मोहिंद्र प्रताप सिंह राणा
शिमला, 24 सितंबर। सेब खरीद की परंपरागत प्रक्रिया में कागजी औपचारिकताओं और बिचौलिया तंत्र की संभावनाओं को सीमित करते हुए प्रदेश सरकार ने मंडी मध्यस्थता योजना (एमआईएस) को इस सीजन में पूरी तरह डिजिटल प्लेटफॉर्म से जोड़ दिया है। एचपीएमआईएस के माध्यम से बागवान के पंजीकरण से लेकर सेब की खरीद, डिजिटल रसीद, परिवहन, प्रसंस्करण, निगरानी और भुगतान तक पूरी प्रक्रिया ऑनलाइन होने से योजना में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने का दावा किया गया है। योजना के तहत अब तक 8,000 मीट्रिक टन से अधिक सेब खरीदा जा चुका है, जबकि 17 हजार से अधिक बागवान एचपीएमआईएस पर पंजीकरण करवा चुके हैं।
मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविन्द्र सिंह सुक्खू ने कहा कि एमआईएस का डिजिटलीकरण बागवानों को अधिक पारदर्शी, जवाबदेह और सुविधाजनक व्यवस्था उपलब्ध करवाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। उन्होंने कहा कि एकमुश्त पंजीकरण, डिजिटल रसीद, रियल-टाइम निगरानी और प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (डीबीटी) जैसी व्यवस्थाओं से प्रक्रियागत अड़चनें कम होंगी और पात्र भुगतान सीधे बागवानों के बैंक खातों में पहुंच सकेगा।
1 अगस्त से 31 अक्तूबर तक चलने वाली खरीद प्रक्रिया के लिए प्रदेश में 213 सेब संग्रहण केंद्र स्थापित किए गए हैं, जिनका संचालन एचपीएमसी और हिमफेड कर रहे हैं। बागवानों के लिए इस वर्ष एक बार पंजीकरण की व्यवस्था की गई है। एक बार एचपीएमआईएस पर पंजीकरण होने के बाद आगामी वर्षों में दोबारा पंजीकरण की आवश्यकता नहीं होगी। उन्हें केवल संबंधित संग्रहण केंद्र पर सेब जमा करवाने की सूचना डिजिटल माध्यम से देनी होगी।
एमआईएस के तहत स्वीकृत सेब की मात्रा एचपीएमआईएस में दर्ज होने के साथ ही डिजिटल रसीद जारी होगी, जिसकी प्रति पंजीकृत मोबाइल नंबर या अकाउंट पर उपलब्ध करवाई जाएगी। योजना की निर्धारित शर्तों और भुगतान के सत्यापन के बाद पात्र राशि डीबीटी के माध्यम से सीधे पंजीकृत बैंक खाते में हस्तांतरित की जाएगी। इसके लिए बागवानों को पोर्टल पर अपना मोबाइल नंबर और बैंक खाते का विवरण सही एवं अद्यतन रखना होगा।
डिजिटलीकरण का एक महत्वपूर्ण प्रभाव यह भी है कि अब रिकॉर्ड और रसीदों के लिए बागवानों को एचपीएमसी और हिमफेड के कार्यालयों के अनावश्यक चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे। साथ ही एचपीएमसी के पराला (शिमला), परवाणू (सोलन) और जड़ोल (मंडी) स्थित प्रसंस्करण संयंत्रों तक सेब की खरीद, परिवहन और प्रसंस्करण की रियल-टाइम निगरानी संभव होगी। रसीद, चालान, रिपोर्ट और रजिस्टर डिजिटल होने से खरीदे गए सेब के शीघ्र निस्तारण और प्रसंस्करण में भी सुविधा मिलेगी।
हिमाचल की बागवानी अर्थव्यवस्था में सेब की भूमिका को देखते हुए एमआईएस का महत्व और बढ़ जाता है। सेब राज्य के कुल फल उत्पादन का करीब 80 प्रतिशत है और फलदार फसलों के कुल क्षेत्रफल में इसका हिस्सा लगभग 50 प्रतिशत है। देश के सेब उत्पादन में हिमाचल की हिस्सेदारी करीब 22 प्रतिशत है। राज्य में शिमला अकेला करीब 55 प्रतिशत सेब उत्पादन करता है, जबकि कुल्लू, किन्नौर और मंडी अन्य प्रमुख उत्पादक जिले हैं।
एमआईएस का उद्देश्य बाजार में अधिक आवक अथवा मंदी की स्थिति में बागवानों को एक वैकल्पिक और सुनिश्चित खरीद माध्यम उपलब्ध करवाना है। सरकार के अनुसार इससे बाजार पर दबाव के समय बागवानों को राहत मिलने के साथ कम गुणवत्ता वाले फलों के खुले बाजार में अनियंत्रित प्रवाह को रोकने, सेब के प्रसंस्करण और मूल्यवर्धन को बढ़ावा देने में भी मदद मिलती है।
बागवान एचपीएमआईएस पोर्टल अथवा एंड्रॉयड और आईओएस एप्लिकेशन के माध्यम से स्वयं पंजीकरण कर सकते हैं। इसके अलावा कॉमन सर्विस सेंटर, लोक मित्र केंद्र और ग्राम पंचायतों की सहायता भी ली जा सकती है। शिमला जिले में पंजीकरण के लिए 681 लोक मित्र केंद्र उपलब्ध हैं।
मुख्यमंत्री ने बागवानों से शीघ्र एचपीएमआईएस पर पंजीकरण करवाने तथा मोबाइल नंबर और बैंक खाते का विवरण अद्यतन रखने का आग्रह किया है। उन्होंने निर्धारित संग्रहण केंद्रों पर ही सेब जमा करवाने और डिजिटल रसीद को अपने रिकॉर्ड के लिए सुरक्षित रखने की सलाह दी। पंजीकरण, खरीद अथवा भुगतान से संबंधित किसी भी समस्या के लिए बागवान एचपीएमसी, हिमफेड, संबंधित संग्रहण केंद्र, लोक मित्र केंद्र या ग्राम पंचायत से सहायता ले सकते हैं।
सुक्खू ने कहा कि बागवानों के हितों की रक्षा और राज्य की बागवानी अर्थव्यवस्था को मजबूत करना सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल है। उनके अनुसार एमआईएस 2026-27 का डिजिटल स्वरूप योजना को अधिक पारदर्शी, जवाबदेह और बागवान-केंद्रित बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल है।