
मोहिंद्र प्रताप सिंह राणा
20 जुलाई, सोमवार को भारत की तरुणाई एक शांत, संयमित और संकल्पबद्ध जनसैलाब बनकर जंतर-मंतर से संसद की ओर बढ़ी। प्रशासनिक बैरिकेड, रास्तों की बाधाएँ, लाठीचार्ज और आँसू गैस के गोलों के बीच भी युवाओं के हाथ प्रतिरोध में नहीं, बल्कि लोकतंत्र के सम्मान में जुड़े रहे। उनके कंठ से “भारत माता की जय”, “वंदे मातरम्” और “इंकलाब ज़िंदाबाद” के स्वर निरंतर गूंजते रहे।
यह मार्च किसी सत्ता से टकराने का नहीं, बल्कि लोकतंत्र के सर्वोच्च मंदिर तक अपनी आवाज़ पहुँचाने का प्रयास था। मानो देश का युवा अपने जनप्रतिनिधियों को सत्ता के पद और मद की मीठी तंद्रा से जगाकर यह स्मरण करा रहा हो कि संसद केवल सत्ता का केंद्र नहीं, बल्कि जनता की आकांक्षाओं, पीड़ा और उम्मीदों का सर्वोच्च मंच है।
युवा प्रदर्शनकारियों की चेतना में जनसरोकारों से जुड़े प्रश्नों की तीक्ष्ण कौंध थी लेकिन मुखमंडल पर अद्भुत शांति विराजमान थी। आँखों में कर्मशील संकल्प की उजास थी, वाणी में सहजता, स्वर में अडिग दृढ़ता और प्रत्येक कदम उद्देश्य के प्रति अविचल निष्ठा का परिचायक था। यही कारण रहा कि किसी एक नेता के निर्देशन के बिना भी लाखों युवा आत्मानुशासन की अद्वितीय मिसाल बने रहे। तमाम अवरोधों, बिना किसी उकसावे के पुलिस द्वारा बर्बरतापूर्ण कार्रवाई और प्रदर्शनकारियों की दृष्टि में सत्ता-समर्थक मीडिया के उकसावे के बावजूद उनका ध्येय न विचलित हुआ, न उनका संयम टूटा और न ही उनके संकल्प की दिशा बदली।
स्वतंत्रता के बाद देश ने कुछ बड़े जनआंदोलन देखे हैं। जयप्रकाश नारायण आंदोलन और बाद में रामलीला मैदान से उठा अन्ना हज़ारे का आंदोलन भारतीय लोकतंत्र की दिशा को प्रभावित करने वाले महत्वपूर्ण पड़ाव रहे। इन आंदोलनों ने व्यवस्था परिवर्तन और राजनीतिक विमर्श को नई दिशा दी, किंतु समय के साथ उनके अनेक प्रमुख चेहरे प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से सक्रिय राजनीति का हिस्सा बन गए। इससे इन आंदोलनों की मूल निष्पक्षता और गैर-राजनीतिक स्वरूप को लेकर व्यापक बहस भी खड़ी हुई।
वर्तमान पेपर लीक आंदोलन की प्रवृति फिलहाल इससे कुछ भिन्न दिखाई देती है। अभी तक यह किसी राजनीतिक दल के नेतृत्व या प्रत्यक्ष राजनीतिक एजेंडे से संचालित नहीं, बल्कि युवाओं की स्वस्फूर्त पीड़ा और आक्रोश की अभिव्यक्ति प्रतीत होता है। इसकी परिपक्वता, स्थायित्व और दीर्घकालिक दिशा का आकलन अभी समय से पहले होगा; किंतु इतना स्पष्ट है कि इसकी चिंगारी शिक्षा और भर्ती परीक्षाओं में पनपती अनियमितताओं से भड़की है सत्ता की जवाबदेही तक पहुंच गई है। वाल मन, किशोर-किशोरियों और युवा सभी राजनीतिज्ञों की ओर तीखे, ठोस और प्रजातांत्रिक व्यवस्था से जुड़े सारगर्भित मूल प्रश्न उछाल रहे हैं। कोई अपनी 9वीं क्लास की पुस्तक से प्रजातंत्र की परिभाषा को पढ़कर सत्ता व्यवस्था उसकी जवाबदेही का पाठ पढ़ा रहा है तो एक छह सात वर्ष का बालक अपने जीवन के पहले आंदोलन में शामिल होने का गौरव अनुभूत कर रहा था।
हालाँकि आंदोलन के केंद्र में परीक्षा और पेपर लीक का प्रश्न है, लेकिन जंतर-मंतर पर एकत्रित युवाओं की आवाज़ केवल एक परीक्षा तक सीमित नहीं दिखी। उनके सवाल शासन-प्रशासन की जवाबदेही, व्यवस्था की पारदर्शिता और राजनीतिक तंत्र की संवेदनशीलता तक विस्तृत होते दिखाई दिए। उल्लेखनीय यह भी रहा कि आंदोलनकारी मंच पर राजनीतिक दलों और नेताओं से एक स्पष्ट दूरी बनाए रखने का प्रयास करते नज़र आए, जिससे उनकी प्राथमिकता किसी दल का समर्थन या विरोध नहीं, बल्कि अपने मुद्दों को केंद्र में रखना प्रतीत हुई।
यह आंदोलन अंततः किस दिशा में जाएगा, इसका उत्तर भविष्य देगा; परंतु इसने एक बात निर्विवाद रूप से स्पष्ट कर दी है कि देश का युवा अब केवल आश्वासनों से संतुष्ट नहीं है। वह पारदर्शी व्यवस्था, समान अवसर और जवाबदेह शासन की अपेक्षा रखता है। इसलिए सभी राजनीतिक दलों और नीति-निर्माताओं के लिए यह आवश्यक है कि वे इस पीढ़ी की पीड़ा, उसकी आकांक्षाओं और उसके प्रश्नों को गंभीरता से सुनें। किसी भी लोकतंत्र में युवाओं की आवाज़ केवल विरोध नहीं होती, वह भविष्य की दिशा का संकेत भी होती है।
जहाँ एक ओर युवा प्रदर्शनकारी अपने संयम, अनुशासन और वैचारिक परिपक्वता का परिचय देते दिखाई दिए, वहीं सत्ता पक्ष का रवैया कई प्रसंगों में संवाद के बजाय औपचारिकता और दूरी का आभास कराता है। इसकी एक झलक केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जगत प्रकाश नड्डा की एक्स पोस्ट में भी दिखाई देती है। उन्होंने लिखा, “उनके (प्रदर्शनकारियों) द्वारा लगभग चार बजे मुझे लिखित याचिका दी गई।” यहाँ “याचिका” शब्द का प्रयोग ध्यान आकर्षित करता है। जिस दस्तावेज़ को प्रदर्शनकारी अपनी माँगों का “मांग-पत्र” मानते हैं, उसे “याचिका” कहना कुछ पाठकों को इस आंदोलन की अधिकारपूर्ण माँगों को निवेदन के रूप में प्रस्तुत करने का संकेत प्रतीत हो सकता है। हालाँकि, यह शब्द-प्रयोग मंत्री की भाषाई शैली भी हो सकता है; इसलिए इसकी अंतिम व्याख्या पाठक पर छोड़ना अधिक संतुलित होगा।