मोहिंद्र प्रताप सिंह राणा
हिमाचल प्रदेश कांग्रेस की राजनीति में इन दिनों संगठन के भीतर चल रही खींचतान से अधिक चिंता उन राजनीतिक संकेतों की है, जो समय-समय पर पार्टी के ही मंचों से बाहर आ रहे हैं। हाईकमान द्वारा नियुक्त प्रदेश कांग्रेस प्रभारी रजनी पाटिल के मौजूदा और पूर्व कार्यकाल के दौरों को देखें तो उनके कई बयान और राजनीतिक हस्तक्षेप विवाद का केंद्र बने हैं। सवाल यह नहीं कि हर बयान के पीछे कोई राजनीतिक मंशा थी या नहीं, सवाल यह है कि क्या ऐसे बयान अनजाने में कांग्रेस को ही कठघरे में खड़ा कर भाजपा को राजनीतिक औजार उपलब्ध नहीं करा रहे?
रजनी पाटिल के पूर्व प्रभारी कार्यकाल के दौरान विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को मिले प्रचार हेलीकॉप्टर के कथित तौर पर परिवारजनों को किन्नौर घुमाने के लिए इस्तेमाल किए जाने का विवाद भी राजनीतिक चर्चा का विषय बना था। अब मौजूदा कार्यकाल में मंडी के उस मंच पर दिया गया उनका बयान भी कांग्रेस के भीतर चर्चा में है, जहां प्रदेशभर से राजनीतिक सोच रखने वाले लोग और आमजन सुक्खू सरकार के तीन वर्ष के कार्यकाल का लेखा-जोखा सुनने पहुंचे थे। इस मंच से उपमुख्यमंत्री मुकेश अग्निहोत्री को ‘हीरो’ के रूप में रेखांकित करने की जरूरत कांग्रेस के कई नेताओं और समर्थकों को खटकी।
राजनीतिक तौर पर सवाल मुकेश अग्निहोत्री की भूमिका पर नहीं था। कांग्रेस के अग्रणी नेताओं में उनकी अपनी जगह है और पार्टी को मजबूत करने में उनका योगदान निर्विवाद रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है। सवाल मंच और समय का था। जब पूरा राजनीतिक विमर्श सुक्खू सरकार की उपलब्धियों और प्रदेश के हितों के इर्द-गिर्द केंद्रित था तथा भाजपा केंद्र सरकार द्वारा हिमाचल को आपदा के समय अपेक्षित आर्थिक मदद न मिलने के मुद्दे पर राजनीतिक दबाव में थी, तब कांग्रेस के भीतर ही एक नेता को अलग से उभारने वाला बयान आखिर किस राजनीतिक आवश्यकता को पूरा कर रहा था?
रजनी पाटिल के शिमला दौरों का भी कांग्रेस संगठन में एक वर्ग इसी नजरिए से मूल्यांकन करता रहा है। नेताओं से मुलाकात, प्रेस कॉन्फ्रेंस और वापसी—यह दौरा-शैली कार्यकर्ताओं के उस बड़े वर्ग को हमेशा संतुष्ट नहीं कर पाई, जो प्रभारी से संगठन के जमीनी कार्यकर्ताओं के साथ संवाद की अपेक्षा रखता है। यही दूरी कई बार ऐसे राजनीतिक किस्सों को जन्म देती रही, जिनका नुकसान अंततः कांग्रेस को ही उठाना पड़ा।
कई मौकों पर रजनी पाटिल कांग्रेस नेताओं के पारिवारिक समारोहों में पहुंचीं, वहां रुकीं और विपक्ष के नेताओं से भी अलग मुलाकातें हुईं। लेकिन उन्हीं आयोजनों में मौजूद कांग्रेस कार्यकर्ताओं से संवाद का अवसर नहीं बन पाया। राजनीति में प्रतीक भी संदेश होते हैं। कार्यकर्ता के लिए प्रभारी का एक संवाद संगठनात्मक विश्वास बढ़ाता है, जबकि दूरी कई तरह की राजनीतिक व्याख्याओं को जन्म देती है।
हाल के शिमला, सोलन और सिरमौर दौरों में भी ऐसा ही एक प्रसंग सामने आया। एक पत्रकार के ‘स्लीपर सेल’ संबंधी सवाल पर रजनी पाटिल ने आवेश में वरिष्ठ कांग्रेस नेता, कट्टर कांग्रेस समर्थक और मंत्री जगत सिंह नेगी को अनुशासनहीनता की चेतावनी दे दी। सवाल उठता है कि क्या किसी वरिष्ठ नेता पर इतनी गंभीर राजनीतिक टिप्पणी करने से पहले पूरे संदर्भ की जानकारी लेना जरूरी नहीं था? परिणाम यह हुआ कि भाजपा को कांग्रेस के ही वरिष्ठ नेता जगत सिंह नेगी पर राजनीतिक तंज कसने का अवसर मिल गया। यही वह बिंदु है जहां प्रभारी के एक बयान का राजनीतिक असर संगठन की सीमा से बाहर निकलकर विपक्ष के हथियार में बदल जाता है।
इसी दौरे के दौरान रजनी पाटिल के कुछ अन्य बयानों ने भी कांग्रेस सरकार की उपलब्धियों को राजनीतिक बहस में उलझा दिया। किशाऊ बांध समझौता हिमाचल के जल हितों से जुड़ी सुक्खू सरकार की महत्वपूर्ण उपलब्धियों में गिना जा रहा था, लेकिन प्रभारी के बयानों ने उपलब्धि के बजाय कांग्रेस के भीतर की राजनीति को चर्चा के केंद्र में ला दिया।
सबसे अधिक राजनीतिक हलचल मंत्रिमंडल विस्तार को लेकर उनके उस बयान से हुई, जिसमें उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री सूची नहीं दे रहे हैं। सामान्य प्रशासनिक टिप्पणी दिखने वाला यह बयान हिमाचल कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति में साधारण नहीं था। इसके राजनीतिक अर्थ निकले—और निकाले भी गए। यदि पार्टी का प्रभारी ही सार्वजनिक मंच से यह संकेत दे कि मुख्यमंत्री और हाईकमान के बीच मंत्रिमंडल विस्तार को लेकर अपेक्षित तालमेल नहीं है, तो यह संदेश संगठन से बाहर क्या जाता है?
