मोहिंद्र प्रताप सिंह राणा/ ग्राम परिवेश
हिमाचल की सुक्खू सरकार की सियासत में एक अजीब विडंबना उभर रही है—जब सरकार किसी बड़े मोर्चे पर बढ़त बनाती है, मुख्यमंत्री की लोकप्रियता का ग्राफ ऊपर जाता है या प्रदेश हित में कोई महत्वपूर्ण फैसला उसके खाते में जुड़ता है, तभी कांग्रेस के भीतर का एक महत्वाकांक्षी धड़ा सक्रिय होकर विवाद की ऐसी पटकथा लिख देता है, जिसकी सुर्खियां सरकार की उपलब्धियों पर भारी पड़ जाती हैं। कभी आपदा प्रबंधन की सफलता सत्ता संकट के शोर में दब गई, कभी उपचुनाव की जीत के बाद उठे अंतर्विरोधों ने सरकार के वित्तीय प्रबंधन को कठघरे में खड़ा कर दिया और कभी ग्रामीण अर्थव्यवस्था में सुधार तथा वित्तीय सुधारों की दिशा में बढ़ते कदमों के बीच पार्टी के भीतर की बयानबाजी ने विमर्श का रुख मोड़ दिया। अब किशाऊ बांध, 18 प्रतिशत रॉयल्टी, वाइल्ड फ्लावर हॉल समझौते, न्यायिक फैसलों और ग्रामीण आय में बढ़ोतरी जैसे मुद्दों के बीच दिल्ली दरबार में शिकायतों और सोशल मीडिया लीक का सिलसिला फिर चर्चा में है।
इन घटनाओं को यदि महज अलग-अलग राजनीतिक प्रसंग मानने के बजाय उनके कालक्रम और आपसी अंतर्संबंधों में पढ़ा जाए तो तस्वीर कहीं अधिक स्पष्ट होकर सामने आती है। वित्तीय दबावों से जूझती नवोदित सुक्खू सरकार की पहली बड़ी अग्निपरीक्षा जुलाई 2023 की विनाशकारी प्राकृतिक आपदा थी। बादल फटने की घटनाओं ने प्रदेश के कई जिलों में तबाही मचा दी; पर्यटक स्थलों और दुर्गम ग्रामीण क्षेत्रों में हजारों लोग फंस गए, सड़क तंत्र बुरी तरह क्षतिग्रस्त हुआ और अनेक परिवारों के आशियाने उजड़ गए। त्रासदी की उस घड़ी में मुख्यमंत्री ने स्वयं मोर्चा संभाला और राहत-बचाव अभियान को जिस सक्रियता से आगे बढ़ाया, उसकी अंतर्राष्ट्रीय, राष्ट्रीय स्तर पर भी चर्चा और सराहना हुई। लेकिन सरकार की इस उपलब्धि को राजनीतिक स्थायित्व में बदलने से पहले ही कांग्रेस के भीतर का अंतर्विरोध सत्ता संकट में तब्दील हो गया। 28 फरवरी 2024 का राजनीतिक घटनाक्रम—राज्यसभा चुनाव में क्रॉस-वोटिंग, छह कांग्रेस विधायकों की अयोग्यता और बाद में उनका भाजपा में जाना तथा विक्रमादित्य सिंह का इस्तीफा—सरकार गिराने की कोशिश के रूप में सामने आया। सुक्खू सरकार इस संकट से निकल आई, मगर आपदा प्रबंधन की उपलब्धि राजनीतिक उठापटक की भूलभुलैया में कहीं पीछे छूट गई।
इसके बाद नौ विधानसभा सीटों पर हुए उपचुनाव में कांग्रेस ने सुक्खू के नेतृत्व में छह सीटें जीतकर अपनी राजनीतिक स्थिति मजबूत की। स्वाभाविक था कि यह परिणाम सरकार के नेतृत्व और उसके जनाधार को नई धार देता, लेकिन इसके साथ ही पार्टी के भीतर से मुख्यमंत्री की कार्यप्रणाली और वित्तीय प्रबंधन पर सवाल उठने लगे। सरकार के दो वर्ष पूरे होने के अवसर पर उपलब्धियों और विपक्ष के असफल सत्ता-प्रयास को राजनीतिक मुद्दा बनाने के बजाय सत्ता के भीतर से ही सरकारी तंत्र पर उठे सवालों ने विपक्ष और मीडिया को नई सुर्खियां दे दीं। वर्ष 2025 में जब सरकार वित्तीय संसाधनों को मजबूत करने और सुधारों को दिशा देने के साथ ग्रामीण अर्थव्यवस्था में बदलाव की कोशिशों को जमीन पर उतार रही थी और उनके परिणामों की चर्चा शुरू हुई, तभी कांग्रेस के भीतर तथाकथित ‘वीरभद्र स्कूल ऑफ थाट’ की सियासी आहट फिर सुनाई देने लगी। उपमुख्यमंत्री मुकेश अग्निहोत्री के ‘साजिशों के दौर—झूठ के पांव नहीं होते’ जैसे फिकरों ने इस अंतर्धारा को सार्वजनिक विमर्श में ला दिया। बाद में स्वर्गीय वीरभद्र सिंह की प्रतिमा रिज पर स्थापित होने के साथ वह राजनीतिक शोर थम गया, लेकिन तब तक सुक्खू सरकार के वित्तीय सुधारों और वर्ष 2025 की आपदा से निपटने की उपलब्धियां एक बार फिर अंतर्कलह की गर्द में दब चुकी थीं। विपक्ष के लिए इससे अधिक अनुकूल स्थिति और क्या होती—जिस राजनीतिक काम को उसे अपने पक्ष में खड़ा करना था, उसकी सुर्खियां सत्ता पक्ष के भीतर से ही उपलब्ध हो रही थीं।
घटनाओं को कालक्रम में रखकर देखें तो सवाल केवल कांग्रेस के भीतर की गुटबाजी का नहीं रह जाता, बल्कि यह भी सामने आता है कि सत्ता की उपलब्धियों को बार-बार विवादों की धुंध में कौन और क्यों ओझल कर रहा है। यही वह बिंदु है जहां चौपाल की सियासी चर्चा संगठन की जमीन से उठकर सत्ता के गलियारों तक पहुंचती है और सवाल छोड़ जाती है—क्या यह महज महत्वाकांक्षाओं का टकराव है, या फिर सत्ता की उपलब्धियों पर अपने ही हाथों से परदा डालने वाली कोई गहरी राजनीतिक प्रवृत्ति?
