एआई जेनरेटेड चित्र

मोहिंद्र प्रताप सिंह राणा/ ग्राम परिवेश 

31 मई की देर रात अंतिम परिणामों की घोषणा के साथ हिमाचल प्रदेश में त्रिस्तरीय पंचायती राज संस्थाओं एवं स्थानीय निकायों के चुनावों का बहुप्रतीक्षित लोकतांत्रिक महायज्ञ संपन्न हो गया। प्रदेश के दुर्गम पर्वतीय अंचलों से लेकर मैदानी क्षेत्रों तक मतदाताओं ने जिस उत्साह, जागरूकता और सहभागिता का परिचय दिया, उसने एक बार फिर सिद्ध कर दिया कि लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति सत्ता के शिखरों में नहीं, बल्कि गांवों और स्थानीय समुदायों की चौपालों में निहित है। चुनाव परिणामों ने जहां अनेक नए नेतृत्व को जन्म दिया, वहीं स्थानीय स्वशासन की उस परंपरा को भी सुदृढ़ किया है, जो भारतीय लोकतंत्र की आधारशिला मानी जाती है। वस्तुतः यह चुनाव केवल प्रतिनिधियों के चयन की प्रक्रिया नहीं था, बल्कि जनभागीदारी, सामाजिक प्रतिनिधित्व और लोकतांत्रिक मूल्यों की पुनर्पुष्टि का एक व्यापक अभियान था।

पंचायत चुनाव के रोस्टर की घोषणा होते ही प्रदेश के हर चौंक-चौराहे, चूल्हे-चौंके, हाट-दुकान—यहां तक कि मिट्टी का हर कण राजनीतिक ऊर्जा से संचारित हो उठा है। मानो प्रजातंत्र के इस पर्व का शुभारंभ हो गया हो—और हो भी क्यों न? वास्तव में पंचायत ही तो प्रजातंत्र और प्रतिनिधित्व की नींव है। यदि यह नींव मजबूत है, तो दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र एक प्रकाश-पुंज बनकर समूचे विश्व को आलोकित करता रहेगा।

चुनावी परिदृश्य की व्यापकता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि प्रदेशभर में 21,678 मतदान केंद्र स्थापित किए गए। दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों के बावजूद लोकतंत्र की पहुँच सुनिश्चित करने के लिए किन्नौर की सोना पंचायत से लेकर लाहौल-स्पीति के काजा ब्लॉक के कॉमिक (4587 मीटर ऊंचाई) तक मतदान केंद्र स्थापित किए गए—जो इस प्रक्रिया को केवल चुनाव नहीं, बल्कि लोकतंत्र के प्रति राज्य की प्रतिबद्धता का प्रतीक बनाते हैं।

इस बार पंचायत चुनावों में कुल 31,182 पदों पर प्रतिनिधियों का चयन के लिए 37,293 पुरुष यानि 53.22% और 32,786 महिलाओं ने अर्थात 46.8% ने ने चुनाव लड़ा जिनमें 3754 प्रधान, इतने ही उपप्रधान, 21,654 वार्ड सदस्य, 1769 पंचायत समिति सदस्य और 251 जिला परिषद सदस्य शामिल हैं। इनमें से 15,656 पद महिलाओं चुनी गई है, जो स्थानीय शासन में महिला सशक्तिकरण की सुदृढ़ होती भूमिका को दर्शाते हैं।

