मोहिंद्र प्रताप सिंह राणा

 कांग्रेस सरकार के कार्यकाल के लगभग चार साल पूरे होने को हैं, लेकिन हिमाचल भाजपा अब भी विपक्ष की अपनी प्रभावी राजनीतिक भूमिका और सरकार को घेरने वाले धारदार मुद्दों की तलाश में दिखाई देती है। सवाल यह है कि सरकार को कठघरे में खड़ा करने के लिए मुद्दों का अकाल है, संगठन के पास ठोस रणनीति का अभाव है या फिर, जैसा मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू बार-बार राजनीतिक तंज कसते हैं, भाजपा पांच गुटों में बंटी होने के कारण एकजुट राजनीतिक दिशा तय नहीं कर पा रही। विपक्ष ने कभी गाय-गोबर की गारंटी, कभी 300 यूनिट मुफ्त बिजली, कभी दूध के दाम, कभी महिलाओं को हर माह 1500 रुपये देने और कभी किसी अन्य चुनावी वादे को निशाना बनाकर सरकार पर हमला जरूर बोला, लेकिन इन छिटपुट मुद्दों को किसी व्यापक, निरंतर और जनभावना से जुड़े राजनीतिक अभियान में बदलने में वह अब तक अपेक्षित सफलता हासिल नहीं कर पाया। नतीजा यह है कि लगभग चार साल बाद भी भाजपा की विपक्षी राजनीति किसी ठोस वैकल्पिक विमर्श के बजाय सरकार के चुनावी वादों के इर्द-गिर्द ही घूमती दिखाई दे रही है। 

विडंबना यह है कि सरकार के लगभग चार वर्ष पूरे होने के बावजूद विपक्ष के तरकश में ऐसे नए और धारदार मुद्दे नजर नहीं आते, जो सत्ता पक्ष को लगातार रक्षात्मक मुद्रा में बनाए रख सकें। भाजपा कभी-कभार किसी मुद्दे को उछालकर सरकार पर सियासी वार जरूर करती है, लेकिन वह वार स्थायी राजनीतिक दबाव में बदलने से पहले ही अपना असर खो देता है। नतीजा यह है कि कांग्रेस की गारंटियां ही भाजपा के राजनीतिक विमर्श का स्थायी आधार बनी हुई हैं—मानो विपक्ष को अपने स्वतंत्र और प्रभावी मुद्दे तलाशने के बजाय सत्ता पक्ष के पुराने वादों में ही अपना ‘अम्युनिशन’ ढूंढना पड़ रहा हो। चार साल बाद भी यदि विपक्ष की राजनीति सत्ता पक्ष के वादों के इर्द-गिर्द ही घूमती रहे, तो सवाल केवल सरकार की कार्यशैली पर नहीं, विपक्ष की रणनीतिक धार पर भी उठना स्वाभाविक है।

भाजपा में गुटबाजी है या नहीं, यह चुनावी रणनीति और परिणाम को प्रभावित करने वाला अलग विषय हो सकता है, लेकिन सत्ता पक्ष को लगातार कटघरे में खड़ा रखना संगठन और नेता प्रतिपक्ष के बीच सियासी समझ, सामंजस्य और साझा रणनीति की कसौटी है। दुर्भाग्य से हिमाचल भाजपा में यह तालमेल अब तक अपेक्षित स्तर पर दिखाई नहीं दिया। प्रदेश अध्यक्ष की संगठन को एकजुट कर राजनीतिक मोर्चे पर सक्रिय और आक्रामक बनाए रखने की भूमिका यहां सबसे महत्वपूर्ण हो जाती है, लेकिन संगठन और नेता प्रतिपक्ष के बीच ऐसी राजनीतिक ‘ट्यूनिंग’ नजर नहीं आई, जिससे दोनों एक दिशा में ताकत लगाते हुए भाजपा के रथ को उसके घोषित लक्ष्य की ओर आगे बढ़ाते दिखाई दें। उलटे, समय-समय पर सार्वजनिक मंचों और सोशल मीडिया पर सामने आने वाले वीडियो और घटनाक्रम आपसी समन्वय की कमी का संकेत देते हैं। विपक्ष की राजनीति में यह केवल दृश्य असहजता नहीं, बल्कि संगठनात्मक नेतृत्व की उस कमजोरी का संकेत है, जो सरकार के खिलाफ उपलब्ध राजनीतिक अवसरों को प्रभावी अभियान में बदलने की राह में बाधा बन सकती है।