विवाद और दबाव की सियासत का यह सिलसिला भी अपने आप में कम दिलचस्प नहीं है। कांग्रेस के भीतर सक्रिय रहने वाला यह अस्थायी-सा ‘झुंड’—जिसमें दो-तीन चेहरों को छोड़कर बाकी राजनीतिक सुविधा और महत्वाकांक्षा के हिसाब से जुड़ते-बिछड़ते रहते हैं—दिल्ली दरबार में न्याय के घंटे की रस्सी तब खींचता है, जब सुक्खू सरकार की राजनीतिक बढ़त सबसे ऊंची दिखाई देती है। किशाऊ बांध, जेएसडब्ल्यू की 18 प्रतिशत रॉयल्टी, वाइल्ड फ्लावर हॉल को लेकर हजारों करोड़ रुपये के अनुकूल समझौते, न्यायिक फैसलों और ग्रामीण आय में बढ़ोतरी से बन रही सकारात्मक जमीन के बीच शिकायतों का दिल्ली कूच इसलिए महज संयोग मान लेना भी राजनीतिक रूप से भोला निष्कर्ष होगा। दिल्ली पहुंचते ही बातचीत के अंशों का सोशल मीडिया अथवा विपक्षी खेमे तक पहुंचना और फिर उनका सियासी फिकरे में बदलकर वायरल हो जाना इस दबाव की राजनीति की कार्यशैली पर सवाल जरूर खड़ा करता है। इस बार भी ‘सुंदर कांड’ इसी कड़ी की एक और कड़ी बनकर सामने आया।
चौपालों के सियासी सूत्रधारों की बात मानें तो असली संकट दिल्ली में नहीं, कांग्रेस की अपनी जमीन पर है। उनका सवाल है कि प्रदेश प्रभारी यदि संगठन की राजनीतिक धार तेज करने के लिए ब्लॉक और जिला स्तर के कार्यकर्ताओं के बीच समय नहीं निकालतीं, लेकिन नेताओं के निजी आयोजनों(शादी-व्याह जन्मदिन , जागरण आदि में एक-दो दिन की मौजूदगी दर्ज कराती हैं, तो कार्यकर्ता के मन में संगठन की प्राथमिकताओं को लेकर स्वाभाविक प्रश्न उठेंगे। ऐसे आयोजनों में विपक्षी नेताओं से होने वाली बंद कमरे की मुलाकातें भले ही राजनीतिक शिष्टाचार हों, लेकिन उनकी अस्पष्टता कार्यकर्ताओं के मन में स्पष्टता के बजाय संशय पैदा करती है। राजनीति में धार केवल नेताओं की बैठकों से नहीं, कार्यकर्ता के भरोसे से बनती है; और जब वही भरोसा धुंधला पड़े तो संगठन का सबसे मजबूत राजनीतिक औजार कुंद होने लगता है।
इसी कड़ी में चौपाल के ये सियासी सूत्रधार प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और संगठन के दूसरे पदाधिकारियों मंत्रीगण को भी सवालों के घेरे में रखते हैं। उनका कहना है कि जिस सरकार के ग्रामीण विकास के फैसले, योजनाएं और हिमाचल हित से जुड़े निर्णय गांव की अर्थव्यवस्था और आम आदमी की जिंदगी को प्रभावित कर रहे हैं, उन्हें जनता तक पहुंचाने का दायित्व यदि सत्तापक्ष ही नहीं निभाएगा तो विपक्ष को अलग से मेहनत करने की जरूरत क्या रह जाएगी? सरकार के मंचों से उपलब्धियों की चर्चा के बजाय अपने ही नेता जब ऐसे फिकरे उछाल दें, जिन्हें विपक्ष तत्काल राजनीतिक हथियार में बदल दे, तो सवाल केवल बयान का नहीं, राजनीतिक संप्रेषण की समझ का बन जाता है। अंततः विडंबना यही है कि विपक्ष जिस काम के लिए वर्षों से राजनीतिक जमीन तलाशता है, सत्ता पक्ष का अंतर्विरोध उसे वह जमीन बार-बार खुद सौंप देता है। सरकार की उपलब्धियां यदि फाइलों में दर्ज हों और सुर्खियां उसके अंतर्विरोध लिखें, तो सियासत में नुकसान विपक्ष नहीं, सत्ता पक्ष की अपनी खामोशी और आपसी खींचतान करती है।