किण्वन फार्मा उद्योग के खिलाफ प्रदर्शन करते स्थानीय लोगों।

मोहिंद्र प्रताप सिंह राणा/ग्राम परिवेश 

खबर के कुछ तथ्य ‘डान टू द अर्थ ” की रिपोर्ट पर आधारित है हैं। आभार 

बद्दी–नालागढ़ औद्योगिक पट्टी, जिसे  विकास की धुरी और रोजगार का स्रोत कहा जाता है, आज एक मूक त्रासदी का पर्याय बनती जा रही है। हिमाचल प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की कथित ढिलाई और नियामकीय उदासीनता ने इस क्षेत्र को ऐसे पर्यावरणीय संकट में धकेल दिया है, जहाँ हवा में घुलता ज़हर सांसों पर बोझ बन चुका है, जल स्रोत जीवनदायिनी नहीं बल्कि रोगवाहक बनते जा रहे हैं, और धरती का गर्भ रासायनिक अपशिष्ट से कराह रहा है। खेतों की उर्वरता मुरझा रही है, चारागाहों की हरियाली पशुओं के लिए विषाक्त हो चुकी है, और भू-जल—जो कभी जीवन का आधार था—अब फार्मा उद्योगों के अपशिष्ट का वाहक बनकर जनस्वास्थ्य पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा कर रहा है। विकास और विनाश के इस द्वंद्व में स्थानीय समुदाय अपनी ही धरती पर विस्थापन जैसी पीड़ा झेलने को विवश है।

इसी पृष्ठभूमि में 23 मार्च 2026 को नालागढ़ में उभरता जनाक्रोश इस संकट की तीव्रता को उजागर करता है, जहाँ लगभग एक हजार लोगों ने एकजुट होकर कथित औद्योगिक प्रदूषण के खिलाफ सड़कों पर उतरकर विरोध प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों—जिनमें 10 से 15 गांवों की बड़ी संख्या में महिलाएं शामिल थीं—ने Kinvan Pvt Ltd पर जल, वायु और ध्वनि प्रदूषण फैलाने के गंभीर आरोप लगाए और संयंत्र को बंद करने की मांग की।

ग्रामीणों का आरोप है कि संयंत्र से निकलने वाला अपशिष्ट जल भू-जल में समाकर उसे विषाक्त बना रहा है, जबकि हवा में फैली तीखी दुर्गंध ने जीवन को दूभर कर दिया है। स्थानीय संगठनों—केनवान संघर्ष समिति, हुंडूर पर्यावरण मित्र संस्था और हिम परिवेश संस्था—के नेतृत्व में आयोजित इस आंदोलन ने यह स्पष्ट संकेत दिया है कि अब सहनशीलता की सीमा समाप्त हो चुकी है।

गौरतलब है कि यह अत्याधुनिक API (Active Pharmaceutical Ingredients) इकाई, जिसका उद्घाटन वर्ष 2024 में नरेंद्र मोदी द्वारा प्लासदा गांव में किया गया था, देश की अपनी तरह की पहली परियोजना मानी गई थी। परंतु स्थानीय लोगों के लिए यह “विकास” अब अभिशाप का रूप लेता दिख रहा है।

केनवान संघर्ष समिति के सचिव नरेश घई के अनुसार, संयंत्र से उठने वाली दुर्गंध 4 से 5 किलोमीटर के दायरे में फैलती है, जिससे लोगों को घरों के दरवाजे-खिड़कियाँ बंद रखने को मजबूर होना पड़ता है। उन्होंने एक पूर्व घटना का भी उल्लेख किया, जिसमें कथित रूप से बिना उपचारित अपशिष्ट ले जा रहे टैंकर को पकड़ा गया था, जिस पर 22 लाख रुपये का जुर्माना और पुलिस मामला दर्ज हुआ था। पास की नदी में कई दिनों तक मछलियों के मृत पाए जाने की घटनाएं भी पर्यावरणीय क्षति की गंभीरता को दर्शाती हैं।

गुमान सिंह ने रैली को संबोधित करते हुए आरोप लगाया कि केंद्र सरकार द्वारा इस परियोजना को वित्तीय सहयोग तो दिया गया, पर पर्यावरणीय सुरक्षा उपायों को कमजोर कर दिया गया, जिसका खामियाजा अब स्थानीय समुदाय भुगत रहा है।

प्रदर्शनकारियों ने अपने ज्ञापन में जल दोहन को लेकर भी गंभीर चिंताएं जताईं। उनके अनुसार, संयंत्र को प्रतिदिन 6.71 किलोलीटर जल उपयोग की अनुमति है, परंतु संचालन के स्तर को देखते हुए इस सीमा के उल्लंघन की आशंका व्यक्त की गई। साथ ही, यह इकाई ऐसे नदी तंत्र के निकट स्थित है, जो नालागढ़ और आसपास के क्षेत्रों—रड़ियाली, राख राम सिंह, न्यू नालागढ़, किरपालपुर, निक्कूवाल और राजपुरा—की कम से कम 16 पेयजल और सिंचाई योजनाओं को जीवन देता है।

स्थानीय निवासियों का कहना है कि संयंत्र शुरू होने के बाद भू-जल स्तर में गिरावट दर्ज की गई है, जिससे हैंडपंप और कुएं सूखने की कगार पर हैं। उन्होंने जल उपयोग का स्वतंत्र ऑडिट कराने और जल शक्ति विभाग द्वारा क्षेत्रीय जल प्रबंधन की व्यापक समीक्षा की मांग की है।

जनता ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि समय रहते प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई, तो यह आंदोलन और व्यापक तथा उग्र रूप ले सकता है—जो न केवल पर्यावरणीय न्याय की मांग है, बल्कि अस्तित्व की लड़ाई भी बन चुका है।

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