असमानता जैसे कटु यथार्थ को निर्भीकता से उजागर किया। यह प्रस्तुति एक स्पष्ट संदेश देती है— जागरूक नागरिकता ही परिवर्तन का आधार है।
कार्यक्रम के दौरान United Nations द्वारा निर्धारित 17 सतत विकास लक्ष्यों की व्यापकता और प्रासंगिकता पर भी प्रकाश डाला गया। वर्ष 2030 तक निर्धारित इन लक्ष्यों का उद्देश्य केवल आर्थिक सुधार नहीं, बल्कि एक ऐसे समाज का निर्माण है जहाँ सम्मान, न्याय और समान अवसर हर व्यक्ति का अधिकार बनें।
विद्यालय की प्रधानाचार्या डॉ. लखविंदर अरोड़ा ने अपने प्रेरक संबोधन में शिक्षा के मूल स्वरूप को रेखांकित करते हुए कहा कि—
“शिक्षा केवल ज्ञान का संचय नहीं, बल्कि समाज के प्रति उत्तरदायित्व की समझ विकसित करने का माध्यम है।”
उनके शब्दों ने यह स्पष्ट किया कि ऐसे आयोजन विद्यार्थियों में नेतृत्व, आत्मविश्वास और सामाजिक चेतना का सशक्त संचार करते हैं।
अंततः यह आयोजन केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि विद्यालय के आदर्श वाक्य “परंपरा के साथ आधुनिकता” का सजीव प्रतिरूप बनकर सामने आया—जहाँ परंपरा की जड़ों में आधुनिक चिंतन का विस्तार दिखाई दिया।
यह पहल इस तथ्य को पुनः स्थापित करती है कि—जब शिक्षा संवेदना से जुड़ती है, तभी समाज में वास्तविक परिवर्तन की नींव रखी जाती है।