
मोहिंद्र प्रताप सिंह राणा/ग्राम परिवेश
शिमला। केंद्र की आर्थिक नीतियों के खिलाफ हिमाचल में किसान-मजदूरों का आक्रोश अब अलग-अलग मुद्दों का विरोध भर नहीं रह गया है। चार लेबर कोड, मुक्त व्यापार समझौतों, प्रस्तावित भारत-अमेरिका ट्रेड डील, निजीकरण और बढ़ती बेरोजगारी-महंगाई को लेकर उठी आवाज ने विकास की उस नीति-दिशा पर सीधा सवाल खड़ा किया है, जिसमें आंदोलनकारी संगठनों के आरोप के मुताबिक श्रम, कृषि और सार्वजनिक संसाधनों की कीमत पर कॉरपोरेट हितों को बढ़ती जगह मिल रही है। शिमला से रामपुर और नाहन तक तथा प्रदेश के 25 स्थानों पर हुए प्रदर्शनों ने यह राजनीतिक-आर्थिक सवाल तेज किया कि बाजार का विस्तार यदि किसान की आय, मजदूर की सुरक्षा और छोटे उद्योग की टिकाऊ क्षमता से कट जाए, तो विकास का लाभ आखिर किसके हिस्से में जाता है।
25 स्थानों पर प्रतिरोध, शिमला में जेल भरो
‘खेती बचाओ, उद्योग बचाओ, भारत बचाओ’ के नारे के साथ सीटू और हिमाचल किसान सभा के आह्वान पर शिमला में जेल भरो आंदोलन हुआ। रामपुर और नाहन में चक्का जाम किया गया, जबकि अन्य जिला एवं ब्लॉक मुख्यालयों समेत प्रदेश में 25 स्थानों पर रैलियां, धरने और प्रदर्शन हुए।
शिमला में सैकड़ों प्रदर्शनकारी गिरफ्तारियां देने के लिए रिपोर्टिंग रूम पहुंचे और करीब डेढ़ घंटे तक प्रदर्शन किया। हालांकि जिला प्रशासन ने किसी प्रदर्शनकारी को गिरफ्तार नहीं किया। प्रशासन के मान-मनौव्वल के बावजूद प्रदर्शनकारी गिरफ्तारी देने की मांग पर डटे रहे।
इससे पहले जैन धर्मशाला, रिज मैदान और इवनिंग कॉलेज से निकली तीन रैलियां रिपोर्टिंग रूम पहुंचकर जनसभा में तब्दील हो गईं। यहां केंद्र की श्रम, कृषि और आर्थिक नीतियों के खिलाफ नारेबाजी हुई।
प्रदर्शन में सीटू, हिमाचल किसान सभा, सेब उत्पादक संघ, पेंशनर एसोसिएशन, एसएफआई, जनवादी महिला समिति, डीवाईएफआई, एआईएलयू, दलित शोषण मुक्ति मंच और शिमला नागरिक सभा समेत विभिन्न संगठनों के कार्यकर्ता शामिल हुए।

लेबर कोड पर श्रमिक अधिकारों का सवाल
प्रदर्शनकारियों ने चार लेबर कोड को मजदूर विरोधी बताते हुए इन्हें रद्द करने की मांग की। सीटू नेताओं का दावा है कि इनके लागू होने से बड़ी संख्या में श्रमिक मौजूदा श्रम-सुरक्षा के दायरे से बाहर हो सकते हैं। संगठनों ने प्रत्येक मजदूर के लिए कम से कम 42 हजार रुपये मासिक मजदूरी सुनिश्चित करने की मांग भी की।
आंदोलनकारियों का तर्क है कि श्रम सुधार के नाम पर यदि रोजगार सुरक्षा और सामूहिक सौदेबाजी की ताकत कमजोर होती है, तो “लचीला श्रम बाजार” अंततः नियोक्ता के लिए लचीलापन और श्रमिक के लिए असुरक्षा बन सकता है।
FTA पर हिमाचल के सेब की चिंता
मुक्त व्यापार समझौतों और भारत-अमेरिका ट्रेड डील को लेकर आंदोलनकारियों ने हिमाचल की बागवानी और छोटे उद्योगों पर संभावित असर को प्रमुखता से उठाया। उनका कहना है कि आयात प्रतिस्पर्धा बढ़ने की स्थिति में घरेलू उत्पादकों पर दबाव बढ़ सकता है।
हिमाचल के लिए यह चिंता इसलिए अधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि सेब केवल एक फसल नहीं, बल्कि हजारों परिवारों की ग्रामीण अर्थव्यवस्था का आधार है। आंदोलनकारी संगठनों का सवाल है कि यदि विदेशी कृषि उत्पाद भारतीय बाजार में अपेक्षाकृत आसान पहुंच हासिल करते हैं, जबकि हिमाचली उत्पादक पहले ही उत्पादन लागत, विपणन, भंडारण और मूल्य अस्थिरता से जूझ रहा है, तो मुक्त व्यापार का जोखिम कौन उठाएगा और उसका लाभ किसे मिलेगा?

