चित्र एआई द्वारा तैयार किया गया है अतः प्रतीकात्मक है।

मोहिंद्र प्रताप सिंह राणा/ ग्राम परिवेश 

शिमला जिला के कुमारसैन थाना में दर्ज एक शिकायत से उपजा ईको-टूरिज्म वसूली विवाद अब ऐसे निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया है, जहां तथ्य और निष्कर्ष आमने-सामने खड़े दिखाई देते हैं। एक ओर शिकायतकर्ता ने वन विभाग के अधिकारियों पर ईको-टूरिज्म के नाम पर अवैध धन-संग्रह, दबाव और धमकियों जैसे गंभीर आरोप लगाए, तो दूसरी ओर विभागीय जांच ने इन्हीं आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए पूरी प्रक्रिया को “विधिसम्मत प्रशासनिक कार्रवाई” करार दे दिया। हालांकि मामला यहीं थमता नहीं दिख रहा—प्रकरण जब राजस्व मंत्री के संज्ञान में पहुंचा, तो उन्होंने पूरे घटनाक्रम की निष्पक्षता पर उठे सवालों को देखते हुए किसी स्वतंत्र अधिकारी से पुनः जांच के आदेश दे दिए हैं। यह कदम इसलिए भी अहम माना जा रहा है क्योंकि यदि आगामी जांच में शिकायतकर्ता के आरोपों के अनुरूप अनियमितताएं पाई जाती हैं, तो यह संकेत होगा कि ईको-टूरिज्म के नाम पर हर वर्ष सरकार को करोड़ों रुपये का संभावित नुकसान पहुंचाया जा रहा है।

शिकायत के अनुसार, 31 मार्च को रामपुर के कंजरवेटर फॉरेस्ट को भेजी गई लिखित सूचना में स्पष्ट तौर पर कहा गया कि ‘इको-डेवलपमेंट कमेटी कंड्याली-एकांतबाड़ी’ और ‘ईको-टूरिज्म मैनेजमेंट सोसाइटी, रामपुर’ के नाम पर राशि वसूली जा रही है। लेकिन यहीं से पूरे प्रकरण की विश्वसनीयता पर पहला बड़ा प्रश्नचिह्न उभरता है—संबंधित कंजरवेटर ने व्हाट्सएप पर ऐसी किसी समिति या सोसाइटी के अस्तित्व से ही इनकार कर दिया। यानी जिन संस्थाओं के नाम पर वसूली का आरोप है, उनके अस्तित्व को ही आधिकारिक स्तर पर नकार दिया गया, जिससे मामला और अधिक उलझा और संदिग्ध बन गया।

शिकायतकर्ता का आरोप है कि इस मुद्दे को उठाने के बाद उन पर शिकायत वापस लेने का दबाव बनाया गया और झूठे मामलों में फंसाने तक की धमकियां दी गईं। मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस ने प्रारंभिक स्तर पर इसे केवल सामान्य शिकायत नहीं माना, बल्कि इसमें भ्रष्टाचार और पद के दुरुपयोग की आशंका को देखते हुए इसे सतर्कता एवं भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो को भेजने की संस्तुति भी की।

हालांकि, विभागीय जांच रिपोर्ट ने इस पूरे घटनाक्रम को एक अलग ही परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत किया है। रिपोर्ट के अनुसार, कोटगढ़ वन क्षेत्र में ईको-टूरिज्म गतिविधियों के तहत जो भी राशि एकत्रित की गई, उसका पूरा लेखा-जोखा विधिवत अभिलेखों में दर्ज है और उसे निर्धारित खातों में जमा किया गया। जांच में न तो किसी प्रकार की हेराफेरी के प्रमाण मिले और न ही निजी लाभ का कोई संकेत।

रिपोर्ट यह भी दावा करती है कि यह पूरी प्रक्रिया उच्च न्यायालय की भावना के अनुरूप थी, जिसके तहत वन क्षेत्रों में ईको-टूरिज्म को नियंत्रित, संगठित और स्थानीय सहभागिता के साथ संचालित करने पर जोर दिया गया था। इसी क्रम में इको-डेवलपमेंट कमेटियों का गठन और न्यूनतम उपयोग शुल्क तय किया गया। तीन वित्तीय वर्षों के दौरान ₹11.51 लाख से अधिक की राशि एकत्रित कर उसे पारदर्शी ढंग से विभागीय खातों में जमा करने का दावा भी किया गया है।

जांच में एक तकनीकी त्रुटि अवश्य स्वीकार की गई—कुछ स्थानों पर रसीद पुस्तिकाओं में नामों का भ्रम रहा, जहां “सर्कल लेवल इको-टूरिज्म सोसाइटी” के बजाय “ईडीसी कंड्याली” के नाम का उपयोग किया गया। लेकिन इसे केवल प्रशासनिक चूक मानते हुए किसी भी प्रकार की अवैधता से साफ इनकार किया गया है।

यहीं पर यह मामला अपने सबसे संवेदनशील और गूढ़ मोड़ पर पहुंचता है। जिस तंत्र और अधिकारियों पर शिकायतकर्ता ने अनियमितताओं का संदेह जताया, उसी तंत्र के भीतर जांच हुई और उसी ने आरोपों को निराधार घोषित कर दिया। ऐसे में यह सवाल अनायास ही उभरता है कि क्या यह निष्पक्ष जांच थी या फिर व्यवस्था का स्वयं को निर्दोष साबित करने का एक औपचारिक उपक्रम?

एक ओर शिकायत में दर्ज आरोप, कंजरवेटर द्वारा संस्थाओं के अस्तित्व से इनकार, और कथित दबाव की बातें हैं; दूसरी ओर विभागीय जांच का ठोस दावा है कि सब कुछ नियमों और प्रक्रियाओं के तहत हुआ। इन दो विरोधाभासी धारणाओं के बीच सच्चाई कहीं दबती हुई नजर आती है।

यह प्रकरण अब केवल वसूली के वैध या अवैध होने का नहीं रह गया, बल्कि जांच की पारदर्शिता, जवाबदेही और विश्वसनीयता की कसौटी बन चुका है। यदि जांच सही है तो शिकायतकर्ता की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगते हैं, लेकिन यदि शिकायत में सच्चाई है, तो यह पूरा घटनाक्रम उस तंत्र की तस्वीर पेश करता है जहां आरोपों की जांच भी उसी दायरे में सिमट जाती है, जिस पर आरोप लगे हों।

अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या इस मामले में कोई स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच सामने आएगी, या फिर यह विवाद भी फाइलों में ‘क्लीन चिट’ के साथ दफन हो जाएगा। 

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