
मोहिंद्र प्रताप सिंह राणा
जलवायु परिवर्तन, ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक आत्मनिर्भरता आज केवल नीतिगत विमर्श के विषय नहीं रह गए हैं, बल्कि राज्यों के अस्तित्व और भविष्य की विकास-दिशा तय करने वाले निर्णायक प्रश्न बन चुके हैं। हिमालयी प्रदेश होने के कारण हिमाचल इन चुनौतियों के प्रति और अधिक संवेदनशील है, जहां प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण ही आर्थिक समृद्धि का सबसे बड़ा आधार है। ऐसे समय में मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविंद्र सिंह सुक्खू की नीतियों में हरित परिवहन, स्वच्छ ऊर्जा, जलविद्युत संसाधनों पर प्रदेश के वैधानिक अधिकार तथा राजस्व के प्रत्येक वैध स्रोत को राज्य के पक्ष में सुनिश्चित करने का प्रयास एक समग्र आर्थिक दृष्टि के रूप में उभरता दिखाई देता है। एक ओर सार्वजनिक परिवहन को इलेक्ट्रिक और भविष्य में हाइड्रोजन आधारित बनाने की पहल है, तो दूसरी ओर किशाऊ जलविद्युत परियोजना, बीबीएमबी के लंबित एरियर, जलविद्युत परियोजनाओं में हिमाचल की हिस्सेदारी तथा न्यायालयों में प्रदेश के अधिकारों की दृढ़ पैरवी जैसे कदम यह संकेत देते हैं कि सरकार केवल विकास परियोजनाओं की घोषणा तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि हिमाचल की प्राकृतिक संपदा का आर्थिक प्रतिफल भी प्रदेश के लोगों तक पहुंचाने की राजनीतिक इच्छाशक्ति प्रदर्शित कर रही है। पर्यावरणीय दायित्व और आर्थिक अधिकारों का यही संतुलन भविष्य के आत्मनिर्भर हिमाचल की आधारशिला बन सकता है।

शिमला, 30 जुलाई। हिमाचल प्रदेश ने हरित सार्वजनिक परिवहन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बढ़ाते हुए गुरुवार को 297 नई टाइप-1 इलेक्ट्रिक बसों को एचआरटीसी के बेड़े में शामिल किया। मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविंद्र सिंह सुक्खू ने सोलन जिले के क्यारीघाट से इन बसों को विभिन्न डिपुओं के लिए रवाना किया। इसके साथ ही प्रदेश में एचआरटीसी की इलेक्ट्रिक बसों की संख्या लगभग 500 हो गई है। मुख्यमंत्री ने इस अवसर पर डिजिटल टिकटिंग और कैशलेस यात्रा को बढ़ावा देने के लिए ‘हिमबस प्लस कार्ड’ का भी शुभारंभ किया।
मुख्यमंत्री ने कहा कि इलेक्ट्रिक बसें केवल परिवहन का नया माध्यम नहीं हैं, बल्कि जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करने, कार्बन उत्सर्जन घटाने और परिचालन लागत में उल्लेखनीय कमी लाने का प्रभावी माध्यम हैं। उन्होंने बताया कि आधुनिक चार्जिंग अवसंरचना विकसित की जा चुकी है और राज्य सरकार ई-मोबिलिटी को दीर्घकालिक नीति के रूप में आगे बढ़ा रही है।
उन्होंने कहा कि वर्तमान में इलेक्ट्रिक बसों पर प्रति किलोमीटर 36 से 38 रुपये का खर्च आता है, जबकि डीजल बसों पर यही लागत 76 से 86 रुपये प्रति किलोमीटर है। इस प्रकार प्रत्येक किलोमीटर पर 40 से 50 रुपये तक की बचत संभव होगी, जिससे एचआरटीसी की वित्तीय स्थिति मजबूत होगी और निगम को आत्मनिर्भर बनाने में मदद मिलेगी।
