
फोटो इंटरनेट पर उपलब्ध अभिलेखों से ली गई है।
मोहिंद्र प्रताप सिंह राणा/ग्राम परिवेश
निस्संदेह, हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना के पूर्ववर्ती समझौते की शर्तों पर पुनर्विचार का मुद्दा दृढ़ता से उठाते हुए अंतर-राज्यीय वार्ताओं में प्रदेश के हितों को प्रमुखता दिलाने का प्रयास किया। राज्य सरकार का दावा है कि संशोधित एमओयू के माध्यम से हिमाचल पर प्रस्तावित लगभग 2,000 करोड़ रुपये के वित्तीय दायित्व को टाला गया तथा परियोजना के पूर्ण होने के बाद जलविद्युत उत्पादन से राज्य को मिलने वाले वैधानिक लाभ भी सुरक्षित रखे गए। यह परिवर्तन केवल वित्तीय राहत नहीं, बल्कि हिमाचल के दीर्घकालिक आर्थिक हितों की रक्षा की दिशा में एक महत्वपूर्ण हस्तक्षेप माना जा रहा है।
फिर भी किशाऊ परियोजना का मूल्यांकन केवल 660 मेगावाट विद्युत क्षमता, 1,324 मिलियन घन मीटर जल भंडारण अथवा 97,076 हेक्टेयर सिंचाई क्षमता के आँकड़ों तक सीमित नहीं किया जा सकता। इसके समानांतर एक ऐसा मानवीय पक्ष भी खड़ा है, जहाँ विकास की धारा के लिए अनेक परिवारों को अपनी पीढ़ियों की धरोहर, उपजाऊ खेतों, वनों, आजीविका और पूरे के पूरे गांवों से बिछुड़ना पड़ेगा। किसी भी राष्ट्रीय परियोजना की वास्तविक सफलता कंक्रीट की ऊँचाई या मेगावाट की क्षमता से नहीं, बल्कि इस कसौटी पर आँकी जाएगी कि क्या विस्थापित परिवारों को केवल मुआवज़े का कागज़ मिला या उन्हें सम्मान, सुरक्षा और भविष्य की नई संभावनाओं के साथ न्यायपूर्ण पुनर्वास भी प्राप्त हुआ।
बिजली, सिंचाई और पेयजल के राष्ट्रीय लाभ के बदले हिमाचल की 1,498 हेक्टेयर भूमि, आठ गांव और 2,092 लोगों पर पुनर्वास की चुनौती; नए समझौते से वित्तीय बोझ घटा, सामाजिक कीमत बरकरार।

वर्ष 1940 में जिस अवधारणा ने जन्म लिया था, वह लगभग नौ दशक बाद निर्णायक मोड़ पर पहुंचती दिखाई दे रही है। टौंस नदी पर प्रस्तावित 660 मेगावाट की किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना केवल एक जलविद्युत परियोजना नहीं, बल्कि उत्तर भारत की जल सुरक्षा, सिंचाई और ऊर्जा रणनीति का महत्वपूर्ण आधार मानी जा रही है। लेकिन इस विकास की सबसे बड़ी कीमत हिमालय की गोद में बसे वे गांव चुकाएंगे, जिनकी जमीन, घर और आजीविका जलाशय में समा जाएगी।
आधिकारिक अभिलेख बताते हैं कि परियोजना में 236 मीटर ऊंचा रोलर कॉम्पैक्टेड कंक्रीट (RCC) ग्रैविटी बांध बनाया जाएगा। इसकी आकलित विद्युत क्षमता 660 मेगावाट , जबकि 1,324 मिलियन घन मीटर जीवंत जल भंडारण के माध्यम से दिल्ली, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश को पेयजल एवं सिंचाई का लाभ मिलेगा। साथ ही डाउनस्ट्रीम परियोजनाओं के विद्युत उत्पादन में भी वृद्धि होगी।
हिमाचल ने क्या पाया और क्या खोया
हाल में हुए अंतर-राज्यीय समझौते का सबसे बड़ा लाभ यह माना जा रहा है कि हिमाचल प्रदेश को परियोजना के निर्माण में पूंजीगत निवेश का बोझ नहीं उठाना पड़ेगा, जबकि उसे जल एवं विद्युत लाभ में पूर्ववत हिस्सा मिलेगा। लंबे समय से राज्य सरकार इसी व्यवस्था की मांग कर रही थी। इसे हिमाचल के वित्तीय हितों की दृष्टि से महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है।
आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार परियोजना से हिमाचल प्रदेश की 1,498 हेक्टेयर भूमि स्थायी रूप से जलमग्न होगी। आठ गांव प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित होंगे और लगभग 2,092 लोगों का पुनर्वास करना पड़ेगा। दूसरी ओर उत्तराखंड में 1,452 हेक्टेयर भूमि, नौ गांव तथा 3,406 लोग प्रभावित होंगे। अर्थात कुल 2,950 हेक्टेयर भूमि, 17 गांव और 5,498 लोग इस परियोजना की प्रत्यक्ष सामाजिक कीमत चुकाएंगे।
यही वह पक्ष है जो परियोजना को केवल इंजीनियरिंग का नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और पुनर्वास का भी विषय बनाता है।
पेड़ों और पर्यावरण का प्रश्न अभी खुला है
सार्वजनिक चर्चा में लाखों पेड़ों के कटान के दावे किए जाते रहे हैं, लेकिन HPPCL, Kishau Corporation तथा CWC के उपलब्ध आधिकारिक अभिलेखों में अभी तक प्रभावित पेड़ों की अंतिम प्रमाणित संख्या प्रकाशित नहीं की गई है। अभी केवल डूब क्षेत्र (2,950 हेक्टेयर) और प्रभावित गांवों-लोगों का आधिकारिक विवरण उपलब्ध है। इसलिए पेड़ों की संख्या पर कोई भी निश्चित दावा आधिकारिक दस्तावेजों के बिना उचित नहीं होगा।
दस्तावेजों के अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि परियोजना के इतिहास में डिजाइन में कई तकनीकी बदलाव हुए। प्रारंभिक प्रस्तावों पर भू-वैज्ञानिक और संरचनात्मक आपत्तियों के बाद डिजाइन को संशोधित किया गया, लेकिन उपलब्ध आधिकारिक रिकॉर्ड में 236 मीटर की स्वीकृत ऊंचाई घटाए जाने का कोई प्रमाण नहीं मिलता। आज भी HPPCL और Kishau Corporation के दस्तावेज इसी ऊंचाई का उल्लेख करते हैं।
किशाऊ परियोजना के सामने सबसे बड़ी चुनौती बांध निर्माण नहीं, बल्कि विश्वसनीय पुनर्वास है। किसी परियोजना की सफलता केवल मेगावाट, करोड़ों रुपये या जल भंडारण से नहीं मापी जाती; उसका वास्तविक मूल्यांकन इस बात से होता है कि जिन लोगों ने विकास के लिए अपनी जमीन और जीवन-परिवेश छोड़ा, क्या उन प्रभावित परिवारों को उनकी खोई हुई जमीन का केवल मूल्य नहीं, बल्कि जीवन की नई जमीन भी मिलेगी। राज्य सरकार और समूचे हिमाचलियों को इस विषय पर वक्त रहते रोड मैप तैयार करना होगा।