मोहिंद्र प्रताप सिंह राणा/ग्राम परिवेश
महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में लोकसभा चुनाव के महज कुछ महीनों बाद मतदाता संख्या में हुई असाधारण वृद्धि ने नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को जो सवाल पूछने के लिए विवश किया था, वह सवाल अब महाराष्ट्र की सीमाओं से निकलकर पटना, कोलकाता और मुंबई की गलियों, सड़कों, चौक-चौराहों से होता हुआ आकाशवाणी के गेट नंबर-3 तक पहुंच चुका है और अंततः चुनाव आयोग की चौखट पर खड़ा है। वह अब राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता और संवैधानिक जवाबदेही का प्रश्न बन चुका है।
चुनाव आयोग के अपने आंकड़ों के अनुसार महाराष्ट्र में लोकसभा और विधानसभा चुनाव के बीच 48.81 लाख मतदाता जोड़े गए और 8 लाख से अधिक नाम हटाए गए, जिससे शुद्ध वृद्धि 40.81 लाख रही। आयोग ने इसका एक बड़ा हिस्सा नई पात्रता पाने वाले युवा मतदाताओं से जोड़ा है। लेकिन इस असामान्य वृद्धि पर उठे सवालों ने एक बुनियादी मांग को जन्म दिया—आखिर वे नए मतदाता कौन थे, कहां से आए और मतदाता सूची में उनके प्रवेश तथा पुराने मतदाताओं के नामों में हुए बदलाव की पूरी पड़ताल सार्वजनिक क्यों न हो?
और आज वही प्रश्न एसआईआर की छंटनी से गुजरते हुए और विराट हो गया है।
देश के अलग-अलग हिस्सों में लाखों मतदाताओं के नाम मतदाता सूचियों से बाहर होने, संदिग्ध अथवा विसंगत प्रविष्टियों की जांच और उनके नाम पुनः जोड़ने की अपीलों ने लोकतंत्र के सामने एक असहज सवाल खड़ा कर दिया है—क्या मतदाता को अपना वोट बचाने के लिए अब केवल मतदान केंद्र तक पहुंचना पर्याप्त नहीं, बल्कि अपनी नागरिक उपस्थिति का इतिहास भी साबित करना होगा?
पश्चिम बंगाल इसका सबसे तीखा उदाहरण बनकर सामने आया है। एसआईआर के बाद हटाए गए 27.16 लाख मतदाताओं में से 22.21 लाख ने अपने नाम फिर से जुड़वाने के लिए अपील की। यानी जिन लोगों के नाम काटे गए, उनमें से लगभग 82 प्रतिशत ने स्वयं उस निर्णय को चुनौती दी। लेकिन विधानसभा चुनाव में मतदान का अवसर आने तक केवल 1,607 मतदाता ही वापस जोड़े जा सके।
यह आंकड़ा अपने आप में किसी चुनावी धांधली को सिद्ध नहीं करता। लेकिन यह लोकतंत्र के सामने एक बेहद असुविधाजनक प्रश्न जरूर खड़ा करता है—
यदि मतदाता का नाम पहले काट दिया जाए, अपील की प्रक्रिया बाद में चले और न्याय मिलने की गति मतदान की तारीख से पीछे रह जाए, तो उस नागरिक के लिए न्याय का अर्थ क्या रह जाता है?
और जब इस अपीलीय प्रक्रिया में लगे न्यायाधीश ही चुनाव आयोग के डिजिटल पोर्टल की ऐसी तकनीकी सीमाओं की ओर संकेत करें जिनके कारण नोटिस भेजने, दस्तावेज अपलोड करने, सुनवाई करने और यहां तक कि हटाए गए मतदाता का नाम बहाल करने में भी कठिनाई हो, तो सवाल केवल तकनीकी नहीं रह जाता। वह मताधिकार तक पहुंच और संस्थागत जवाबदेही का प्रश्न बन जाता है।
रिपोर्टों में यह आशंका भी सामने आई है कि मौजूदा गति से लंबित अपीलों के निस्तारण में एक दशक से अधिक समय लग सकता है। यदि किसी पात्र नागरिक को अपने मताधिकार की बहाली के लिए वर्षों इंतजार करना पड़े, तो उसके सामने केवल एक चुनाव नहीं, कई चुनाव निकल सकते हैं।
तब सवाल यह नहीं रह जाता कि आज के नागरिक का वोट बचा या नहीं।
सवाल यह बन जाता है कि यदि आज का नागरिक अपने नाम के लिए अपने माता-पिता और दादा-दादी के मतदाता रिकॉर्ड खोजने को मजबूर है, तो कल उसके बच्चों और परसों उसके पोते-पोतियों से भी क्या यही कहा जाएगा कि पहले साबित करो—तुम्हारे दादा का नाम उस समय की मतदाता सूची में था या नहीं?
लोकतंत्र में मताधिकार वंशानुगत प्रमाणपत्र नहीं, नागरिकता से जुड़ा संवैधानिक अधिकार है।
किसी नागरिक की पहचान को उसके वर्तमान वैधानिक दस्तावेजों और निर्धारित प्रक्रिया से जांचना एक बात है; लेकिन उसके मताधिकार को पीढ़ियों पुराने मतदाता रिकॉर्ड की भूलभुलैया में ले जाना दूसरी बात।
अगर आज के मतदाता को अपने अस्तित्व के लिए कल के मतदाता का प्रमाण चाहिए, तो कल की पीढ़ी अपने आज के वोट के लिए किसका प्रमाण देगी?
यही वह बिंदु है जहां एसआईआर की बहस मतदाता सूची से आगे बढ़कर लोकतंत्र की आत्मा—नागरिक के समान मताधिकार—तक पहुंच जाती है।
मतदाता सूची में मृत, स्थानांतरित, दोहरे या अपात्र नाम रहना लोकतंत्र के लिए समस्या है। लेकिन उस समस्या का समाधान ऐसा भी नहीं हो सकता कि सही मतदाता को अपने वोट का अधिकार सिद्ध करने के लिए ऐसी प्रशासनिक और न्यायिक सुरंग में भेज दिया जाए, जिसकी दूसरी तरफ पहुंचने तक चुनाव ही बीत जाए।
मतदाता सूची साफ होनी चाहिए—लेकिन मतदाता की आवाज साफ करते-करते दब नहीं जानी चाहिए।
और चुनाव आयोग से आज सबसे बड़ा प्रश्न यही है—
नाम काटने की शक्ति के साथ नाम बचाने की जिम्मेदारी कौन निभाएगा?
मतदाता को संदेह के घेरे में खड़ा करने से पहले उसे न्याय का रास्ता कौन देगा?
और यदि न्याय का रास्ता वर्षों लंबा है, तो उस बीच छिन चुके वोट की भरपाई कौन करेगा?
क्योंकि लोकतंत्र में एक वोट केवल मतपत्र पर पड़ा निशान नहीं होता।
वह नागरिक के अस्तित्व की संवैधानिक स्वीकृति होता है।
उसे संदेह की कैंची से काटना जितना आसान हो सकता है, उस अधिकार को वापस देना उतना ही कठिन—और कई बार समय बीत जाने के बाद असंभव—हो सकता है।
यही कारण है कि महाराष्ट्र से उठा सवाल अब पटना और कोलकाता होते हुए चुनाव आयोग की चौखट पर खड़ा है।
और इस बार सवाल किसी दल का नहीं—
भारत के मतदाता का है।