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पालमपुर। पूर्व मुख्यमंत्री एवं पूर्व केंद्रीय मंत्री शांता कुमार ने हिमाचल प्रदेश में दवाओं के लगातार गुणवत्ता परीक्षण में विफल होने पर चिंता जताते हुए मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू से सवाल किया है कि आखिर दवाओं की गुणवत्ता पर बार-बार उठ रहे सवालों का यह कलंक कब धुलेगा।
शांता कुमार ने कहा कि हिमाचल का यह सौभाग्य है कि बद्दी, नालागढ़, बरोटीवाला, पांवटा साहिब, काला अंब, सोलन, कांगड़ा और ऊना जैसे क्षेत्रों में दवा उद्योग का बड़ा आधार विकसित हुआ है। यहां करोड़ों रुपये की दवाओं का उत्पादन होता है और हजारों लोगों को प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रोजगार मिलता है। भारत की पहचान दुनिया में दवा निर्माण, विशेषकर जेनेरिक दवाओं के बड़े उत्पादक के रूप में है और हिमाचल इस औद्योगिक परिदृश्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
उन्होंने कहा कि एक ओर प्रदेश में फार्मा उद्योग विस्तार की ओर बढ़ रहा है और ड्रग पार्क जैसी परियोजना से इसके और मजबूत होने की उम्मीद है, वहीं दूसरी ओर दवाओं के बार-बार गुणवत्ता मानकों पर खरा न उतरने की खबरें इस पूरे क्षेत्र की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर रही हैं।
उन्होंने कहा कि अगस्त के राष्ट्रीय ड्रग अलर्ट में देशभर में 220 दवा नमूनों को Not of Standard Quality (NSQ) पाया गया, जिनमें 62 नमूने हिमाचल में निर्मित दवाओं के हैं। ये नमूने बद्दी, नालागढ़, बरोटीवाला, पांवटा साहिब, काला अंब, सोलन, कांगड़ा और ऊना सहित प्रदेश के प्रमुख औद्योगिक क्षेत्रों से संबंधित हैं।
शांता कुमार ने कहा कि चिंता केवल संख्या की नहीं, बल्कि उन खामियों की भी है जो कुछ दवाओं में सामने आई हैं। रिपोर्टों के अनुसार कुछ नमूनों में दवा की निर्धारित मात्रा, घुलने की क्षमता और विवरण संबंधी कमियां पाई गईं, जबकि कुछ इंजेक्शनों में particulate matter यानी अवांछित कण पाए गए। विशेषज्ञों के अनुसार इंजेक्शन में इस तरह की खामी गंभीर स्वास्थ्य जोखिम पैदा कर सकती है।
उन्होंने कहा कि दवाएं बीमार व्यक्ति को स्वस्थ करने के लिए बनाई जाती हैं। ऐसे में यदि कोई दवा निर्धारित गुणवत्ता पर खरी नहीं उतरती तो मामला केवल उद्योग की प्रतिष्ठा तक सीमित नहीं रहता, बल्कि सीधे मरीज की सुरक्षा से जुड़ जाता है। दवा में गुणवत्ता की चूक उत्पादन-प्रक्रिया की कमी भर नहीं, भरोसे की टूटन भी है।
शांता कुमार ने कहा कि राज्य औषधि नियंत्रक डॉ. मनीष कपूर ने प्रभावित दवाओं के बैच वापस मंगाने और नियमानुसार कार्रवाई की बात कही है। संबंधित कंपनियों को कारण बताओ नोटिस जारी किए जाने और प्रभावित बैचों की बिक्री एवं वितरण रोकने की भी जानकारी सामने आई है।
हालांकि, उन्होंने सवाल उठाया कि बाजार में पहुंच चुकी दवाओं को पूरी तरह वापस मंगाना कितना व्यावहारिक होगा। उन्होंने कहा कि उत्पादन से लेकर वितरण और बिक्री तक दवाएं अनेक स्थानों तक पहुंच जाती हैं। ऐसे में सिर्फ खराब बैच वापस मंगाने की कवायद पर्याप्त नहीं हो सकती; सवाल उस निगरानी तंत्र का भी है जो ऐसी दवाओं को बाजार तक पहुंचने से पहले रोकने में कितना सक्षम है।
उन्होंने कहा कि दवाओं के गुणवत्ता परीक्षण में विफल होने की खबरें बार-बार सामने आ रही हैं। हर बार कार्रवाई का आश्वासन दिया जाता है, लेकिन यदि इसके बावजूद ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति होती रहे तो कार्रवाई की प्रभावशीलता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। इससे हिमाचल के फार्मा उद्योग की साख भी प्रभावित हो सकती है।
शांता कुमार ने कहा कि हिमाचल में दवा उद्योग का विस्तार प्रदेश के लिए आर्थिक उपलब्धि है, लेकिन इस उपलब्धि की असली कसौटी उत्पादन का आकार नहीं, दवा की गुणवत्ता और मरीज का भरोसा होना चाहिए। उन्होंने मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू से सवाल करते हुए कहा कि जब दवाएं रोगियों को स्वस्थ करने के लिए बनाई जाती हैं, तब गुणवत्ता में गंभीर चूक की बार-बार सामने आती घटनाएं हिमाचल के माथे पर सवालिया निशान खड़ा करती हैं।
उन्होंने मुख्यमंत्री से पूछा—“यह कलंक कब धुलेगा?”