यहीं से ‘स्लीपर सेल’ और ‘प्रेशर सेल’ की बहस महत्वपूर्ण हो जाती है।
राजनीतिक शब्दावली में ‘स्लीपर सेल’ कहना गंभीर आरोप है। इसका इस्तेमाल उस स्थिति में अधिक सटीक माना जाता है, जब कोई व्यक्ति किसी संगठन में रहते हुए भीतर से किसी दूसरे पक्ष के हित में काम करे और निर्णायक समय पर सक्रिय हो। इसलिए हिमाचल कांग्रेस में मौजूद हर असहमति, हर गुट या हर विवाद को ‘स्लीपर सेल’ कहना राजनीतिक और भाषाई दोनों स्तरों पर अतिशयोक्ति होगी।
लेकिन ‘प्रेशर सेल’ की अवधारणा हिमाचल कांग्रेस की मौजूदा राजनीति को समझने के लिए अधिक प्रासंगिक दिखाई देती है।
यदि संगठन के भीतर कुछ नेता या समूह समय-समय पर ऐसे संवेदनशील बयान दें, जिनसे नेतृत्व पर किसी विशेष निर्णय, नियुक्ति, पद या राजनीतिक हित को लेकर दबाव बने, तो इसे ‘भीतर से दबाव की सियासत’ कहा जा सकता है। यहां उद्देश्य संगठन को भीतर से खत्म करना नहीं, बल्कि संगठन के भीतर अपनी राजनीतिक जरूरत मनवाना होता है। यही ‘प्रेशर सेल’ की राजनीति है—और यही कांग्रेस के लिए अधिक गंभीर चुनौती भी हो सकती है।
फरवरी 2023 में हिमाचल की राजनीति ने ऐसे घटनाक्रम भी देखे हैं, जिनसे यह सवाल पूरी तरह काल्पनिक नहीं रह जाता कि पार्टी के भीतर दबाव की राजनीति किस हद तक राजनीतिक परिणामों को प्रभावित कर सकती है। लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं कि कांग्रेस में सक्रिय हर असहमति को स्लीपर सेल का नाम दे दिया जाए।
असल सवाल इससे कहीं बड़ा है—क्या हिमाचल कांग्रेस में संगठनात्मक संवाद की जगह सार्वजनिक दबाव की राजनीति ले रही है?
और यदि ऐसा है तो रजनी पाटिल की भूमिका पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
प्रदेश कांग्रेस प्रभारी का दायित्व किसी एक नेता, गुट या सत्ता-केंद्र के हित साधना नहीं, बल्कि संगठन को जोड़ना, सरकार और संगठन के बीच समन्वय मजबूत करना तथा कार्यकर्ताओं में भरोसा पैदा करना है। ऐसे में यदि प्रभारी के बयान ही पार्टी के भीतर नई खेमेबंदी, नेतृत्व पर दबाव और गुटीय व्याख्याओं को जन्म देने लगें तो सवाल केवल बयान का नहीं रहता, बल्कि प्रभारी की राजनीतिक भूमिका का बन जाता है।
इसलिए सबसे बड़ा सवाल यही है—रजनी पाटिल आखिर किस पर दबाव बना रही हैं और क्यों?
उन्हें कौन-सा राजनीतिक काम साधना है?
क्योंकि उनका घोषित और संवैधानिक राजनीतिक दायित्व तो एक ही है—हिमाचल कांग्रेस को मजबूत करना।
यदि प्रभारी के बयान संगठन को मजबूत करने के बजाय संगठन के भीतर ही दबाव, खींचतान और गुटीय व्याख्याओं को जन्म देने लगें, तो फिर ‘प्रेशर सेल’ कौन बना रहा है और किसके लिए—यह सवाल कांग्रेस नेतृत्व को सार्वजनिक बहस से पहले अपने भीतर पूछना होगा।
क्योंकि राजनीति में विपक्ष के हमले से अधिक खतरनाक वह स्थिति होती है, जब विपक्ष को हमला करने का औजार अपनी ही पार्टी उपलब्ध कराने लगे।