
मोहिंद्र प्रताप सिंह राणा
डॉ. वाई.एस. परमार ने 22 जुलाई 1972 को हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय की नींव केवल एक शिक्षण संस्थान खड़ा करने के लिए नहीं रखी थी। उनके सामने इससे कहीं विराट स्वप्न था—“तमसो मा ज्योतिर्गमय”, अर्थात हिमाचल की दूरदराज, दुर्गम और सामाजिक-शैक्षिक रूप से पिछड़ी पीढ़ियों को अज्ञान और अवसरहीनता के अंधकार से ज्ञान, विवेक और संभावनाओं के प्रकाश तक ले जाना। विश्वविद्यालय उनके लिए महज डिग्रियां बांटने का केंद्र नहीं, बल्कि हिमाचल की बौद्धिक चेतना को आकार देने और नई पीढ़ी के भविष्य का द्वार खोलने वाला ज्ञान-दीप था।
इसी व्यापक दृष्टि के अनुरूप परमार ने नियुक्तियों में संकीर्णता और पक्षधरता के बजाय योग्यता, विद्वत्ता और अकादमिक क्षमता को कसौटी बनाया। देश-विदेश के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में अध्यापन कर रहे प्रतिभाशाली भारतीय शिक्षाविदों को हिमाचल बुलाया गया, ताकि नवजात विश्वविद्यालय में ज्ञान की ऐसी परंपरा विकसित हो जो प्रदेश की सीमाओं से आगे जाकर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाए। इस दूरदृष्टि का प्रतिफल भी मिला। इस विश्वविद्यालय से शिक्षा लेकर निकले अनेक विद्यार्थी देश-विदेश में शिक्षा, प्रशासन, सामाजिक सेवा और अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्रों में प्रतिष्ठित पदों तक पहुंचे और अपने ज्ञान से समाज को दिशा दी।
लेकिन विडम्बना यह है कि परमार के बाद सत्ता में आई सरकारों—चाहे वे कांग्रेस की रही हों या भाजपा की—ने धीरे-धीरे उस मूल स्वप्न की आत्मा को कितना जीवित रखा, यह आज गंभीर आत्ममंथन का विषय है। जिस विश्वविद्यालय को ज्ञान और प्रतिभा का प्रकाश-स्तंभ बनना था, वह समय के साथ कहीं-कहीं नियुक्तियों और रोजगार के राजनीतिक-सामाजिक समीकरणों का केंद्र बनता दिखाई दिया। “तमसो मा ज्योतिर्गमय” की मूल संकल्पना के स्थान पर विश्वविद्यालय के चरित्र पर “नौकरियों की पौधशाला” होने का आरोप चस्पां होने लगा।
यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि डॉ. यशवंत सिंह परमार के बाद विश्वविद्यालय में हुई शिक्षक नियुक्तियों का बड़ा हिस्सा किसी न किसी स्तर पर न्यायिक चुनौती और विवादों के घेरे में रहा है। समय-समय पर ऐसी नियुक्तियों में नियमों, योग्यता और मेरिट से अधिक राजनीतिक प्रभाव, रसूखदार परिवारों और सत्ता-संबंधों के दबाव को तरजीह दिए जाने के आरोप भी सामने आते रहे हैं। राजनेताओं के परिजनों से लेकर प्रभावशाली परिवारों तथा पत्रकारों अथवा उनके परिजनों तक को नियुक्तियों में कथित लाभ पहुंचाए जाने के सवाल विश्वविद्यालय की नियुक्ति-प्रक्रिया की पारदर्शिता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाते रहे हैं।
ऐसे परिदृश्य में यह भी उल्लेखनीय है कि पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. परमार के बाद यदि किसी मुख्यमंत्री ने विश्वविद्यालय की मूल आत्मा को फिर से उसके केंद्र में लाने और “तमसो मा ज्योतिर्गमय” की परिकल्पना को नियुक्तियों में मेरिट, योग्यता और अकादमिक उत्कृष्टता के माध्यम से पुनर्स्थापित करने की मंशा व्यक्त की है, तो वे मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू हैं। मौजूदा सरकार की ओर से विधेयक के समर्थन में प्रस्तुत तर्कों का मूल आधार भी यही बताया गया कि विश्वविद्यालय की नियुक्ति और प्रशासनिक व्यवस्था में व्याप्त विसंगतियों को दूर कर पारदर्शिता, जवाबदेही और योग्यता को पुनः केंद्रीय कसौटी बनाया जाए। हालांकि, इस पहल की वास्तविक सफलता का आकलन उसके घोषित उद्देश्य से नहीं, बल्कि भविष्य में होने वाली नियुक्तियों की निष्पक्षता और मेरिट की सर्वोच्चता से ही होगा।
अयोग्य अथवा संदिग्ध रूप से चयनित उम्मीदवारों के मामले का उल्लेख आज विधानसभा में विश्वविद्यालय अधिनियम पर हुई चर्चा के दौरान विधायक एवं विश्वविद्यालय कार्यकारी परिषद के सदस्य सुरेश कुमार, हरीश जनारथा, मंत्री राजेश धर्माणी व कैग रिपोर्ट में भी किया है। वित्तीय अनियमितताओं और प्रशासनिक कुप्रबंधन को लेकर कैग की रिपोर्ट में की गई सख्त टिप्पणियों ने विश्वविद्यालय के शैक्षणिक प्रशासन, वित्तीय अनुशासन और संस्थागत जवाबदेही पर भी सवाल खड़े किए हैं।
इन्हीं विसंगतियों को दूर करने, नियुक्ति एवं प्रशासनिक प्रक्रियाओं में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने तथा व्यवस्था में सुधार का हवाला देते हुए मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू ने विश्वविद्यालय अधिनियम संशोधन विधेयक के पक्ष में प्रभावी ढंग से पैरवी की। उन्होंने विपक्ष से भी व्यापक संस्थागत हित में विधेयक का समर्थन करने का आग्रह किया।