मोहिंद्र प्रताप सिंह राणा
संपादक ग्राम परिवेश साप्ताहिक पत्रिका
करवट लेती राजनीति की तेज होती धार जंतर-मंतर पर साफ दिखाई दे रही है। एक ओर निज़ाम के सिपाहियों की कसती गिरफ्त के निशान आंदोलनकारियों के शरीर पर उभरने लगे हैं, तो दूसरी ओर दुबले-पतले शरीरों में फौलादी इरादे लिए प्रदर्शनकारी विवेक, साहस और अपनी ताकतवर कोहनियों के सहारे निज़ामी ताकत को छकाते नजर आ रहे हैं। जंतर-मंतर का यह दृश्य महज टकराव नहीं, बल्कि बदलते राजनीतिक मिज़ाज का संकेत भी है—जहां सत्ता की पकड़ कसती जा रही है, वहीं प्रतिरोध की चेतना भी अपनी जमीन तलाश रही है। सवाल अब केवल यह नहीं कि कौन किसे पीछे धकेलता है; असली सवाल यह है कि राजनीति की यह करवट अपने अंजाम तक पहुंचती है या निज़ाम इसे भी अपने भीतर जज़्ब कर लेता है।
लंबे समय से सत्ता के सामने सबसे बड़ा सवाल यही रहा है कि मताधिकार को नागरिक की संवैधानिक ताकत बनाए रखा जाए या उसे सत्ता के स्थायी एकाधिकार का माध्यम बनने दिया जाए। इसी संदर्भ में 1985 से 1990 के बीच ऐसा दौर भी आया, जब सत्तारूढ़ दल ने संविधान संशोधन के जरिए दलबदल विरोधी कानून लागू किया और मतदान की उम्र 21 से घटाकर 18 वर्ष कर युवाओं की लोकतांत्रिक हिस्सेदारी का दायरा बढ़ाया। ये कदम मताधिकार और जनादेश की गरिमा को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण थे। लेकिन लोकतंत्र में खतरा तब गहरा जाता है, जब सत्ता के पहरेदार माने जाने वाले संवैधानिक संस्थानों की स्वायत्तता ही निरंकुशता की गिरफ्त में आने लगे और उनकी निष्पक्षता तथा जवाबदेही पर सवाल उठने लगें।
अस्सी-नब्बे के दशक और इक्कीसवीं सदी के शुरुआती वर्षों में—पी.वी. नरसिम्हा राव के दौर को अपवाद मानें तो—भारतीय लोकतंत्र ने जनादेश के सम्मान और मताधिकार के विस्तार की उल्लेखनीय मिसालें देखीं। राजीव गांधी के प्रचंड बहुमत वाली सरकार ने एकाधिकारवादी प्रवृत्ति को बढ़ावा देने के बजाय दलबदल विरोधी कानून लागू कर लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूती देने की दिशा में कदम उठाया और 18 वर्ष के युवाओं को मताधिकार देकर लोकतंत्र का दायरा विस्तृत किया। चंद्रशेखर की अल्पमत सरकार के दौर में टी.एन. शेषन जैसे निर्भीक मुख्य चुनाव आयुक्त का उभार चुनावी व्यवस्था की निष्पक्षता के लिए निर्णायक साबित हुआ। अटल बिहारी वाजपेयी ने एक वोट से बहुमत गंवाने पर सत्ता छोड़ दी, लेकिन लोकतांत्रिक मर्यादा से समझौता नहीं किया। मनमोहन सिंह के दौर में भी गठबंधन की राजनीति ने संसदीय जवाबदेही की परंपरा को आगे बढ़ाया। इस कालखंड की असली सीख यही है—प्रचंड बहुमत हो या अल्पमत की सरकार, लोकतंत्र की कसौटी संख्याबल नहीं, बल्कि सत्ता का आचरण और जनादेश के प्रति जवाबदेही है। जनादेश शासन करने का अधिकार है, उसकी खरीद-फरोख्त का लाइसेंस नहीं।
लेकिन भारतीय लोकतंत्र की विडंबना देखिए कि सत्ता के आचरण और जनादेश के प्रति जवाबदेही के जिन मानदंडों को कांग्रेस, भाजपा, जनता दल और अन्य दलों की पूर्ववर्ती सरकारों ने अलग-अलग समय पर स्थापित किया था, उनकी धज्जियां 2014 में सत्ता में आई एनडीए सरकार के दौर में उड़ने लगीं। जनादेश की गरिमा को चोट पहुंचने लगी और निर्वाचित सरकारों को गिराने तथा सत्ता समीकरण बदलने के लिए राजनीतिक खरीद-फरोख्त के आरोपों ने लोकतांत्रिक विमर्श में जगह बना ली। इस राजनीति में जोड़-तोड़ के माहिरों को ‘चाणक्य’ जैसी उपाधियों से नवाजा जाने लगा। ‘मोदी है तो मुमकिन है’ का नारा गूंजा, तो दूसरी ओर विपक्षी दलों की सरकारें गिरने पर उत्सव मनाने की प्रवृत्ति भी दिखाई देने लगी। असहमति के स्वर गिरती सरकारों के मलबे तले दबते चले गए। ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ का नारा धीरे-धीरे विपक्ष की राजनीतिक प्रासंगिकता पर ही सवाल खड़े करने वाली बहस में बदलता नजर आया। लोकतंत्र के मूल धर्म पर धार्मिक उन्माद का रंग चढ़ने लगा; सत्ता के आचरण और जनादेश के प्रति जवाबदेही नेपथ्य में खिसकते गए। शासन-प्रशासन की विश्वसनीयता पर सवाल बढ़े और धर्म के नाम पर राजनीति ने अधिक मुखर होकर अपना विस्तार किया।