मुख्यमंत्री ने घोषणा की कि राज्य सरकार इसी वर्ष एक हजार और इलेक्ट्रिक बसें खरीदेगी। साथ ही 100 हाइड्रोजन बसों की खरीद की योजना पर भी कार्य किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी की इलेक्ट्रिक बसें एक बार चार्ज होने पर 250 से 300 किलोमीटर तक चल सकेंगी, जिससे दुर्गम पर्वतीय क्षेत्रों में भी इनका संचालन अधिक प्रभावी होगा।
उन्होंने कहा कि सरकार का लक्ष्य केवल परिवहन प्रणाली का आधुनिकीकरण नहीं, बल्कि वर्ष 2027 तक हिमाचल को आत्मनिर्भर राज्य बनाना है। इसी दृष्टि से राजस्व के नए स्रोत विकसित करने, प्राकृतिक संसाधनों का बेहतर प्रबंधन करने तथा सार्वजनिक उपक्रमों की आर्थिक स्थिति मजबूत करने पर समान रूप से बल दिया जा रहा है।
मुख्यमंत्री ने वित्तीय अधिकारों के प्रश्न को भी उतनी ही स्पष्टता से उठाया। उन्होंने कहा कि विशेष राजस्व घाटा अनुदान (आरडीजी) बंद होने से प्रदेश को प्रतिवर्ष लगभग आठ से दस हजार करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है। इसके बावजूद राज्य सरकार वैकल्पिक संसाधनों के माध्यम से आर्थिक आधार मजबूत करने का प्रयास कर रही है।
उन्होंने कहा कि सरकार ने वाइल्ड फ्लावर हॉल से 421 करोड़ रुपये तथा जेएसडब्ल्यू से 150 करोड़ रुपये राज्य को दिलाए हैं। इसी क्रम में किशाऊ जलविद्युत परियोजना का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि इससे भविष्य में हिमाचल को लगभग एक हजार करोड़ रुपये की वार्षिक आय प्राप्त हो सकती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि प्रदेश सरकार ने हरियाणा के साथ किशाऊ परियोजना पर अंतिम सहमति को वर्ष 2011 से बीबीएमबी के लंबित एरियर के भुगतान से जोड़ रखा है। मुख्यमंत्री ने कहा कि न्यायालय के निर्णय के बावजूद यदि प्रदेश का वैधानिक बकाया लंबित रखा जाता है तो सरकार अपने अधिकारों की रक्षा के लिए सभी संवैधानिक और कानूनी विकल्पों का उपयोग करती रहेगी। उन्होंने कहा कि हिमाचल की जलविद्युत संपदा पर पहला अधिकार प्रदेश के लोगों का है और राज्य सरकार इस अधिकार से किसी प्रकार का समझौता नहीं करेगी।
उन्होंने कहा कि आर्थिक आत्मनिर्भरता केवल व्यय में कटौती से नहीं आती, बल्कि अपने प्राकृतिक संसाधनों से मिलने वाले वैध राजस्व को सुनिश्चित करने से आती है। जल, जंगल और जमीन हिमाचल की सबसे बड़ी पूंजी हैं और सरकार इन्हें केवल प्राकृतिक धरोहर नहीं, बल्कि भावी पीढ़ियों की आर्थिक सुरक्षा के आधार के रूप में देख रही है।
कार्यक्रम में उपमुख्यमंत्री मुकेश अग्निहोत्री, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री डॉ. (कर्नल) धनीराम शांडिल, विधायक हरदीप बावा, कुलदीप राठौर, मुख्यमंत्री के सलाहकार (अधोसंरचना) अनिल कपिल, अतिरिक्त मुख्य सचिव ओंकार चंद शर्मा, एचआरटीसी के प्रबंध निदेशक डॉ. निपुण जिंदल सहित अनेक जनप्रतिनिधि एवं वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित रहे।