
चित्र एआई की मदद से बनाया है।
मोहिंद्र प्रताप सिंह राणा/ ग्राम परिवेश
- हिमाचल प्रदेश में पूर्व भाजपा सरकार द्वारा शुरू की गई हिम केयर योजना, जिसे कभी मध्यम वर्गीय परिवारों के लिए राहत और सुरक्षा की ढाल माना गया था, आज गंभीर अनियमितताओं और घोटालों के दलदल में धंसती नजर आ रही है। जांच की परतें जैसे-जैसे खुल रही हैं, वैसे-वैसे इस योजना के क्रियान्वयन में छिपी अव्यवस्थाओं, फर्जीवाड़े और संगठित आर्थिक दुरुपयोग की तस्वीर और भयावह होती जा रही है। जिन अस्पतालों पर जनसेवा का दायित्व था, वहीं अब सवालों के घेरे में खड़े हैं—और हर नई जांच यह संकेत दे रही है कि यह केवल चूक नहीं, बल्कि एक सुनियोजित खेल का हिस्सा हो सकता है, जिसमें सरकारी खजाने के साथ-साथ आम नागरिकों के भरोसे को भी गहरी चोट पहुंची है।
स्वास्थ्य विभाग द्वारा मामला सतर्कता जांच को सौंपे जाने के बाद जो तथ्य सामने आए हैं, वे इस पूरे तंत्र की जड़ों तक फैले भ्रष्टाचार की ओर इशारा करते हैं। जांच में पाया गया कि कई अस्पतालों ने ऐसे “मरीज” पोर्टल पर दर्ज कर दिए, जो सत्यापन के समय अस्पतालों में मौजूद ही नहीं थे—यानी इलाज हुआ ही नहीं, लेकिन बिल पूरे उठाए गए। यह सिर्फ लापरवाही नहीं, बल्कि सरकारी धन पर सीधा डाका है।
मामला यहीं नहीं थमता। पोर्टल पर दर्ज जानकारी और अस्पतालों के वास्तविक रिकॉर्ड में चौंकाने वाली विसंगतियां सामने आई हैं। कागजों में एक कहानी, जमीन पर दूसरी—यह अंतर साफ बताता है कि डेटा से लेकर बिलिंग तक हर स्तर पर हेरफेर की गुंजाइश को खुलेआम भुनाया गया।

कुछ अस्पतालों ने तो हद ही पार कर दी—वे उन बीमारियों और पैकेजों के लिए भी दावे ठोकते पाए गए, जिनके लिए उन्हें अधिकृत ही नहीं किया गया था। यानी नियमों को न केवल नजरअंदाज किया गया, बल्कि उन्हें अपने फायदे के लिए मोड़ दिया गया।
सबसे चिंताजनक पहलू “अपकोडिंग” का सामने आया, जहां मामूली प्रक्रियाओं को बड़ी सर्जरी का रूप देकर मोटे बिल वसूले गए। यह सीधा-सीधा सरकारी खजाने पर हमला है, जिसमें इलाज से ज्यादा कमाई को प्राथमिकता दी गई।
चिकित्सकीय रिकॉर्ड की विश्वसनीयता भी संदेह के घेरे में है। जांच में सामने आया कि कई मामलों में क्लिनिकल नोट्स इलाज से पहले ही लिख दिए गए थे—मानो मरीज नहीं, बल्कि फाइलों का इलाज हो रहा हो। यह न केवल मेडिकल एथिक्स का उल्लंघन है, बल्कि पूरे सिस्टम की विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा करता है।
विडंबना यह है कि कैशलेस योजना होने के बावजूद मरीजों से सीधे पैसे वसूले गए। टेलीफोनिक पुष्टि के नाम पर लाभार्थियों की जेबें ढीली करवाई गईं, जो योजना की मूल भावना के साथ खुला विश्वासघात है।
धोखाधड़ी का दायरा इतना विस्तृत है कि गैर-सूचीबद्ध अस्पतालों में इलाज करवा कर दावे किसी और सूचीबद्ध अस्पताल के नाम पर प्रस्तुत किए गए। यह प्रतिरूपण का ऐसा जाल है, जो पूरे नेटवर्क की मिलीभगत की ओर इशारा करता है।
फर्जीवाड़े को छुपाने के लिए एक ही फोटो को कई मरीजों के दस्तावेजों में इस्तेमाल किया गया—यह तथाकथित “कागजी मरीजों” की पोल खोलने के लिए पर्याप्त है।
डिस्चार्ज प्रक्रिया भी महज औपचारिकता बनकर रह गई। पोर्टल पर मरीजों को डिस्चार्ज दिखाया गया, लेकिन वास्तविक दस्तावेजों का कोई अस्तित्व नहीं—यह संकेत देता है कि कई मामलों में इलाज हुआ ही नहीं, केवल कागजों पर पूरा किया गया।
एक ही मरीज के नाम पर कई पैकेज जोड़कर अतिरिक्त भुगतान लेना, यानी “क्लबिंग”, भी बड़े पैमाने पर सामने आया है। यह नियमों की खुली अवहेलना है, जहां अधिकतम लाभ लेने के लिए हर संभव रास्ता अपनाया गया।
जांच से बचने के लिए “अनिर्दिष्ट” श्रेणी का दुरुपयोग किया गया, ताकि मामलों को अस्पष्ट रखकर उच्च दरों का लाभ लिया जा सके। यह एक सुनियोजित रणनीति का हिस्सा प्रतीत होता है।
सबसे बुनियादी नियम—प्री-ऑथराइजेशन—को भी दरकिनार किया गया। बिना अनुमति इलाज कर बाद में दावे ठोकना यह दर्शाता है कि प्रणाली को जानबूझकर कमजोर कड़ी समझकर उसका शोषण किया गया।
इन सभी तथ्यों को एक साथ देखें तो तस्वीर बेहद स्पष्ट और चिंताजनक बनती है—हिम केयर योजना के नाम पर कुछ निजी अस्पतालों ने न केवल व्यवस्थित वित्तीय अनियमितताएं कीं, बल्कि एक सुनियोजित धोखाधड़ी का तंत्र खड़ा कर दिया। इसका सीधा नुकसान सरकारी खजाने को हुआ और सबसे बड़ी चोट उन वास्तविक लाभार्थियों को लगी, जिनके लिए यह योजना बनाई गई थी।
अब सवाल सिर्फ अनियमितताओं का नहीं, बल्कि जवाबदेही का है—क्या इस लूट तंत्र पर लगाम कसी जाएगी, या फिर यह भी एक और फाइल बनकर सरकारी अलमारियों में दब जाएगा?