MSP की कानूनी गारंटी की मांग
प्रदर्शनकारियों ने सभी फसलों के लिए C2+50 प्रतिशत के आधार पर न्यूनतम समर्थन मूल्य की कानूनी गारंटी और सुनिश्चित सरकारी खरीद का कानून बनाने की मांग की। उन्होंने व्यापक किसान कर्जमाफी तथा आत्महत्या करने वाले किसानों के परिवारों को 25 लाख रुपये मुआवजा देने की मांग भी रखी।
उनका कहना है कि किसान को बाजार के हवाले कर देना, लेकिन उसकी लागत, मूल्य जोखिम और कर्ज के बोझ से राज्य को अलग कर लेना, कृषि संकट का स्थायी समाधान नहीं हो सकता।
मनरेगा और ग्रामीण रोजगार पर भी जोर
संगठनों ने मनरेगा को मजबूत करने, खेतिहर मजदूरों को 200 दिन का काम और 700 रुपये प्रतिदिन मजदूरी देने की मांग की। उनका कहना है कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था की मजबूती केवल कृषि उत्पादन से नहीं, बल्कि किसान और खेतिहर मजदूर की आय तथा क्रयशक्ति से तय होती है।
इसके साथ कॉरपोरेट को खेती से बाहर रखने, किसानों के भूमि और आजीविका अधिकारों की रक्षा तथा बीज अधिकार सुरक्षित रखने की मांग की गई। संगठनों ने सीड बिल, 2025 लागू न करने की मांग भी उठाई।
बिजली के निजीकरण और स्मार्ट मीटर का विरोध
प्रदर्शनकारियों ने बिजली के निजीकरण पर रोक तथा किसानों और उपभोक्ताओं के लिए प्री-पेड स्मार्ट मीटर वापस लेने की मांग की। उनका कहना है कि बिजली जैसी बुनियादी जरूरत को पूरी तरह बाजार की कसौटी पर कसने का भार अंततः कृषि और आम उपभोक्ता पर पड़ सकता है।
संगठनों ने राज्यों के संघीय अधिकारों की रक्षा तथा डिविजिबल पूल में राज्यों की हिस्सेदारी 31 से बढ़ाकर 50 प्रतिशत करने और सेस-सरचार्ज को भी इसमें शामिल करने की मांग रखी।
26 नवंबर से देशव्यापी संघर्ष का ऐलान
सीटू प्रदेशाध्यक्ष विजेंद्र मेहरा, कोषाध्यक्ष जगत राम, सेब उत्पादक संघ प्रदेशाध्यक्ष सोहन सिंह ठाकुर और हिमाचल किसान सभा नेता संदीप वर्मा ने कहा कि 10 अगस्त का आंदोलन किसी एक दिन का कार्यक्रम नहीं है। उनके अनुसार यह 26 नवंबर 2026 से प्रस्तावित देशव्यापी ‘खेती बचाओ, उद्योग बचाओ और भारत बचाओ’ संघर्ष की तैयारी है।
उन्होंने 26 नवंबर 2020 से शुरू हुए किसान-मजदूर आंदोलन का उल्लेख करते हुए कहा कि उस संघर्ष ने किसान-मजदूर एकता की ताकत दिखाई थी और अब उसी एकता को फिर व्यापक बनाने की जरूरत है।
नेताओं ने केंद्र की नीतियों को किसान-मजदूर विरोधी और कॉरपोरेटपरस्त बताते हुए कहा कि महंगाई, बेरोजगारी और असुरक्षित रोजगार के बीच आम नागरिक पर आर्थिक दबाव बढ़ रहा है, जबकि उनके आरोप के मुताबिक खेती, उद्योग, बिजली और सार्वजनिक संसाधनों में कॉरपोरेट दखल बढ़ाया जा रहा है।
मुद्दों के पीछे छिपा बड़ा सवाल
शिमला का आंदोलन इसलिए महत्वपूर्ण है कि इसमें श्रम से लेकर कृषि, व्यापार, बिजली और संघीय वित्त तक के मुद्दे एक-दूसरे से जुड़ते दिखाई दिए। आंदोलनकारी संगठनों का आरोप है कि श्रम सुधार के नाम पर श्रमिक सुरक्षा, मुक्त व्यापार के नाम पर किसान की बाजार सुरक्षा और निजीकरण के नाम पर सार्वजनिक हित को पीछे धकेला जा रहा है।
इन आरोपों का अंतिम मूल्यांकन संबंधित कानूनों और व्यापार समझौतों के वास्तविक प्रावधानों के आधार पर ही किया जा सकता है। लेकिन आंदोलन ने नीति-निर्माण के केंद्र में एक असुविधाजनक सवाल जरूर रख दिया है—
> यदि आर्थिक विकास का पैमाना निवेश, व्यापार और बाजार का विस्तार है, तो उस किसान, मजदूर और छोटे उत्पादक की आर्थिक सुरक्षा की गारंटी कौन देगा, जिसकी मेहनत इस पूरी व्यवस्था की बुनियाद है?
यही सवाल ‘खेती बचाओ, उद्योग बचाओ, भारत बचाओ’ के नारे को महज विरोध की भाषा से निकालकर केंद्र की आर्थिक नीति की दिशा पर व्यापक बहस का प्रश्न बना देता है।