मोहिंद्र प्रताप सिंह राणा
हिमाचल प्रदेश में दिसंबर 2027 में प्रस्तावित विधानसभा चुनाव से पहले वीरभद्र सिंह की राजनीतिक विरासत एक बार फिर सियासी विमर्श के केंद्र में आ गई है। प्रदेश की दोनों प्रमुख पार्टियां चुनावी तैयारियों में जुटी हैं, तो इसी बीच पूर्व मुख्यमंत्री के नाम से मिलते-जुलते नामों पर नई राजनीतिक पार्टी गठित करने की चर्चाओं ने भी जोर पकड़ना शुरू कर दिया है। इस घटनाक्रम के केंद्र में कथित तौर पर बैंक ऋण विवाद से जुड़े युद्ध चंद बैंस का नाम सामने आ रहा है। बैंस स्वयं को कई बार वीरभद्र सिंह का समर्थक बता चुके हैं और उनका दावा रहा है कि कांगड़ा सेंट्रल को-ऑपरेटिव बैंक से मिला विवादित ऋण वीरभद्र सिंह के आशीर्वाद से संभव हुआ था। अब वीरभद्र सिंह के नाम से प्रस्तावित राजनीतिक दलों की चर्चा ने उनकी विरासत के इस्तेमाल और उसके पीछे की राजनीतिक मंशा को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं।
इस विवाद को नया आयाम पूर्व सांसद एवं हिमाचल प्रदेश कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष प्रतिभा सिंह के निर्वाचन आयोग को लिखे पत्र ने दिया है। प्रतिभा सिंह ने 7 अक्टूबर को मुख्य निर्वाचन आयुक्त को पत्र भेजकर आग्रह किया है कि वीरभद्र सिंह के नाम, पहचान और जनमानस में स्थापित उनकी साख का इस्तेमाल करते हुए किसी भी राजनीतिक दल के पंजीकरण पर रोक लगाने के लिए आवश्यक कदम उठाए जाएं। पत्र के अनुसार, समाचार पत्रों और सोशल मीडिया के माध्यम से उन्हें जानकारी मिली है कि कुछ लोग ‘राष्ट्रवादी वीरभद्र कांग्रेस’ और ‘वीर कांग्रेस’ जैसे नामों से राजनीतिक दल गठित करने की कोशिश कर रहे हैं। इसके अतिरिक्त ‘राजा’, ‘बुशहर’ और ‘राजा बुशहर’ जैसे नामों के जरिए भी राजनीतिक दल बनाने की संभावनाओं का उन्होंने उल्लेख किया है।
प्रतिभा सिंह ने अपने पत्र में वीरभद्र सिंह के छह बार हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री और केंद्र में कैबिनेट मंत्री सहित विभिन्न महत्वपूर्ण पदों पर रहने का हवाला देते हुए उनकी विशिष्ट राजनीतिक पहचान और प्रदेश में व्यापक जनसम्मान का उल्लेख किया है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि उन्हें किसी व्यक्ति या समूह के राजनीतिक दल बनाने के अधिकार पर आपत्ति नहीं है, लेकिन उनके दिवंगत पति के नाम, पहचान और साख का इस्तेमाल उनकी सहमति के बिना किया जाना स्वीकार्य नहीं है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया है कि न तो उन्होंने और न ही उनके परिवार के किसी सदस्य ने ऐसी किसी राजनीतिक पहल को अधिकृत किया है और न ही इसके लिए सहमति दी है।
हालांकि, इस पत्र का एक दूसरा और महत्वपूर्ण राजनीतिक पहलू भी है, जिसे कांग्रेस के भीतर वीरभद्र परिवार की भूमिका के संदर्भ में देखा जाना चाहिए। वीरभद्र सिंह का राजनीतिक प्रभाव और उनके समर्थकों का आधार उनकी सक्रिय राजनीति के बाद भी प्रदेश के सियासी परिदृश्य में प्रासंगिक बना हुआ है या बनाया जा रहा है। ऐसे में उनके परिवार को हिमाचल की राजनीति से अलग करके देखना आसान नहीं होगा। प्रतिभा सिंह की आपत्ति को केवल दिवंगत नेता के नाम और पहचान के संरक्षण तक सीमित मानने के बजाय इसके व्यापक राजनीतिक संदर्भ को भी समझना होगा। आगामी विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के भीतर टिकटों के बंटवारे और संगठन तथा सरकार में राजनीतिक पदों की हिस्सेदारी को लेकर वीरभद्र परिवार अपना मजबूत दावा पेश कर सकता है। इस लिहाज से वीरभद्र सिंह के नाम पर किसी नई पार्टी के गठन की चर्चाएं और प्रतिभा सिंह का निर्वाचन आयोग को पत्र, दोनों ही उनकी राजनीतिक विरासत तथा उससे जुड़े जनाधार की प्रासंगिकता को फिर चर्चा में ले आए हैं।
यहां सवाल केवल इतना नहीं है कि वीरभद्र सिंह के नाम से मिलते-जुलते नाम पर कोई नया राजनीतिक दल पंजीकृत हो पाएगा या नहीं। बड़ा सवाल यह भी है कि उनकी विरासत पर राजनीतिक अधिकार और उसके प्रतिनिधित्व का दावा किस तरह सामने आता है। एक ओर प्रस्तावित पार्टी के नामों को लेकर उठी चर्चा नई राजनीतिक पहल को सार्वजनिक पहचान दिला सकती है, तो दूसरी ओर प्रतिभा सिंह का पत्र यह स्पष्ट करता है कि उनका परिवार ऐसी किसी पहल के लिए अपनी सहमति नहीं दे रहा है। हालांकि, इस घटनाक्रम से किसी पक्ष को कितना राजनीतिक लाभ मिलेगा, यह अभी निश्चित नहीं है।
दिसंबर 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले वीरभद्र सिंह का नाम एक बार फिर हिमाचल की राजनीति में महत्वपूर्ण हो, क्योंकि हाल ही के दिनों में भाजपा में बढ़ती अंतर्कलह व सुक्खू सरकार के किशाऊ बांध समझौते के बाद प्रदेश सियासी हवाओं ने रुख बदला है। इस बदलते रुख ने कोंग्रेस का राजनीतिक दायरा बढ़ाया है और इस बढ़ते दायरे में कुछ कोंग्रेसी अपनी जमीन तलाश रहे हैं। आने वाले समय में निर्वाचन आयोग की कार्रवाई के साथ-साथ कांग्रेस के भीतर टिकट वितरण और राजनीतिक हिस्सेदारी को लेकर होने वाली गतिविधियां भी यह स्पष्ट करेंगी कि वीरभद्र सिंह की विरासत केवल स्मृतियों और नाम तक सीमित रहती है या प्रदेश की चुनावी राजनीति में उसका प्रभाव एक बार फिर निर्णायक मुद्दा बनकर उभरता है।