केंद्रीय बजट 2026–27 की समग्र संरचना यह संकेत देती है कि सरकार की आर्थिक दृष्टि एक बार फिर कॉरपोरेट हितों, इंफ्रास्ट्रक्चर विस्तार और शहरी विकास के इर्द-गिर्द सिमटी हुई है। यह बजट ग्रामीण भारत, कृषि, शिक्षा, स्वास्थ्य और पर्यावरण जैसे बुनियादी सरोकारों को नीतिगत केंद्र में लाने में विफल रहा है। बजट भाषण में किसानों और ग्रामीण जीवन की वास्तविक चुनौतियों का अभाव इस बात की पुष्टि करता है कि विकास की परिभाषा को संकुचित कर केवल पूंजी-प्रधान क्षेत्रों तक सीमित किया जा रहा है।

पूरे बजट भाषण में “किसान” शब्द का उल्लेख तक नहीं किया गया, जबकि ग्रामीण विकास पर भी कोई ठोस चर्चा देखने को नहीं मिली। खेती को लेकर एग्रोनॉमी और कृषि-वाणिज्य जैसी तकनीकी शब्दावली तो प्रयुक्त हुई, किंतु खेती की बढ़ती लागत, किसानों की आय, कर्ज़ का बोझ और बाज़ार की असमानताओं जैसे जमीनी सवाल पूरी तरह अनुपस्थित रहे। यह दृष्टिकोण बताता है कि कृषि को आजीविका के क्षेत्र के बजाय एक व्यापारिक गतिविधि के रूप में देखा जा रहा है, जिससे किसान स्वयं नीति विमर्श के केंद्र से बाहर हो गया है।

यह बजट केंद्र–राज्य संबंधों के स्तर पर भी नई दरारें पैदा करने की आशंका को जन्म देता है। वित्तीय संसाधनों का बढ़ता केंद्रीकरण, राज्यों पर योजनाओं का सह-वित्तीय बोझ और अनुदानों में कटौती संघीय ढांचे की आत्मा के विपरीत जाती प्रतीत होती है। शिक्षा, स्वास्थ्य और पर्यावरण—जो सामाजिक न्याय और सतत विकास के आधार स्तंभ हैं—उनके लिए बजट में कोई विशेष या दूरगामी प्रावधान नज़र नहीं आता।

बजट में हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और उत्तराखंड के लिए प्रस्तावित तथाकथित “टूरिज़्म ट्रेल” का उल्लेख भी कई सवाल खड़े करता है। यह ट्रेल वास्तव में क्या है, इसका स्वरूप, पैमाना और क्रियान्वयन मॉडल क्या होगा—इन सभी पहलुओं पर स्पष्टता का अभाव है। पर्यावरणीय दृष्टि से संवेदनशील हिमालयी क्षेत्र में पर्यटन के नाम पर बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर, सड़क चौड़ीकरण और भूमि उपयोग परिवर्तन के क्या प्रभाव होंगे, इस पर कोई समग्र अध्ययन या नीति संकेत बजट में परिलक्षित नहीं होता। आशंका यह भी है कि यह पहल पहाड़ी राज्यों की भूमि को पर्यटन और अन्य पूंजी-प्रधान परियोजनाओं के लिए खोलने की दिशा में पहला कदम साबित हो सकती है।

हिमाचल प्रदेश के संदर्भ में यह बजट विशेष रूप से निराशाजनक रहा है। राज्य की वित्तीय संरचना को संतुलन प्रदान करने वाली बजट डिफिसिट ग्रांट (BDG)—जो पिछले लगभग 75 वर्षों से हिमाचल जैसे विशेष परिस्थितियों वाले राज्यों को मिलती रही—16वें वित्त आयोग की सिफारिशों के साथ समाप्त कर दी गई है। इसके परिणामस्वरूप हिमाचल प्रदेश को हर वर्ष लगभग 10,000 करोड़ रुपये के संसाधन घाटे का सामना करना पड़ेगा। यह निर्णय न केवल राज्य की वित्तीय आत्मनिर्भरता को कमजोर करेगा, बल्कि विकास, सामाजिक कल्याण और आपदा प्रबंधन जैसी बुनियादी जिम्मेदारियों पर भी प्रतिकूल असर डालेगा।

समग्र रूप से देखा जाए तो यह बजट जनहित की अपेक्षाओं पर खरा उतरने के बजाय कॉरपोरेट हितों के अनुकूल ढाला हुआ प्रतीत होता है—एक ऐसा बजट, जो विकास की भाषा तो बोलता है, लेकिन उसके सामाजिक और पर्यावरणीय मूल्य चुकाने का भार जनता, किसानों और पहाड़ी राज्यों पर डाल देता है।

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