
मोहिंद्र प्रताप सिंह राणा/ ग्राम परिवेश
स्वतंत्रता के बाद अस्तित्व की पहचान पाने के लिए लंबा राजनीतिक संघर्ष करने वाला छोटा-सा पहाड़ी प्रदेश हिमाचल प्रदेश आज भी प्रशासनिक पुनर्संतुलन की एक अधूरी बहस से गुजर रहा है। पूर्ण राज्य बनने की यात्रा भले पूरी हो चुकी हो, लेकिन 12 जिलों की मौजूदा संरचना समय, भूगोल, जनसंख्या और प्रशासनिक आवश्यकताओं की नई कसौटियों पर बार-बार सवालों के घेरे में खड़ी दिखाई देती है। यही कारण है कि नए जिलों के गठन अथवा पुनर्गठन की फुसफुसाहट समय-समय पर जनभावना बनकर उभरती रही है।
यह ऐसा मुद्दा है, जिसे प्रदेश की राजनीति ने अक्सर चुनावी मौसम में हवा दी है। सत्ता की दहलीज पर खड़े नेता और मंत्री पद की आकांक्षा रखने वाले जनप्रतिनिधि इस संवेदनशील प्रश्न को बार-बार उछालते रहे, लेकिन चुनावी घोषणाओं की गूंज सत्ता के गलियारों तक पहुंचते-पहुंचते अक्सर मौन में बदल जाती रही। जनता अब इसे केवल वादा नहीं, बल्कि प्रशासनिक न्याय और संतुलित विकास के प्रश्न के रूप में देखने लगी है।
प्रदेश की राजनीति में इस विषय पर सबसे गंभीर पहल पूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय वीरभद्र सिंह के कार्यकाल में दिखाई दी थी। उन्होंने शिमला जिले के पुनर्गठन कर रामपुर को जिला बनाने की प्रक्रिया को लगभग अंतिम पड़ाव तक पहुंचा दिया था। किंतु उसी समय कांगड़ा और मंडी से उठी अनेक नई एवं व्यावहारिकता से परे मानी गई जिला मांगों ने पूरे प्रस्ताव को उलझा दिया और सरकार को कदम पीछे खींचने पड़े।
इसके बाद पूर्व मुख्यमंत्री प्रोफेसर प्रेम कुमार धूमल ने भी सबसे बड़े जिले कांगड़ा के प्रशासनिक विभाजन का गंभीर अध्ययन कराया। देहरा और पालमपुर को जिला बनाने की संभावनाएं लगभग आकार लेने लगी थीं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना रहा है कि “शिमला की सत्ता का रास्ता कांगड़ा से होकर गुजरता है”, इसलिए यह निर्णय केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि राजनीतिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण था। लेकिन तभी नूरपुर को जिला बनाने की मांग ने जोर पकड़ लिया, जबकि दूसरी ओर रामपुर की मांग भी पुनः मुखर हो गई। बढ़ती मांगों के बीच सरकार ने पूरा मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया।

पूर्व मुख्यमंत्री शांता कुमार भी समय-समय पर पालमपुर को जिला बनाने की आवश्यकता का समर्थन करते रहे। स्पष्ट है कि यह विषय किसी एक दल की राजनीति नहीं, बल्कि दशकों से प्रदेश की प्रशासनिक और राजनीतिक बहस का हिस्सा रहा है।
अब 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले यह बहस फिर करवट लेती दिखाई दे रही है। रामपुर और देहरा की मांग एक बार फिर जनचर्चा के केंद्र में है। देहरा क्षेत्र में तो आम धारणा यह बन चुकी है कि जिले के अनुरूप अधिकांश प्रशासनिक ढांचा तैयार हो चुका है, अनेक कार्यालय और अधिकारी भी तैनात हैं; केवल औपचारिक घोषणा शेष है। दूसरी ओर रामपुर की मांग भी शिमला जिले के भौगोलिक विस्तार और प्रशासनिक सुविधा के तर्कों के साथ फिर मुखर होने लगी है।
राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी तेज हो रही है कि मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू कठिन और दूरगामी निर्णय लेने वाले नेता के रूप में अपनी अलग पहचान बना चुके हैं। यदि उनकी सरकार प्रशासनिक पुनर्गठन के प्रश्न पर ठोस पहल करती है, तो यह केवल नए जिलों की घोषणा भर नहीं होगी, बल्कि प्रदेश की राजनीतिक धुरी, चुनावी समीकरण और क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व का पूरा कैनवस बदल सकता है।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अब यह मांग केवल राजनीतिक मंचों तक सीमित नहीं रह गई है। दूरस्थ क्षेत्रों के लोग इसे प्रशासन तक आसान पहुंच, विकास योजनाओं के संतुलित क्रियान्वयन, बेहतर आपदा प्रबंधन और क्षेत्रीय असंतुलन दूर करने की आवश्यकता से जोड़कर देख रहे हैं। ऐसे में सरकार के सामने प्रश्न केवल नए जिले बनाने का नहीं, बल्कि यह तय करने का है कि क्या प्रशासनिक व्यवस्था को बदलती भौगोलिक और जनसांख्यिकीय वास्तविकताओं के अनुरूप ढालने का समय आ गया है।
यदि यह जनस्वर लगातार मुखर होता रहा, तो जिलों के पुनर्गठन का मुद्दा 2027 के चुनाव का सबसे प्रभावशाली राजनीतिक विमर्श बन सकता है—ऐसा विमर्श, जो केवल चुनावी घोषणा नहीं, बल्कि प्रदेश के प्रशासनिक भविष्य की दिशा भी तय कर सकता है।