मोहिन्द्र प्रताप सिंह राणा

ण्डी जिले के थाची वन क्षेत्र और नाचन वन मंडल से जुड़े इलाकों में यदि वनभूमि अथवा सामुदायिक भूमि को साफ कर मानसूनी मटर जैसी नकदी फसलों के लिए जमीन तैयार करने में ग्लाइफोसेट जैसे गैर-चयनात्मक खरपतवारनाशकों का इस्तेमाल हो रहा है, तो इसे महज खेती की एक आक्रामक पद्धति मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यह वनस्पति हटाने की ऐसी प्रक्रिया है जिसमें रासायनिक नियंत्रण और वनक्षेत्र की भौतिक सफाई मिलकर पहाड़ के उस प्राकृतिक सुरक्षा कवच को कमजोर कर देते हैं, जो मिट्टी, पानी और ढलानों को थामे रखता है।

ग्लाइफोसेट एक सिस्टमिक और गैर-चयनात्मक खरपतवारनाशक है। अर्थात यह केवल किसी एक अवांछित घास को नहीं चुनता, बल्कि संपर्क में आने वाली अनेक प्रकार की वनस्पतियों को प्रभावित कर सकता है। इसलिए यदि इसका इस्तेमाल वन की झाड़ियों, घास, प्राकृतिक पुनर्जनन और छोटे पौधों को खत्म कर खेती योग्य पट्टी बनाने के लिए किया जाता है, तो नुकसान केवल दिखाई देने वाली हरियाली तक सीमित नहीं रहता। वन की निचली परत—जिसमें घास, झाड़ियां, पौधों के अंकुर और अन्य देशज वनस्पतियां शामिल होती हैं—मिट्टी को ढककर रखने, नमी बनाए रखने और वर्षा के पानी की गति को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इन परतों के हटने से जमीन ऊपर से खाली और भीतर से कमजोर होने लगती है।

पहाड़ में असली संकट यहीं से शुरू होता है।

मैदानी इलाके में जमीन साफ करना और पहाड़ी ढलान को वनस्पति-विहीन करना एक जैसी बात नहीं है। हिमाचल की ढलानों पर पेड़ों और झाड़ियों की जड़ें मिट्टी को बांधने वाले प्राकृतिक जाल की तरह काम करती हैं। जब वनस्पति हटती है और उसके बाद खेत बनाने के लिए जमीन को काटा-खोदा जाता है, तो वर्षा का पानी मिट्टी में धीरे-धीरे समाने के बजाय तेज बहाव के रूप में नीचे की ओर जाने लगता है। इससे ऊपरी उपजाऊ मिट्टी का कटाव बढ़ सकता है और ढलान की स्थिरता कमजोर हो सकती है।

इसलिए यहां खतरा केवल जंगल के उजड़ने का नहीं, बल्कि मिट्टी के बह जाने और ढलान के अस्थिर होने का भी है। मानसून में यह जोखिम और बढ़ जाता है। भारी बारिश के दौरान बिना वनस्पति वाली ढलान पर पानी मिट्टी के कणों को बहाकर नालों और छोटी धाराओं तक ले जा सकता है। यही प्रक्रिया आगे चलकर गाद बढ़ाती है और स्थानीय जलधाराओं की गुणवत्ता तथा प्रवाह व्यवस्था को प्रभावित कर सकती है।

मिट्टी पर रासायनिक असर

ग्लाइफोसेट मिट्टी में पहुंचने के बाद मिट्टी के कणों तथा कार्बनिक पदार्थों से मजबूती से जुड़ सकता है और उसका व्यवहार मिट्टी की संरचना, खनिजों, जैविक पदार्थ, वर्षा तथा अन्य पर्यावरणीय परिस्थितियों पर निर्भर करता है। वैज्ञानिक अध्ययनों में यह भी स्पष्ट किया गया है कि इसकी गतिशीलता हर मिट्टी में एक जैसी नहीं होती; भारी वर्षा और कुछ विशेष मिट्टी संरचनाओं में इसका बहाव या जल निकासी तंत्र की ओर स्थानांतरण संभव है।

इसीलिए यह कहना अतिशयोक्ति होगा कि हर स्थिति में ग्लाइफोसेट भूजल को प्रदूषित करेगा; लेकिन यह कहना भी सुरक्षित नहीं कि पहाड़ी क्षेत्र में इसका इस्तेमाल पानी के लिए कोई जोखिम पैदा ही नहीं करता। जोखिम का आकलन वास्तविक इस्तेमाल की मात्रा, छिड़काव के समय, वर्षा की तीव्रता, ढलान, मिट्टी की संरचना और निकटवर्ती जलधाराओं की स्थिति के आधार पर होना चाहिए।

मिट्टी का दूसरा संकट जैविक है। मिट्टी केवल खनिजों का ढेर नहीं होती। उसमें बैक्टीरिया, फफूंद और असंख्य सूक्ष्मजीवों का जटिल संसार होता है, जो पोषक तत्वों के चक्र, जैविक पदार्थों के अपघटन और मिट्टी की उर्वरता में भूमिका निभाता है। ग्लाइफोसेट के व्यापक और अनुचित इस्तेमाल को लेकर वैज्ञानिक साहित्य में मिट्टी के सूक्ष्मजीव समुदाय तथा पारिस्थितिक संतुलन पर संभावित प्रभावों की चिंता दर्ज की गई है।

अर्थात, जंगल हटाकर कुछ महीनों की फसल पैदा करने की जल्दबाजी में जिस जमीन को ‘खाली’ समझा जा रहा है, वह वास्तव में एक जीवित पारिस्थितिकी तंत्र है। रसायन और वनस्पति सफाई उस तंत्र की कई परतों को एक साथ प्रभावित कर सकती है।

