मोहिंद्र प्रताप सिंह राणा/ ग्राम परिवेश
सुक्खू है तो सम्भव है, अर्थात सुक्खू का होना ही सम्भावना के पैदा होने का आधार है।—यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी, क्योंकि मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू ने पूर्ववर्ती सरकारों से जिस तरह की घाटा व ऋणोन्मुखी वित्त व्यवस्था और भ्रष्ट व लचर प्रशासकीय तंत्र विरासत में पाया, और केंद्र सरकार के हिमाचल-विरोधी वित्तपोषण के रवैये के साथ-साथ दो अप्रत्याशित आपदाओं को न केवल झेला, बल्कि राहत मैनुअल के आदि-काल के नियमों को ताक पर रखकर हजारों आपदा प्रभावित परिवारों को उनके जमींदोज और अर्धध्वस्त मकानों के लिए समुचित और सम्मानजनक राहत राशि उपलब्ध करवाई तथा समय पर राहत देने के भरपूर प्रयास किए—वह अपने आप में एक मिसाल है।
शासकीय और प्रशासकीय अनुभव लगभग शून्य होने के बावजूद सुक्खू ने प्रदेश के हकों और हितों, उसकी सम्पदा और सम्पत्तियों के संरक्षण व संवर्धन के लिए जिस संजीदगी और समझ के साथ अभी तक काम किया है, उसकी सराहना उनके राजनीतिक विरोधी भी करते दिखाई दे रहे हैं।
मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू ने वित्तीय मोर्चे को मजबूत करने के लिए प्रदेश में बहती जलधाराओं पर बनी, बन रही और भविष्य में बनने जा रही जलविद्युत परियोजनाओं में हिमाचल के हक और हितों की संजीदगी से कानूनी व राजनीतिक मोर्चे पर रणनीति के तहत पैरवी की और पूर्व हस्ताक्षरित समझौतों को भी अपनी शर्तों पर पुनः स्थापित किया।
हाल ही में दिल्ली में किशाऊ बांध निर्माण समझौते में हिमाचल द्वारा बांध निर्माण पर एक पैसा भी खर्च किए बिना उत्पादित बिजली में हिमाचल के हिस्से की अरबों रुपये की बिजली बेचने का हक हासिल करना मुख्यमंत्री सुक्खू की रणनीतिक व राजनीतिक परिपक्वता और प्रदेश की सम्पदा के संरक्षण की प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
इसी तरह मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू ने प्रदेश में अतिरिक्त उत्पादित बिजली के लिए उत्तर भारत के उन राज्यों, जिन्हें पूर्ववर्ती सरकारें 3 रुपये या 3.50 रुपये प्रति यूनिट बेचती रही थीं, को दरकिनार कर दक्षिण भारत के राज्यों का रुख किया और तमिलनाडु के साथ 150 मेगावाट बिजली बेचने का करार 13 रुपये प्रति यूनिट की दर से किया है। अब केरल और आंध्र प्रदेश भी हिमाचल से पीक आवर्स में बिजली खरीदने की बात कर रहे हैं। पूर्व में रहे मुख्यमंत्री दिल्ली और उत्तर प्रदेश से आगे सोच ही नहीं पाए। यह केवल सुक्खू है तो सम्भव है।
लगभग एक दशक से भी अधिक समय से कर्मचारियों और पेंशनरों के एरियर की अदायगी पूर्ववर्ती वीरभद्र सिंह और नेता प्रतिपक्ष एवं पूर्व मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर की सरकारें, मुख्यमंत्री सुक्खू के अनुसार, 54 हजार करोड़ रुपये आरडीजी और 16 हजार करोड़ रुपये जीएसटी मुआवजे के रूप में मिलने के बावजूद नहीं कर पाईं। लेकिन सुक्खू ने केंद्र सरकार द्वारा हिमाचल प्रदेश की आरडीजी और जीएसटी समाप्त करने के बाद भी चरणबद्ध तरीके से 1 जनवरी, 2016 से 31 दिसंबर, 2022 के बीच सेवानिवृत्त हुए क्लास-III पेंशनरों को उनके पेंशन एरियर का 30 प्रतिशत, जबकि क्लास-I और क्लास-II पेंशनरों को 15 प्रतिशत एरियर अक्तूबर में देने की घोषणा की है।
2023 और 2025 की अप्रत्याशित आपदाओं में हजारों की संख्या में मकान और पशुशालाएं ध्वस्त हो गईं और लोग बेघर हो गए। केंद्र सरकार ने राहत के नाम पर हाथ कस लिए, लेकिन सुक्खू ने प्रदेश के सीमित साधनों का विवेकपूर्ण उपयोग करते हुए बाबा आदम के जमाने के राहत मैनुअल के नियमों को ताक पर रखते हुए समुचित और सम्मानजनक राहत पैकेज दिया, जिसकी सराहना हर मंच पर हुई और हो रही है। पूरी तरह ध्वस्त मकान के लिए 8.50 लाख रुपये दिए गए, जबकि राहत मैनुअल में केवल 1.50 लाख रुपये का प्रावधान है। समूचे देश में सुक्खू ही ऐसे मुख्यमंत्री हैं, जिन्होंने यह कारनामा कर दिखाया है।
प्रदेश के हजारों असहाय और अनाथ बच्चों को ‘चिल्ड्रन ऑफ द स्टेट’ का दर्जा देकर उनकी पढ़ाई, दवाई, कपड़ा, सम्मानजनक जेब खर्च तथा अन्य बच्चों की तरह देश-विदेश घूमने, हवाई यात्रा करने और आलीशान होटलों में ठहरने का हक देना समूचे हिंदुस्तान में केवल सुक्खू ही कर पाए हैं।
इन माफियाओं पर जब सुक्खू ने नकेल कसी तो कांग्रेस के कुछ विधायकों और मंत्रियों में बेचैनी हुई और हो रही है। वे झुंड बनाकर हाईकमान को हर दिन शिकायत करते हैं कि मुख्यमंत्री की कार्यशैली ठीक नहीं है। सुक्खू को हटाने की जुगत लगा रहे हैं, लेकिन सुक्खू तो सुक्खू है—जो सही है, वही है।
खेती-किसानी, बागवानी और पशुपालकों को गेहूं, मक्का, हल्दी, अदरक, जौ, दूध आदि का न केवल समर्थन मूल्य दिया, अपितु बाजार उपलब्ध करवाने की सोच को जमीन पर उतारना सुक्खू की खास उपलब्धि है।
मुख्यमंत्री की कुर्सी को दांव पर लगाकर कांग्रेस और भाजपा में गहरी पैठ बनाए तबादला माफिया, खनन माफिया तथा लोक निर्माण विभाग, जल शक्ति विभाग और वन विभाग में सक्रिय ठेकेदार माफिया पर नकेल कसने की हिम्मत मुख्यमंत्री सुक्खू ही दिखा पाए। वरना तबादला माफिया तो इतना हावी हो चुका था कि मुख्यमंत्रियों के लेटरहेड पर मुख्यमंत्री के फर्जी हस्ताक्षर कर ट्रांसफर करवाए जा रहे थे।
इन माफियाओं पर जब सुक्खू ने नकेल कसी तो कांग्रेस के कुछ विधायकों और मंत्रियों में बेचैनी हुई और हो रही है। वे झुंड बनाकर हाईकमान को हर दिन शिकायत करते हैं कि मुख्यमंत्री की कार्यशैली ठीक नहीं है। सुक्खू को हटाने की जुगत लगा रहे हैं, लेकिन सुक्खू तो सुक्खू है—जो सही है, वही है।