शिकायत का अधिकार, जवाबदेही गायब

मोहिंद्र प्रताप सिंह राणा/ ग्राम परिवेश 

उच्च शिक्षा में सामाजिक समानता का दावा लेकर आया “UGC का जनवरी 2026 का नया नियमन” अपने उद्देश्य से अधिक अपने तरीक़े को लेकर सवालों के घेरे में है। समता की जिस अवधारणा पर यह बिल खड़ा है, वही अवधारणा तब कमज़ोर पड़ जाती है जब कानून सुनवाई के अधिकार और जवाबदेही के सिद्धांत पर खरा न उतरे। न्याय का मूल स्वभाव यह नहीं कि केवल आरोप को प्राथमिकता मिले, बल्कि यह कि आरोप और बचाव—दोनों बराबरी से सुने जाएँ। इसी कसौटी पर नया नियमन सामाजिक न्याय की आत्मा से टकराता दिखता है, और **सामान्य वर्ग की उपेक्षा** का तर्क मजबूती से उभरकर सामने आता है।

2011–12 के दौरान लागू UGC के पुराने नियमन भेदभाव रोकने की मंशा के साथ आए थे, पर उनमें एक संतुलन निहित था। शिकायत की जाँच के साथ-साथ यह स्वीकार किया गया था कि यदि कोई शिकायत झूठी या दुर्भावनापूर्ण पाई जाती है, तो उस पर उचित दंडात्मक कार्रवाई हो सकती है। संदेश साफ था—कानून संरक्षण देगा, लेकिन दुरुपयोग की छूट नहीं।

इसके उलट, 2026 का नियमन शिकायत-केंद्रित व्यवस्था को अत्यधिक सशक्त बनाता है। Equal Opportunity Centre, Equity Committee, Equity Squad और त्वरित समय-सीमाएँ यह दर्शाती हैं कि UGC शिकायतों को गंभीरता से लेना चाहता है। लेकिन यहीं एक बुनियादी प्रश्न खड़ा होता है—
अगर शिकायत झूठी निकले तो?

नए नियमों में इस प्रश्न का कोई स्पष्ट उत्तर नहीं है। झूठी या दुर्भावनापूर्ण शिकायत पर न दंड, न जवाबदेही। नतीजतन, कानून का संतुलन एकतरफ़ा झुकता दिखाई देता है—जहाँ आरोप लगाने वाले को पूर्ण संरक्षण है, पर आरोप झेलने वाले की प्रतिष्ठा, करियर और मानसिक सुरक्षा के लिए कोई ठोस ढाल नहीं।

यही वह बिंदु है जहाँ समानता की अवधारणा अपने ही तर्क से टकराती है। जब कानून केवल एक पक्ष को सुने और दूसरे से केवल सहनशीलता की अपेक्षा रखे, तब वह न्याय नहीं, भय की व्यवस्था बन जाता है। सामान्य वर्ग की चिंता यहीं से जन्म लेती है—कि कहीं समता के नाम पर उसे संस्थागत रूप से असुरक्षित तो नहीं किया जा रहा।

कानून और न्याय की परंपरा कहती है कि बराबरी अधिकारों की नहीं, बल्कि दायित्वों की भी होनी चाहिए। यदि शिकायत करने का अधिकार है, तो गलत शिकायत करने पर उत्तरदायित्व भी होना चाहिए। यही संतुलन किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की आत्मा है।

UGC का 2026 नियमन अगर वास्तव में सामाजिक न्याय को मजबूत करना चाहता है, तो उसे इस असंतुलन को स्वीकार कर सुधार की दिशा में बढ़ना होगा। अन्यथा इतिहास इसे एक ऐसे प्रयोग के रूप में याद रखेगा, जहाँ समानता की भाषा में असमानता को वैधानिक रूप दे दिया गया।

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