पानी के लिए खतरा रसायन से भी बड़ा है

वनभूमि को साफ करने के बाद होने वाला मिट्टी का कटाव पानी के संकट को और गंभीर बना सकता है। ग्लाइफोसेट मिट्टी से जुड़कर बहते पानी के साथ मिट्टी के कणों में भी जा सकता है। शोधों में यह पाया गया है कि भारी वर्षा और सतही बहाव कुछ परिस्थितियों में इसके जलस्रोतों तक पहुंचने का माध्यम बन सकते हैं।

2026 में प्रकाशित एक व्यापक वैज्ञानिक समीक्षा ने भी जलीय पारिस्थितिक तंत्रों में ग्लाइफोसेट के प्रभावों को लेकर चिंता दर्ज की है। इसके अनुसार जलीय पौधे संवेदनशील समूहों में शामिल हैं और दीर्घकालिक प्रभावों को लेकर अभी भी महत्वपूर्ण ज्ञान-अंतर मौजूद हैं। व्यावसायिक ग्लाइफोसेट फॉर्मुलेशन में मौजूद सहायक रसायन कुछ परिस्थितियों में अकेले ग्लाइफोसेट की तुलना में अधिक विषाक्त प्रभाव पैदा कर सकते हैं।

इसलिए पहाड़ी जलधाराओं के मामले में सवाल केवल यह नहीं होना चाहिए कि ‘ग्लाइफोसेट पानी में कितना पहुंचा?’ बल्कि यह भी होना चाहिए कि उसके साथ कितनी मिट्टी, जैविक सामग्री और अन्य कृषि रसायन बहकर नीचे गए।

जंगल को मारकर खेत बनाना—सिर्फ जमीन का इस्तेमाल बदलना नहीं

यदि वन क्षेत्र की प्राकृतिक वनस्पति को जानबूझकर नष्ट करके वहां खेती का विस्तार किया जाता है, तो यह वन भूमि के उपयोग को बदलने का गंभीर प्रश्न भी बन जाता है। वर्तमान वन संरक्षण कानून के तहत वन भूमि को गैर-वानिकी उपयोग में लाने पर केंद्रीय स्वीकृति से संबंधित प्रतिबंध हैं और वन भूमि को तोड़कर या साफ करके कृषि/बागवानी जैसे गैर-वानिकी उपयोग में लाने को कानून विशेष रूप से संबोधित करता है।

इसी तरह, आरक्षित वन में भूमि साफ करना अथवा खेती के लिए भूमि को तोड़ना भारतीय वन अधिनियम, 1927 की धारा 26 में निषिद्ध कृत्यों में शामिल है, जब तक कि लागू वैधानिक अनुमति या अधिकार उसके पक्ष में न हो।

इसलिए यदि किसी क्षेत्र की वन स्थिति और भूमि का कानूनी दर्जा इसकी पुष्टि करता है, तो मामला केवल ‘खरपतवारनाशक के गलत इस्तेमाल’ तक सीमित नहीं रहेगा। तब प्रश्न वनभूमि की सफाई, अतिक्रमण, भूमि उपयोग परिवर्तन और वन पारिस्थितिकी के नुकसान तक विस्तृत होगा।

असली कीमत फसल कटने के बाद सामने आएगी

मटर की एक फसल आर्थिक लाभ दे सकती है, लेकिन वन की एक प्राकृतिक परत बनने में वर्षों लगते हैं। जंगल की जगह कुछ महीनों की नकदी फसल खड़ी करके तत्काल लाभ कमाया जा सकता है, परंतु उसके बदले मिट्टी की ऊपरी परत, प्राकृतिक पुनर्जनन, जैव विविधता, जलधारण क्षमता और ढलान की स्थिरता को होने वाला नुकसान लंबे समय तक बना रह सकता है।

सबसे चिंताजनक स्थिति तब होगी जब वनस्पति हटाने के लिए रसायन, जमीन खोलने के लिए कटान और खेती के लिए लगातार जुताई—तीनों एक ही ढलान पर मिल जाएं। ऐसी स्थिति में प्रकृति की सुरक्षा की तीन प्रमुख दीवारें—वनस्पति आवरण, जड़ों का जाल और मिट्टी की संरचना—एक साथ कमजोर होती हैं।

इसलिए थाची-नाचन क्षेत्र में यदि इस तरह की गतिविधियों की शिकायतें सामने आ रही हैं, तो मामला केवल खेत और जंगल की सीमा का विवाद मानकर नहीं छोड़ा जाना चाहिए। संबंधित एजेंसियों को वनभूमि की सीमांकन स्थिति, वनस्पति क्षति, भूमि उपयोग में बदलाव, इस्तेमाल किए गए रसायन की प्रकृति और मात्रा तथा निकटवर्ती धाराओं और मिट्टी के नमूनों की वैज्ञानिक जांच करनी चाहिए।

क्योंकि सवाल अंततः यह नहीं है कि एक मौसम में कितने किलो मटर पैदा हुए। सवाल यह है कि उस मटर की फसल के नीचे कितनी वन मिट्टी दबी, कितनी प्राकृतिक वनस्पति मरी और बारिश के साथ पहाड़ की कितनी मिट्टी पानी में बह गई।

पहाड़ में जंगल काटकर खेत बनाना केवल पेड़ हटाना नहीं है। यह उस प्राकृतिक व्यवस्था को कमजोर करना है जो मिट्टी को थामती, पानी को रोकती और ढलान को स्थिर रखती है। और यदि इस काम को तेज करने के लिए रसायनों का सहारा लिया जा रहा है, तो यह प्रकृति के साथ छेड़छाड़ की गति को और तेज कर देता है।

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