चित्र एआई द्वारा तैयार किया है।

मोहिंद्र प्रताप सिंह राणा/ ग्राम परिवेश

हर वर्ष 22 अप्रैल को मनाया जाने वाला पृथ्वी दिवस केवल एक औपचारिक उत्सव नहीं, बल्कि मानव सभ्यता के सामने खड़ा एक कठोर प्रश्न है—क्या हम विकास के नाम पर अपने ही बच्चों का भविष्य नष्ट कर रहे हैं? यह दिन हमें आईना दिखाता है कि जिस धरती ने हमें जीवन दिया, हम उसी को अपनी असीमित लालसा से घायल कर रहे हैं।

आज मानव का लालच प्रकृति के संतुलन पर भारी पड़ रहा है। हरे-भरे जंगल, जो कभी जीवन की शुद्धता और संतुलन के प्रतीक थे, अब तेजी से कंक्रीट के जंगलों में बदलते जा रहे हैं। वैश्विक स्तर पर हर वर्ष लगभग 10 मिलियन हेक्टेयर जंगल नष्ट हो रहे हैं—यह मानो हर मिनट कई फुटबॉल मैदानों जितनी हरियाली के खत्म होने जैसा है। यह केवल पेड़ों की कटाई नहीं, बल्कि हमारी आने वाली पीढ़ियों की सांसों का हनन है।

प्रकृति के दोहन की यह भूख यहीं नहीं रुकती। आधुनिक तकनीकी सुविधाओं की अंधी दौड़ ने दुर्लभ खनिजों (Rare Earth) के अंधाधुंध उत्खनन को जन्म दिया है। स्मार्टफोन, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण और औद्योगिक विस्तार की कीमत धरती की गहराइयों से वसूली जा रही है। यह विकास नहीं, बल्कि संसाधनों का ऐसा क्षरण है, जो भविष्य को खोखला कर रहा है।

सबसे भयावह स्थिति प्लास्टिक प्रदूषण की है। आज विश्व हर वर्ष लगभग 36 करोड़ टन प्लास्टिक कचरा उत्पन्न कर रहा है—यानी प्रतिदिन 10 लाख टन से अधिक प्लास्टिक धरती पर फेंका जा रहा है। दुखद यह है कि इसका 10% से भी कम हिस्सा पुनर्चक्रित हो पाता है, जबकि शेष पर्यावरण में जहर की तरह फैल जाता है। हर साल 10 से 20 लाख टन प्लास्टिक समुद्रों में पहुंचता है, जो समुद्री जीवन को निगल रहा है और अंततः खाद्य श्रृंखला के माध्यम से हमारे शरीर तक लौट रहा है।

यदि प्रति व्यक्ति आंकड़ों पर नजर डालें, तो दुनिया का एक औसत इंसान प्रतिदिन लगभग 0.8 से 0.9 किलोग्राम कचरा पैदा कर रहा है—और इसमें प्लास्टिक की हिस्सेदारी लगातार बढ़ रही है। यह आंकड़े केवल संख्या नहीं, बल्कि हमारी लापरवाही का जीवंत प्रमाण हैं।

विडंबना यह है कि जिसे हम ‘विकास’ समझ रहे हैं, वह दरअसल विनाश की पटकथा बनता जा रहा है। हमने सुविधा को आवश्यकता बना लिया और आवश्यकता को लालच में बदल दिया। परिणामस्वरूप, आज हमारी नदियाँ प्रदूषित हैं, हवा जहरीली है और धरती की उर्वरता लगातार घट रही है।

“हर गिरता हुआ पेड़ और हर फेंका गया प्लास्टिक का टुकड़ा, हमारी आने वाली पीढ़ियों के भविष्य पर लिखा जा रहा एक अदृश्य अभिशाप है।”

समाधान असंभव नहीं है, लेकिन इसके लिए सोच और व्यवहार में परिवर्तन अनिवार्य है। हमें वृक्षारोपण को केवल अभियान नहीं, बल्कि जीवनशैली बनाना होगा। प्लास्टिक के उपयोग को न्यूनतम करना होगा और ‘उपयोग करो और फेंको’ की मानसिकता को त्यागना होगा। साथ ही, संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग और पुनर्चक्रण को प्राथमिकता देनी होगी।

सबसे महत्वपूर्ण यह है कि हम अपने बच्चों को केवल आधुनिकता नहीं, बल्कि पर्यावरणीय संवेदनशीलता भी सिखाएं। क्योंकि पृथ्वी हमारे पूर्वजों की विरासत नहीं, बल्कि हमारे बच्चों से लिया गया उधार है।

पृथ्वी दिवस हमें चेतावनी देता है—अगर आज भी हम नहीं संभले, तो आने वाली पीढ़ियाँ हमें प्रगति का निर्माता नहीं, बल्कि अपने भविष्य का अपराधी मानेंगी। अब समय है कि हम लालच की सीमाओं को पहचानें और जिम्मेदारी की राह पर चलें, ताकि धरती सुरक्षित रहे और भविष्य मुस्कुराता हुआ दिखाई दे। 

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