मोहिंद्र प्रताप सिंह राणा/ ग्राम परिवेश 

राज्य में कुपोषण के विरुद्ध लड़ाई अब केवल योजनाओं तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि उसे वैज्ञानिक दृष्टिकोण, संस्थागत समन्वय और जमीनी सहभागिता के माध्यम से परिणामोन्मुख अभियान का स्वरूप दिया जाएगा। इसी उद्देश्य को लेकर आयोजित उच्चस्तरीय बैठक में पोषण योजनाओं की प्रभावशीलता बढ़ाने, विभागों के बीच अभिसरण मजबूत करने तथा व्यवहारिक स्तर पर बदलाव सुनिश्चित करने को लेकर विस्तृत मंथन किया गया।

बैठक की अध्यक्षता करते हुए डॉ. एस. पी. कल्याल ने स्पष्ट किया कि पोषण सुधार केवल खाद्य उपलब्धता का विषय नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, स्वच्छता, शिक्षा और सामुदायिक जागरूकता के साझा प्रयासों से जुड़ा व्यापक सामाजिक दायित्व है। उन्होंने विभिन्न विभागों के मध्य बेहतर समन्वय को राज्य के पोषण परिणामों में सुधार की केंद्रीय शर्त बताया।

बैठक में हितधारक विभागों तथा चौधरी सरवन कुमार हिमाचल प्रदेश कृषि विश्वविद्यालय (सीएसके एचपीकेवी), पालमपुर के मध्य तकनीकी सहयोग और संसाधन साझेदारी को सुदृढ़ करने पर सहमति बनी। विशेष रूप से मिड-डे मील कर्मियों, आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं और विद्यालयी स्टाफ के लिए संरचित प्रशिक्षण एवं क्षमता निर्माण कार्यक्रमों को अंतिम रूप देने पर बल दिया गया। इसके साथ ही पौष्टिक व्यंजनों, संतुलित मेन्यू, स्वच्छता मानकों और खाद्य सुरक्षा नियमों के कड़ाई से अनुपालन को भी प्राथमिकता में रखा गया।

जमीनी स्तर पर ताजा और पोषक खाद्य उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए कृषि विज्ञान केंद्रों (KVKs) के माध्यम से “न्यूट्री-गार्डन” स्थापना और उसके विस्तार को एक प्रभावी रणनीति के रूप में चिन्हित किया गया। यह पहल केवल पोषण सुरक्षा ही नहीं, बल्कि स्थानीय स्तर पर खाद्य आत्मनिर्भरता और व्यवहारिक पोषण शिक्षा को भी नई दिशा देगी।

विचार-विमर्श के दौरान यह निर्णय लिया गया कि महिला एवं बाल विकास विभाग तथा स्कूल शिक्षा विभाग से नोडल अधिकारी नियुक्त किए जाएंगे, जो कृषि विश्वविद्यालय के साथ समन्वित कार्यप्रणाली सुनिश्चित करेंगे। यह व्यवस्था विभिन्न हितधारकों को एक साझा उद्देश्य—बेहतर पोषण परिणाम—की दिशा में संगठित रूप से कार्य करने में सक्षम बनाएगी।

सीएसके एचपीकेवी, पालमपुर ने स्कूल शिक्षा और महिला एवं बाल विकास विभागों के लिए व्यापक प्रशिक्षण मॉड्यूल विकसित करने में तकनीकी सहयोग देने की सहमति व्यक्त की। ये मॉड्यूल रसोई प्रथाओं में सुधार, न्यूट्री-गार्डन अवधारणा को मजबूत करने तथा अन्य पोषण-आधारित हस्तक्षेपों को प्रभावी बनाने पर केंद्रित होंगे। विश्वविद्यालय द्वारा चयनित कर्मियों के लिए मास्टर ट्रेनिंग कार्यक्रम आयोजित करने का प्रस्ताव भी रखा गया, ताकि प्रशिक्षण का लाभ क्षेत्रीय स्तर तक व्यवस्थित रूप से पहुंच सके।

बैठक में स्थानीय स्तर पर उपलब्ध पौष्टिक खाद्य पदार्थों को शामिल करते हुए मानकीकृत मेन्यू विकसित करने, खाद्य सुरक्षा नियमों के सख्त अनुपालन तथा प्रशिक्षण मॉड्यूल को आवश्यकता आधारित बनाने पर विशेष बल दिया गया। साथ ही शैक्षणिक एवं प्रसार संस्थानों की सतत तकनीकी मार्गदर्शन और जमीनी सहयोग में भूमिका को भी रेखांकित किया गया।

यह भी तय किया गया कि सभी संबंधित विभागों और संस्थानों की भूमिकाओं, समय-सीमा और उत्तरदायित्वों को स्पष्ट रूप से परिभाषित करते हुए एक समन्वित कार्ययोजना तैयार की जाएगी। मजबूत निगरानी तंत्र, समय-समय पर समीक्षा और हितधारकों की निरंतर क्षमता वृद्धि को इस अभियान की आधारशिला माना गया।

बैठक का समापन राज्य में पोषण संबंधी हस्तक्षेपों को “मिशन मोड” में आगे बढ़ाने की सामूहिक प्रतिबद्धता के साथ हुआ। अध्यक्ष डॉ. एस. पी. कल्याल ने कहा कि योजनाओं की वास्तविक सफलता आंकड़ों में नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर दिखाई देने वाले बदलाव—बेहतर आहार विविधता, स्वच्छता व्यवहार और सामुदायिक सहभागिता—में निहित होगी। 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *