फोटो इंटरनेट से ली है।

मोहिंद्र प्रताप सिंह राणा/ग्राम परिवेश

29 वर्ष पहले, 1997 में ममता बनर्जी ने जो राजनीतिक ‘सांप-सीढ़ी’ का खेल रचा था, वह केवल एक दल छोड़ने का निर्णय नहीं था—वह सत्ता की शतरंज पर खुद को केंद्र में स्थापित करने का उद्घोष था। अखिल भारतीय कांग्रेस से अलग होकर उन्होंने तृणमूल कांग्रेस की नींव रखी और संघर्ष की सीढ़ियाँ चढ़ते-चढ़ते बंगाल की राजनीति के शिखर तक पहुँचीं। पर विडंबना देखिए—जिस खेल में सीढ़ियाँ उन्हें ऊपर ले गईं, उसी खेल के सांप आज उनके पाँव लपेटते दिखाई दे रहे हैं।

इसी परिप्रेक्ष्य की परतों में वे तथ्य भी दर्ज हैं जिन्हें राजनीति अक्सर सुविधानुसार भुला देती है—कांग्रेस को तोड़कर, मुकुल रॉय के साथ मिलकर बनाई गई तृणमूल कांग्रेस की बुनियाद में उस समय का लक्ष्य केवल वामपंथी दलों—सीपीएम, फॉरवर्ड ब्लॉक और सीपीआई—को चुनौती देना ही नहीं था, बल्कि एक नई राजनीतिक धुरी खड़ी करना भी था। इसी दौर में भारतीय जनता पार्टी के साथ समीकरण बने और 1999 में एनडीए की सरकार में शामिल होकर ममता बनर्जी ने रेल मंत्रालय संभाला। 2001 में ‘ऑपरेशन वेस्ट एंड’ के बाद दूरी बनाई, पर उसी  वर्ष बीबीसी को दिए गए साक्षात्कार में भाजपा को “स्वाभाविक सहयोगी” कहने से परहेज नहीं किया। 2003 में फिर NDA में वापसी हुई—भले ही बिना विभाग के मंत्री रहना पड़ा।

राजनीतिक विरोधाभास यहीं नहीं थमे। 2003 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ  के मुखपत्र  पांचजन्य से जुड़े मंच पर उपस्थिति, और वहाँ तत्कालीन संपादक तरुण विजय द्वारा “बंगाल की दुर्गा” कहकर स्वागत—यह दृश्य उस राजनीति का प्रतीक बन गया जहाँ वैचारिक सीमाएँ अवसर के आगे धुंधली हो जाती हैं। राज्यसभा में बलबीर पुंज  द्वारा “साक्षात दुर्गा” कहे जाने से लेकर संघ के कुछ वर्गों द्वारा उनके संघर्ष की सराहना—यह सब उस विडंबना को रेखांकित करता है जिसमें विरोध और प्रशंसा एक ही वृत्त में घूमते रहते हैं। स्वयं ममता बनर्जी द्वारा संघ प्रमुख मोहन भागवतसहित कुछ नेताओं के प्रति सकारात्मक टिप्पणियाँ और 2012 में ‘पांचजन्य’ द्वारा उनकी सादगी की प्रशंसा—यह सब उस बहुस्तरीय राजनीतिक संवाद का हिस्सा रहा, जिसे एकरेखीय दृष्टि से नहीं पढ़ा जा सकता, लेकिन अनदेखा भी नहीं किया जा सकता।

2019 में  सिटिजन अमेंडमेंट एक्ट, 2019 और  एनआरसी के खिलाफ सड़कों पर मुखर विरोध और उसी समय संसद में मतदान के दौरान तृणमूल के सांसदों की अनुपस्थिति—यह विरोध और परिणाम के बीच की दूरी को उजागर करता है। 2022 में उपराष्ट्रपति चुनाव के दौरान विपक्षी उम्मीदवार का साथ न देना और मतदान से दूरी—यह वही क्षण थे जहाँ विपक्षी एकता के दावे व्यवहार की कसौटी पर हल्के पड़ते दिखे।

2024 से पहले इंडिया एलाइंस के गठन के समय  नीतीश कुमार को संयोजक बनाए जाने पर उभरी असहजता ने गठबंधन की आंतरिक दरारों को सार्वजनिक कर दिया। आगे चलकर अलग राह चुनने के निर्णय ने यह संदेश और स्पष्ट किया कि सामूहिक राजनीति से अधिक प्राथमिकता स्वायत्त नियंत्रण को दी जा रही है।

