मोहिंद्र प्रताप सिंह राणा/ग्राम परिवेश 
उप-राष्ट्रपति का चुनाव एनडीए पर बोझिल होता जा रहा है। बीते कुछ दिनों में घटीं तीन घटनाएँ सत्ता के गलियारों में ऐसी गूंज पैदा कर गई हैं, मानो मोदी-शाह की जोड़ी की नब्ज़ थाम ली हो। पहला संकेत तब मिला जब भाजपा अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा ने अचानक एनडीए सांसदों की मीटिंग रद्द कर दी। सवाल उठा कि क्या यह रद्दीकरण महज़ औपचारिकता थी या संकेत था कि सहयोगी दल अब साथ चलने को तैयार नहीं?

दूसरी हलचल ने सबको चौंकाया—जब अमित शाह ने समाजवादी पार्टी के सांसद राजीव राय को फोन कर जन्मदिन की बधाई दी। सियासत में महज़ शिष्टाचार नहीं होता, खासकर तब जब राजीव राय दक्षिण भारत में शिक्षा साम्राज्य के जरिए एक बड़े नेटवर्क पर पकड़ रखते हों। शाह की यह ‘मुलायमियत’ कहीं उपराष्ट्रपति चुनाव से पहले गठजोड़ की मजबूरी तो नहीं?

तीसरी और सबसे दिलचस्प घटना रही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नारा लोकेश को चाय पर बुलाना। लोकेश न केवल आंध्र की राजनीति में चंद्रबाबू नायडू की रणनीति के अहम हिस्सेदार हैं, बल्कि वे जगदीप धनखड़ से चुनाव से ऐन पहले रहस्यमयी भेंट भी कर चुके हैं। क्या उस मुलाकात की गूंज आज भी सत्ता के गलियारों में बेचैनी फैला रही है?

इस बीच एक पुराना पन्ना भी सियासी बेचैनी बढ़ा रहा है—जब नायडू और उनके ससुर एन.टी. रामाराव के बीच पार्टी के चुनाव चिन्ह व बैंक खातों की लड़ाई चल रही थी, तब इंडिया एलाइंस के मौजूदा उपराष्ट्रपति प्रत्याशी बी. सुदर्शन रेड्डी ने चंद्रबाबू नायडू का पक्ष उभारने  में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी । वही सुदर्शन रेड्डी अब विपक्ष की चौसर पर बैठा मोहरा हैं।

इन तीनों घटनाओं ने मिलकर उप-राष्ट्रपति चुनाव की तराजू को असंतुलित कर दिया है। एनडीए की बग्घी दक्षिण भारत व विजयवाड़ा की गलियों में अटकती दिख रही है, जहाँ नायडू की राजनीति और राजीव राय जैसे खिलाड़ियों की पकड़ बेहद मज़बूत है। मोदी-शाह का सियासी गणित अब उसी पुराने एपिसोड की याद दिलाने लगा है, जब कांस्टीट्यूशनल क्लब के चुनाव में आंकड़े पलट गए थे।

आज हालात यह हैं कि सत्ता की बग्घी के पहिए घूम तो रहे हैं, मगर ज़मीन की पकड़ लगातार खिसक रही है। उपराष्ट्रपति की कुर्सी तक पहुँचने की डगर मोदी-शाह को जितनी सीधी और सहज दिख रही थी, असल में उतनी ही ऊबड़-खाबड़ और फिसलन भरी साबित हो रही है। यह बात तय है कि एनडीए का उम्मीदवार अभी हार-जीत की दहलीज़ पर नहीं खड़ा, लेकिन राजनीति का गणित ऐसा है कि बस कुछ वोटों का झटका भी मोदी-शाह की सियासी गाड़ी को पलट सकता है। और जब तराजू की सुई हिलती है, तो सबसे भारी बग्घी भी बेमंज़िल हो जाती है।

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