अब असली सवाल यह है कि क्या सुक्खू सरकार वास्तव में जनभावनाओं और प्रदेश की जरूरतों के अनुरूप चल रही है, या भाजपा विपक्ष की भूमिका में रणनीति के स्तर पर लगातार चूक रही है? चार साल के राजनीतिक घटनाक्रम को देखें तो भाजपा की सबसे बड़ी कमजोरी उन मौकों पर उजागर हुई, जब हिमाचल को सियासी बयानबाजी नहीं, बल्कि संकट की घड़ी में अपने पक्ष में खड़े होने वाले मजबूत राजनीतिक नेतृत्व की जरूरत थी। इस रणनीतिक चूक की जिम्मेदारी केवल प्रदेश भाजपा के नेताओं तक सीमित नहीं रहती; राष्ट्रीय नेतृत्व में नरेंद्र मोदी, अमित शाह और हिमाचल से सीधे राजनीतिक संबंध रखने वाले जे.पी. नड्डा भी इससे अलग नहीं किए जा सकते।

हिमाचल में आईं दो बड़ी प्राकृतिक आपदाओं के दौरान प्रदेश को तत्काल राहत और आकलित सहायता राशि उपलब्ध कराने को लेकर केंद्र की अपेक्षित सक्रियता दिखाई नहीं दी। इसका सीधा बोझ पहले से गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रही सुक्खू सरकार पर पड़ा। लेकिन राजनीतिक रूप से इसका दूसरा पहलू भाजपा के लिए कहीं अधिक नुकसानदेह साबित हुआ। जिस समय भाजपा हिमाचलवासियों की पीड़ा को अपनी सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत बना सकती थी, उसी समय वह प्रदेश की जनता की आवाज बनने में पीछे रह गई। आपदा की घड़ी में हिमाचल के साथ खड़े होने का अवसर सरकार के खिलाफ विपक्ष का सबसे प्रभावी हथियार बन सकता था, लेकिन भाजपा उसे भी एक सुसंगत राजनीतिक अभियान में नहीं बदल पाई।

इसके विपरीत, सुक्खू सरकार ने केंद्र की राहत राशि का इंतजार करने के बजाय अपनी सीमित आर्थिक क्षमता के भीतर आपदा प्रभावितों के साथ खड़े होने का फैसला किया। आर्थिक तंगहाली और स्थापित आपदा राहत प्रावधानों की सीमाओं के बावजूद मुख्यमंत्री ने प्रभावित परिवारों के लिए आठ-आठ लाख रुपये के राहत पैकेज की घोषणा की और जिन लोगों के घर पूरी तरह ध्वस्त हो गए थे, उनके लिए किराये के मकान का खर्च देने की व्यवस्था की। यह केवल आर्थिक सहायता का फैसला नहीं था; यह संकट की घड़ी में सरकार के प्रभावितों के साथ खड़े होने का स्पष्ट राजनीतिक और मानवीय संदेश भी था। इस पहल की सराहना प्रदेश से बाहर भी हुई और इसे लेकर भाजपा के वरिष्ठ नेताओं तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सकारात्मक प्रतिक्रियाएं सामने आईं।

विडंबना यह रही कि सुक्खू सरकार के इस कदम को राजनीतिक चुनौती देने के लिए प्रदेश भाजपा केंद्रीय सहायता और उसके आंकड़े गिनाती रही, लेकिन वह उस मूल सवाल को नहीं पकड़ सकी जो हिमाचल की जनता के सामने था—आपदा के समय हिमाचल के साथ कौन खड़ा है? यही वह जगह थी जहां भाजपा की रणनीति लड़खड़ाती दिखाई दी। उसे केंद्र से हिमाचल के लिए अधिक तत्काल राहत की मांग को अपनी राजनीतिक लड़ाई बनाना चाहिए था और प्रदेश के 75 लाख लोगों की आवाज बनना चाहिए था। इसके बजाय वह सहायता के आंकड़ों के बचाव तक सिमटती दिखाई दी। राजनीतिक दृष्टि से यही उसकी बड़ी और अदक्ष रणनीतिक भूल थी।

क्योंकि विपक्ष के लिए आपदा केवल सरकार को घेरने का अवसर नहीं होती; वह जनता के दुख के साथ खड़े होकर अपना राजनीतिक नैतिक आधार मजबूत करने का अवसर भी होती है। हिमाचल की दो बड़ी आपदाओं ने भाजपा को यह अवसर दिया था, लेकिन प्रदेश के हित को केंद्र में रखकर उस अवसर को राजनीतिक शक्ति में बदलने में वह विफल रही। यही चूक आगे चलकर उसके लिए सियासी बोझ बनती गई—और सुक्खू सरकार के लिए, तमाम आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद, अपने पक्ष में राजनीतिक नैरेटिव गढ़ने का अवसर।