आज की प्रेस वार्ता में उनकी राजनीति का वही पुराना रूपक जीवंत हो उठा—एक ऐसी सीढ़ी, जो स्थिर नहीं, बल्कि सहारे तलाशती हुई भटक रही थी। कभी वह सीढ़ी कांग्रेस की दीवार पर टिकती दिखी, तो कभी इंडिया एलाइंस की पीठ पर अपना संतुलन साधती नजर आई। यह दृश्य केवल बयानबाज़ी नहीं था, बल्कि उस अस्थिरता का प्रतीक था जहाँ विचारधारा नहीं, बल्कि अवसर दिशा तय करता है।

राजनीति का कठोर और निर्विवाद सत्य यही है कि यहाँ भरोसा कोई स्थायी मुद्रा नहीं—यहाँ यदि कुछ स्थायी है तो वह केवल “कुर्सी” है। और उसी कुर्सी तक पहुँचने के लिए ममता बनर्जी ने अपने राजनीतिक सफर की शुरुआत टूटन से की, संघर्ष से की, और साथ ही ऐसे साथियों को चुना जिन्होंने रास्ते को धार दी। मुकुल रॉय के रूप में उनका राजनीतिक सारथी उभरा, और इसी दौर में भाजपा ने ममता की अंगुली पकड़ कर बंगाल की जमीन पर अपने पाँव जमाने शुरू किए।

लेकिन राजनीति के इस खेल में सबसे बड़ा व्यंग्य यही है कि जो शक्तियाँ कभी रास्ता बनाती हैं, वही एक दिन रास्ता रोकने का कारण भी बनती हैं।“यह मानने में कोई संकोच नहीं कि ममता बनर्जी एक जुझारू राजनीतिक योद्धा रही हैं; पर विडंबना यह है कि जिन ‘साम, दाम, दंड, भेद’ के सहारे सत्ता की बाज़ी साधी गई, उन्हीं औज़ार जब करवट ली तो खिलाड़ी नहीं, पूरा खेल ही निगल गए हैं।” और बदलते समीकरण ही समय के साथ चुनौती बनकर सामने खड़े हो गए। 

और ठीक इसी घटनाक्रम का हालिया अध्याय शीतकालीन सत्र की उस बहस में जुड़ता है, जहाँ राहुल गांधी  ने चुनाव आयोग की निष्पक्षता, मतदाता सूची में कथित गड़बड़ियों और चयन प्रक्रिया से चीफ जस्टिस ऑफ़ इंडिया को हटाए जाने जैसे सवालों को राष्ट्रीय बहस का केंद्र बनाने की कोशिश की। I

लेकिन यहीं “सांप-सीढ़ी” का खेल फिर सामने आया।  ममता बनर्जी और अखिलेश यादव ने इस टकराव को निर्णायक रूप देने से दूरी बनाई। टीएमसी ने संसद में अपनी प्राथमिकताएँ अलग रखीं—कांग्रेस नेतृत्व के आग्रह के बावजूद न तो पूर्ण बहिष्कार की रणनीति में शामिल हुई, न ही उस आक्रामक एकजुटता का हिस्सा बनी, जिसकी उस समय अपेक्षा की जा रही थी।

परिणाम—इंडिया अलाइंस एक स्वर में नहीं बोल सका। बिखरी हुई विपक्षी आवाज़ ने सत्ता पक्ष को अवसर दिया और बहस का रुख अन्य प्रतीकात्मक मुद्दों की ओर मोड़ दिया गया।

यहीं से वह विडंबना जन्म लेती है, जो आज राजनीतिक विश्लेषण का सबसे तीखा बिंदु बन चुकी है—जिस संस्थागत सवाल को उस समय निर्णायक रूप से उठाया जा सकता था, वही बाद में परिणामों के रूप में लौटकर सामने खड़ा हो गया।

आलोचकों का तर्क है कि उस समय की रणनीतिक दूरी, आज की राजनीतिक असहजता में बदल गई—और “सांप-सीढ़ी” का वही खेल, जो कभी चढ़ाई का साधन था, अब जोखिम भरे मोड़ में बदलता दिखाई देता है। सबसे बड़ा जोखिम इस बात कि टीएमसी का अस्तित्व बचेगा या फिर बीजेडी, जदयू, बीएसपी, टीआरएस, वाईआरएफ, पीडीपी, अकाली दल, आप की तरह  इतिश्री को प्राप्त होगा। टीएमसी ने अभी चुनाव की हार देखी आगे सांसद और विधायकों का हरण देखेगी।

आज स्थिति यह है कि सीढ़ी अब भी हाथ में है, पर ज़मीन खिसकती महसूस हो रही है। सवाल यह नहीं कि सांप ने डसा या नहीं—सवाल यह है कि क्या इस खेल में कभी कोई स्थायी सीढ़ी होती भी है, या हर सीढ़ी अंततः किसी नए सांप की ओर ही ले जाती है। 

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