इसी उत्सवी शोरगुल के बीच प्रतिरोध की वह चेतना भी सिर उठाने लगी, जो कुछ समय तक सत्ता के राजनीतिक वर्चस्व के नीचे दबती दिखाई दे रही थी। यह वह दौर था, जब स्वायत्तता प्राप्त जांच एजेंसियों और संवैधानिक संस्थाओं को लेकर ‘पिंजरे के तोते’ जैसी उपमाएं फिर राजनीतिक विमर्श के केंद्र में आने लगीं। नियुक्तियों और संस्थागत फैसलों में सत्ता के हस्तक्षेप को लेकर सवाल उठे तथा संस्थाओं की स्वतंत्र भूमिका पर संदेह गहराया। लेकिन सत्ता के प्रभाव और राजनीतिक शोर के बावजूद प्रतिरोध की आवाज ऊंची होने लगी और आमजन की बेचैनी भी बढ़ने लगी। 2012-13 के राजनीतिक आंदोलनों और उनके बाद उभरे राजनीतिक विकल्पों से मोहभंग का अनुभव कर चुकी नई पीढ़ी—विशेषकर जेन-जी—के सामने चुनौती यह थी कि वह स्थापित राजनीतिक चेहरों और उनके दावों पर सहज भरोसा कैसे करे। उसे ऐसी आवाज की तलाश थी, जो परंपरागत दलगत राजनीति की सीमाओं से बाहर खड़ी दिखाई दे और उसके सवालों को विश्वसनीय ढंग से उठा सके।
उसे तलाश थी किसी ऐसे चेहरे की, जिसकी पहचान परंपरागत राजनीति से न जुड़ी हो। ऐसा चेहरा ‘कॉकरोच’ संबंधी टिप्पणी के बाद उभरता दिखाई दिया और पेपर लीक के मुद्दे ने उसे आंदोलन का मंच दिया। पेपर लीक का सवाल केवल परीक्षाओं में गड़बड़ी तक सीमित नहीं रहा; वह युवाओं के भविष्य, अवसरों की निष्पक्षता और व्यवस्था पर भरोसे का सवाल बन गया। अब यही मुद्दा एक लंबी राजनीतिक लकीर खींचता नजर आ रहा है। इस प्रतिरोध में परंपरागत राजनीतिक नेतृत्व के प्रति अविश्वास के साथ-साथ राजनीतिक भागीदारी और नेतृत्व की ओर नए सिरे से झुकाव के संकेत भी दिखाई देने लगे हैं। यही इस उभरते घटनाक्रम की अहमियत है—जिस पीढ़ी को राजनीति से दूरी बनाकर चलने वाली माना जाता था, वह अब लोकतांत्रिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर सीधे सवाल उठा रही है।
इसी का परिणाम है कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की जयंती से लेकर अब तक उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम भारत से कथित ‘वोट चोरी’ के आरोपों की आवाजें लगातार उठ रही हैं। ये आवाजें केवल किसी एक दल या क्षेत्र तक सीमित नहीं हैं; इनके केंद्र में मतदाता सूची, चुनावी निष्पक्षता और जनादेश की विश्वसनीयता से जुड़े सवाल हैं। आरोपों की सत्यता का निर्धारण प्रमाणों और निष्पक्ष जांच से होना चाहिए, लेकिन इतना स्पष्ट है कि जब चुनावी प्रक्रिया पर ही संदेह गहराने लगे, तो लोकतंत्र की बुनियाद से जुड़े प्रश्नों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। मताधिकार का वास्तविक अर्थ तभी बचता है, जब मतदाता को यह भरोसा हो कि उसका वोट न केवल दर्ज हुआ है, बल्कि उसकी इच्छा का सम्मान भी हुआ है।
कल, 10 अक्टूबर को जेन-जी नेतृत्व ‘वोट चोरी’ के मुद्दे पर दिल्ली के जंतर-मंतर पर शांतिपूर्ण आंदोलन करने जा रहा है। दूसरी ओर, आंदोलनकारियों पर पुलिस-प्रशासन की पकड़ पूरी तरह कसने की तैयारी के संकेत मिल रहे हैं। प्रदर्शनकारियों के साहस, विवेक और प्रतिरोध की ताकत को पुलिसिया दबाव से घुटनों पर लाने की कोशिश यदि होती है, तो सवाल केवल कानून-व्यवस्था का नहीं रहेगा; वह असहमति के प्रति सत्ता के रवैये की भी परीक्षा बनेगा। यह दौर देश, ‘मदर ऑफ डेमोक्रेसी’ के रूप में भारत की वैश्विक छवि और लोकतांत्रिक राजनीति की भावी दिशा—तीनों के लिए महत्वपूर्ण और संवेदनशील है। जंतर-मंतर पर उठने वाली आवाज का असली अर्थ यही होगा कि लोकतंत्र में जनादेश केवल चुनाव के दिन मतपेटी तक सीमित नहीं रहता; उसकी विश्वसनीयता सत्ता के हर फैसले, हर संस्थागत कार्रवाई और असहमति के प्रति उसके व्यवहार में भी दिखाई देनी चाहिए।