मोहिंद्र प्रताप सिंह राणा/ ग्राम परिवेश
“नारी शक्ति वंदन अधिनियम, 2023 को जिस ऐतिहासिक उपलब्धि के ताम-झाम के साथ प्रस्तुत किया गया, उसी क्षण उसे दो सतत जंजीरों में जकड़ दिया गया—नई जनगणना और परिसीमन—जिनकी चाबी सत्ता ने अपने पास सुरक्षित रखी। यदि तत्कालीन सत्तासीन सरकार की मंशा इसे तत्काल प्रभाव से लागू करने की होती, तो इन शर्तों के साथ स्पष्ट समय-सीमा भी तय की जाती और जनगणना की प्रक्रिया को बिना विलंब शुरू कर दिया जाता। उस समय उसके पास दो-तिहाई बहुमत का संबल भी था और विपक्ष, विशेषकर कांग्रेस, के समर्थन की संभावनाएं भी मौजूद थीं।
इसके उलट, आलोचकों के अनुसार यह अधिनियम एक ऐसे राजनीतिक औजार के रूप में गढ़ा गया, जिसे समयानुकूल प्रयोग में लाया जा सके—जहां महिला आरक्षण का वादा चुनावी विमर्श में बार-बार उछाला जाए, लेकिन उसका वास्तविक क्रियान्वयन टलता रहे। इसी संदर्भ में प्रियंका गांधी वाड्रा ने अपने भाषण में हंसते-हंसते तीखा व्यंग्य करते हुए कहा कि “बार-बार बहकाने वाले पुरुषों को महिला झट से पहचान लेती हैं”, जो इस पूरे मुद्दे पर सियासी नीयत पर सीधा सवाल खड़ा करता है।
यहीं से यह विमर्श केवल एक संवैधानिक प्रावधान की व्याख्या तक सीमित नहीं रहता, बल्कि अपने भीतर छिपी उस संरचना को उजागर करता है, जो अधिकार और उसकी प्राप्ति के बीच एक सुनियोजित दूरी बनाए रखती है।
संविधान में जोड़े गए प्रावधान साफ संकेत देते हैं कि यह आरक्षण किसी आज या कल का अधिकार नहीं, बल्कि जनगणना और परिसीमन की लंबी, अनिश्चित और राजनीतिक रूप से नियंत्रित प्रक्रिया से बंधा हुआ है। यानी महिलाओं के नाम पर किया गया यह संवैधानिक ऐलान दरअसल एक ऐसी शर्तों की जंजीर में जकड़ा है, जिसकी चाबी सत्ता के हाथ में सुरक्षित रखी गई है।

और यहीं से सामाजिक न्याय का प्रश्न धीरे-धीरे चुनावी गणित के कठोर मैदान में धकेल दिया जाता है, जहां अधिकार का मूल्य उसके क्रियान्वयन में नहीं, बल्कि उसके बार-बार किए जाने वाले वादों में तय होने लगता है। 2029 का जिक्र कानून में नहीं है, लेकिन राजनीति ने उसे एक सुविधाजनक पड़ाव बना दिया है—ऐसा पड़ाव, जहां तक पहुंचने से पहले कई चुनावी मौसम गुजरेंगे और हर मौसम में महिलाओं को “आने वाले अधिकार” का सपना दिखाया जाएगा।
इसी क्रम में हाल ही में लोकसभा में लाया गया संशोधन, जो इस आरक्षण को तत्काल लागू करने या कम से कम इसकी समय-सीमा तय करने की मांग कर रहा था, जिस तरह से वोटिंग में गिर गया, उसने इस पूरे खेल को और निर्वस्त्र कर दिया है। एक ओर वे आवाजें थीं जो पूछ रही थीं कि महिलाओं को अधिकार देने में और कितनी प्रतीक्षा? और दूसरी ओर सत्ता पक्ष था, जो प्रक्रिया, संतुलन और संवैधानिक जटिलताओं की आड़ लेकर इस प्रतीक्षा को ही नीति का हिस्सा बताता रहा।
यहां प्रश्न केवल प्रक्रिया का नहीं, बल्कि प्राथमिकताओं का है—क्योंकि जब राजनीतिक इच्छाशक्ति प्रबल होती है, तो जटिलताएं रास्ता बनती हैं; और जब इरादा नियंत्रण बनाए रखने का हो, तो वही जटिलताएं दीवार बन जाती हैं। संशोधन का गिरना इसी दीवार का सबसे स्पष्ट प्रमाण बनकर सामने आता है, जो बताता है कि महिला आरक्षण अभी भी एक सुनिश्चित अधिकार नहीं, बल्कि समयानुकूल साधन के रूप में सुरक्षित रखा गया है।
यही कारण है कि राजनीतिक दलों की दोहरी भूमिका अब अधिक स्पष्ट दिखने लगी है—एक ओर सशक्तिकरण का उद्घोष, और दूसरी ओर उसी सशक्तिकरण को चुनावी समीकरणों के अनुसार टालने और साधने की प्रवृत्ति। महिला यहां अधिकार की पात्र कम और वोट के गणित की धुरी अधिक बनती दिखाई देती है।
पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु जैसे राज्यों में, जहां महिला मतदाता निर्णायक भूमिका में हैं, यह कानून एक ऐसे वादे के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है, जिसे अभी पूरा नहीं किया गया, लेकिन बार-बार दोहराया जा सकता है। यह सशक्तिकरण का स्थगन है—एक ऐसा स्थगन, जो हर चुनाव में नई चमक के साथ पेश किया जाता है, लेकिन जमीनी हकीकत में जस का तस बना रहता है।
अंततः इस पूरे घटनाक्रम में सबसे गहरी चोट उस भरोसे पर पड़ती है, जिसे महिलाएं लोकतांत्रिक व्यवस्था से जोड़कर देखती हैं। जब अधिकार को शर्तों में बांध दिया जाए और फिर उन शर्तों को समय के धुंधले गलियारों में भटका दिया जाए, तो वह सशक्तिकरण नहीं, बल्कि आश्वासन की राजनीति बन जाता है।
नारी वंदन अधिनियम 2023 का सार यही है—दरवाजा खुला दिखता है, लेकिन उसकी चौखट तक पहुंचने का रास्ता राजनीतिक मंशाओं, प्रशासनिक बहानों और चुनावी रणनीतियों की भूलभुलैया में उलझा हुआ है। महिलाओं के नाम पर गढ़ा गया यह कानून फिलहाल अधिकार से अधिक प्रतीक्षा, और सशक्तिकरण से अधिक राजनीतिक साधन बनकर खड़ा है।”