भाजपा ने पहली चूक से कोई सबक नहीं लिया और 2025 की आपदा में भी वही रणनीतिक भूल दोहरा दी। एक बार फिर हिमाचल को तत्काल राहत की जरूरत थी, लेकिन फौरी सहायता को लेकर केंद्र पर वह दबाव नहीं बनाया गया, जिसकी अपेक्षा प्रदेश के विपक्ष से थी। उस समय प्रधानमंत्री केयर्स फंड में हजारों करोड़ रुपये की उपलब्ध राशि का हवाला भी सार्वजनिक विमर्श में आता रहा, जबकि केंद्र के आकलन से जुड़ी करीब 1500 करोड़ रुपये की सहायता का इंतजार हिमाचलवासी आज भी कर रहे हैं। सवाल केवल राशि का नहीं है; सवाल यह है कि जब प्रदेश आपदा से जूझ रहा था, तब हिमाचल भाजपा उसके हक की आवाज बनकर कितनी मजबूती से खड़ी हुई? दुर्भाग्य से आज भी इस सवाल का संतोषजनक राजनीतिक उत्तर दिखाई नहीं देता।

आमतौर पर किसी सत्तासीन सरकार का चौथा साल उसके खिलाफ उपलब्धियों से अधिक विफलताओं और वादाखिलाफी का लेखा-जोखा खोल देता है। लेकिन हिमाचल में तस्वीर कुछ उलटी दिखाई देती है। सुक्खू सरकार ने केंद्र की ओर से रेवेन्यू डेफिसिट ग्रांट बंद किए जाने को प्रदेश की वित्तीय सेहत पर सीधा प्रहार बताते हुए इसे राजनीतिक मुद्दा बना लिया और प्रस्तुतियों के जरिए प्रदेशवासियों को आगाह किया कि इस फैसले से हिमाचल की अर्थव्यवस्था की रीढ़ पर गंभीर असर पड़ेगा। यह ऐसा मुद्दा था, जिसे भाजपा हिमाचल के वित्तीय हितों और अधिकारों की लड़ाई के रूप में अपने हाथ में ले सकती थी। लेकिन यहां भी वह हिमाचल के पक्ष में खड़े होने के बजाय केंद्र के फैसले के बचाव में दिखाई दी। जे.पी. नड्डा समेत भाजपा के कई नेताओं की ओर से इस फैसले को उचित ठहराने की स्थिति ने विपक्ष के लिए उपलब्ध एक और बड़े राजनीतिक अवसर को कमजोर कर दिया।

इस तरह भाजपा की सियासी रणनीति की विडंबना सामने आती है। पहले सरकार को राजनीतिक मुद्दों से घेरने की कोशिश हुई, जब उससे अपेक्षित परिणाम नहीं मिला तो आर्थिक मोर्चा खोलने की कोशिश की गई; लेकिन आर्थिक सवालों पर भी हिमाचल के हित को केंद्र में रखकर अपनी स्पष्ट और आक्रामक राजनीतिक लाइन खींचने में विपक्ष सफल नहीं हो पाया। जिस भाजपा को प्रदेश के आर्थिक अधिकारों, आपदा राहत और हिमाचलवासियों के हितों की सबसे मुखर आवाज बनना चाहिए था, वह कई निर्णायक मौकों पर अपनी ही रणनीति के बीच उलझी दिखाई दी।

और यहीं आकर पूरी कहानी एक पहाड़ी कहावत में सिमट जाती है—“रागें भुली …., गाए आल-बेताल।” यानी राग ही भूल गया और सुर-ताल से परे कुछ भी गाने लगा। सुक्खू सरकार को घेरने के लिए भाजपा ने कभी राजनीतिक हथियार आजमाए, कभी आर्थिक हथियार तलाशे, लेकिन हिमाचल की जनता के बीच सबसे बड़ा और स्वाभाविक सवाल—“संकट की घड़ी में हिमाचल के साथ कौन खड़ा है?”—उसे अपनी राजनीति का केंद्रीय राग बनाने में सफलता नहीं मिली। यही उसकी सबसे बड़ी रणनीतिक चूक है। चार साल की विपक्षी राजनीति के बाद भी यदि राग सत्ता को घेरने का न बने, बल्कि मुद्दों की तलाश में ही सुर बदलते रहें, तो पहाड़ की यह कहावत भाजपा की मौजूदा सियासी स्थिति पर बिल्कुल सटीक बैठती है—रागें भुली भाजपा गाए आल-बेताल।

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