त्रिस्तरीय पंचायती राज एवं स्थानीय निकाय चुनावों की सबसे उल्लेखनीय विशेषता यह रही कि पूरी चुनावी प्रक्रिया लोकतंत्र के उस मानवीय और सामाजिक पक्ष को उजागर करती दिखाई दी, जो आज की कटु राजनीतिक प्रतिस्पर्धा में विरल होता जा रहा है। अनेक स्थानों पर एक ही परिवार के सदस्य—दादा-पोता, पति-पत्नी, देवर-भाभी, जेठानी-देवरानी—एक-दूसरे के विरुद्ध चुनावी मैदान में डटे रहे, किंतु परिणाम घोषित होते ही राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता पारिवारिक संस्कारों के आगे नतमस्तक दिखाई दी। कहीं चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लिया गया तो कहीं विजेता और पराजित उम्मीदवार गले मिलकर एक-दूसरे को बधाई और ढांढस बंधाते नजर आए। समर्थकों ने भी इस परिपक्वता को आत्मसात किया। वस्तुतः यही वह लोकतांत्रिक संस्कृति है जो मतभेदों को मनभेद बनने से रोकती है और लोकतंत्र की प्राणवायु बनकर समाज को जीवंत रखती है।

यद्यपि प्रारंभिक चरण में कांग्रेस और भाजपा दोनों ही दल पर्दे के पीछे से चुनावी शतरंज की चालें चलते रहे, किंतु जैसे-जैसे चुनावी तापमान बढ़ता गया, पर्दे हटते गए और राजनीतिक दल खुलकर रणक्षेत्र में उतर आए। भाजपा ने संगठनात्मक अनुशासन को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए बागियों पर कठोर कार्रवाई की और उन्हें पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाया। इसके विपरीत कांग्रेस इस प्रश्न पर अनिर्णय और शिथिलता की शिकार रही, जिसका राजनीतिक मूल्य उसे चुकाना पड़ा।

चुनाव के प्रथम चरण में कांग्रेस का प्रदर्शन प्रभावशाली रहा। नगर निकायों में उसे उल्लेखनीय बढ़त मिली और एक समय ऐसा प्रतीत होने लगा कि चुनाव लगभग एकतरफा हो चुका है। कांग्रेस कार्यकर्ता बूथ स्तर पर एक-एक मत के लिए संघर्ष करते दिखाई दिए, किंतु विडंबना यह रही कि संगठनात्मक नेतृत्व का अपेक्षित हस्तक्षेप कहीं दिखाई नहीं दिया। न प्रदेश कांग्रेस कमेटी मैदान में सक्रिय दिखी और न ही चुनावी प्रबंधन के लिए आवश्यक संसाधन और लॉजिस्टिक सहयोग उपलब्ध कराया गया। अधिकांश विधायक अपने-अपने क्षेत्रों में केवल चुनिंदा पसंदीदा उम्मीदवारों तक सीमित रहे। जिन चेहरों को विधायकों का संरक्षण प्राप्त था, वे कई स्थानों पर समर्पित कार्यकर्ताओं की आंख की किरकिरी बने रहे। परिणामस्वरूप दूसरे और तीसरे चरण में कांग्रेस की चुनावी बढ़त बिखरती चली गई और पार्टी को अप्रत्याशित झटके झेलने पड़े।

मंडी नगर निगम चुनाव इसका सबसे बड़ा उदाहरण बनकर सामने आया, जहां 15 में से मात्र एक सीट पर कांग्रेस की जीत राजनीतिक विश्लेषकों को भी चौंकाने वाला परिणाम है। यह परिणाम अपने आप में एक स्वतंत्र और विस्तृत राजनीतिक विश्लेषण की मांग करता है। दूसरी ओर भाजपा ने प्रथम चरण की निराशा से सबक लेते हुए अपनी रणनीति में त्वरित और निर्णायक बदलाव किया। संगठन को पुनः सक्रिय किया गया, कार्यकर्ताओं को बूथ स्तर तक संगठित किया गया, बागियों पर सख्ती बरती गई तथा प्रत्येक वार्ड में वरिष्ठ नेताओं को स्पष्ट जिम्मेदारियां सौंपी गईं। प्रतिदिन समीक्षा और निगरानी की व्यवस्था स्थापित की गई तथा चुनावी अभियान को हर आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराया गया।

नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर ने मंडी नगर निगम चुनाव को व्यक्तिगत प्रतिष्ठा का विषय बनाते हुए “मेरी मंडी, मैं मंडी का” का भावनात्मक संदेश घर-घर पहुंचाया। यह नारा केवल राजनीतिक अभियान नहीं बल्कि स्थानीय अस्मिता के आह्वान में बदल गया और यहीं से चुनावी समीकरण पलटते दिखाई दिए। विधायक अनिल शर्मा भी अपनी पत्नी (पत्नी शायद पहली  बार पति के साथ चुनावी रण उतरीं) परिवार सहित सक्रिय रूप से मैदान में उतरे लेकिन चंपा ठाकुर के जिला परिषद वार्ड तक सीमित रहे  नगर निगम चुनाव में सांकेतिक प्रचार किया।

           इसके विपरीत मंडी जिला परिषद चुनाव में कांग्रेस की जिला अध्यक्ष चंपा ठाकुर द्वारा अपना पारंपरिक वार्ड छोड़कर नया वार्ड चुनना संभवतः उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक भूल सिद्ध हुई। चुनावी राजनीति में भूगोल और सामाजिक समीकरणों की अनदेखी कई बार वर्षों की राजनीतिक पूंजी को क्षीण कर देती है, और इसके दुष्परिणाम भविष्य में भी देखने को मिल सकते हैं।

जिला परिषद चुनावों में भाजपा का प्रदर्शन विशेष रूप से उल्लेखनीय रहा। प्रदेश के 12 में से लगभग 8 जिलों में भाजपा ने बढ़त हासिल कर यह संकेत दे दिया कि संगठनात्मक ऊर्जा और कार्यकर्ता-आधारित राजनीति आज भी चुनावी सफलता का सबसे विश्वसनीय आधार है। यद्यपि अब प्रधान और उपप्रधान पदों को लेकर दोनों दल सक्रिय हैं, किंतु इन पदों का राजनीतिक महत्व सीमित है और इन्हें व्यापक जनादेश का प्रतिबिंब नहीं माना जा सकता।

निस्संदेह नगर निगम और जिला परिषद चुनाव सीधे तौर पर 2027 के विधानसभा चुनावों की धुरी नहीं हैं, किंतु इनके राजनीतिक संकेतों को नज़रअंदाज़ करना भी भूल होगी। भाजपा के लिए ये परिणाम राजनीतिक संजीवनी का कार्य कर सकते हैं, जबकि कांग्रेस के लिए यह स्पष्ट चेतावनी है। कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपनी आंतरिक दरारों को भरने, संगठन को धरातल पर उतारने और उपेक्षित तथा संघर्षशील कार्यकर्ताओं का विश्वास पुनः अर्जित करने की है। कोई भी संगठन केवल विधायकों के सहारे जीवित नहीं रह सकता। विधायक स्वभावतः सत्ता, स्थानीय असंतोष और एंटी-इनकंबेंसी का बोझ भी साथ लेकर चलते हैं, जबकि कार्यकर्ता संगठन की वास्तविक जीवनरेखा होता है। यदि उसकी बात सुनी जाए तो वह ऊर्जा का स्रोत बनता है, और यदि उपेक्षित किया जाए तो वही मौन असंतोष में परिवर्तित हो जाता है।

इन चुनावों का सबसे महत्वपूर्ण संदेश कांग्रेस के लिए यही है कि जहां-जहां वर्तमान विधायक अथवा पूर्व में पराजित कांग्रेस प्रत्याशी स्वयं मैदान में उतारे, वहां उनमें से अधिकांश को मतदाताओं ने स्वीकार नहीं किया। यह केवल हार-जीत का आंकड़ा नहीं, बल्कि मतदाता के बदलते मनोविज्ञान का संकेत है। कांग्रेस यदि इस संदेश को समय रहते पढ़ने और समझने में सफल होती है तो यह चेतावनी भविष्य की शक्ति में बदल सकती है; अन्यथा यही संकेत 2027 की बड़ी राजनीतिक चुनौतियों का पूर्वाभास भी सिद्ध हो सकते हैं। 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *