
मोहिंद्र प्रताप सिंह राणा
आज के समय में पत्रकारिता की धार को लेकर सबसे अधिक शोर सुनाई देता है। कोई कहता है कि पत्रकार सत्ता से सवाल नहीं पूछ रहे, कोई कहता है कि उनकी लेखनी कुंद हो चुकी है। परंतु प्रश्न यह है कि धार की वास्तविक कसौटी क्या है? क्या सत्ताधीशों पर तीखी टिप्पणियां करना ही धारदार पत्रकारिता है, अथवा समाज और व्यवस्था के भीतर पल रही उन प्रवृत्तियों को उजागर करना भी उतना ही आवश्यक है, जो अव्यवस्था को जन्म देती हैं?
वास्तविकता यह है कि अव्यवस्था किसी एक व्यक्ति, दल, वर्ग या संस्था की रचना नहीं होती। यह उस सामूहिक मानसिकता का परिणाम होती है जिसमें प्रत्येक व्यक्ति नियमों के पालन की अपेक्षा उनके अपवाद का लाभ लेना चाहता है। फुटपाथ पर अतिक्रमण करने वाला नागरिक हो, नियमों को प्रभाव और धन के बल पर मोड़ने वाला कारोबारी हो, आंखें मूंद रिश्वत लेने वाला अधिकारी हो अथवा राजनीतिक संरक्षण प्रदान करने वाला सत्ताधीश—सभी किसी न किसी रूप में उसी अव्यवस्था के भागीदार हैं, जिसकी सार्वजनिक मंचों पर आलोचना करते हैं।

लोकतंत्र की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि यहां दोषी भीड़ में खड़ा होकर दोषी तलाशता है। जनता व्यवस्था की विफलताओं का दोष नेताओं और अधिकारियों पर डालती है, नेता प्रशासनिक तंत्र को कटघरे में खड़ा करते हैं, अधिकारी राजनीतिक हस्तक्षेप का हवाला देते हैं, विपक्ष, सत्ता को कोसता है और सत्ता विपक्ष को। किंतु शायद ही कोई समाज के उस मौन सहयोग की चर्चा करता है, जो हर गलत व्यवस्था को जीवित रखता है।
मतदाता को अक्सर निरीह और असहाय बताकर उसके हिस्से की जिम्मेदारी को हल्का कर दिया जाता है। जबकि लोकतंत्र में वोट केवल अधिकार नहीं, उत्तरदायित्व भी है। जिस समाज का मतदाता जातीय व धार्मिक आग्रहों, तात्कालिक लाभों, भावनात्मक उन्मादों या निजी स्वार्थों के आधार पर निर्णय लेता है, वह अपने निर्णयों के परिणामों से स्वयं को पूर्णतः पृथक नहीं कर सकता। दूसरी ओर संसाधनों और पूंजी के बल पर राजनीति को प्रभावित करने वाला वर्ग भी उतना ही उत्तरदायी है, क्योंकि वह जनादेश को बाजार की वस्तु में बदलने का प्रयास करता है।
यहीं पत्रकारिता की परीक्षा आरंभ होती है। यदि पत्रकार केवल सत्ता की आलोचना करे और समाज के आचरण पर मौन रहे, तो उसकी दृष्टि अधूरी है। यदि वह केवल समाज की कमजोरियों को उजागर करे और सत्ता की जवाबदेही से बच निकले, तो भी उसका दायित्व अधूरा है। पत्रकारिता की धार किसी व्यक्ति विशेष पर नहीं, बल्कि उस पूरे तंत्र पर पड़नी चाहिए जहां वोट विवेक पर भारी पड़ता है, धन जनादेश को प्रभावित करता है, सत्ता संरक्षण देती है और समाज सुविधा के लिए मौन सहमति प्रदान करता है।
सच्चाई यह है कि लोकतंत्र की अव्यवस्था किसी एक अपराधी की कहानी नहीं, बल्कि साझा उत्तरदायित्व का दस्तावेज है। जब मतदाता अपना विवेक गिरवी रख देता है, नेता अपनी मर्यादा, अधिकारी अपना दायित्व, पूंजीपति अपनी सीमाएं और पत्रकार अपनी स्वतंत्रता—तब व्यवस्था नहीं, अव्यवस्था शासन करने लगती है।
ऐसे में पत्रकारिता की धार का अर्थ केवल प्रहार करना नहीं, बल्कि दर्पण बनना है। ऐसा दर्पण, जिसमें सत्ता अपना चेहरा देखे, समाज अपना चरित्र देखे और लोकतंत्र अपनी आत्मा का परीक्षण कर सके। क्योंकि अव्यवस्था का सबसे बड़ा संकट यह नहीं कि वह फैलती है, बल्कि यह है कि उसके लाभार्थी स्वयं को उसका पीड़ित घोषित कर देते हैं।