
मोहिंद्र प्रताप सिंह राणा/ ग्राम परिवेश
शिमला। हिमाचल प्रदेश विधानसभा गुरुवार को उस ऐतिहासिक क्षण की साक्षी बनी जब सदन भावविह्वल होकर प्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री एवं हिमाचल निर्माता डॉ. यशवंत सिंह परमार को नमन कर रहा था। उनके दूरदर्शी नेतृत्व, अद्वितीय ईमानदारी और हिमाचल के निर्माण में अप्रतिम योगदान को स्मरण करते हुए निजी सदस्या कार्यवाही के अंतर्गत नाहन के विधायक अजय सोलंकी ने प्रस्ताव रखा कि डॉ. परमार को भारत रत्न राष्ट्र का सर्वोच्च नागरिक सम्मान, प्रदान किया जाए।
प्रस्ताव में कहा गया—
“यह सदन केंद्र सरकार से अनुशंसा करता है कि हिमाचल प्रदेश के निर्माता एवं प्रथम मुख्यमंत्री स्व. डॉ. यशवंत सिंह परमार जी को देश और प्रदेश की प्रगति हेतु उनके अथक योगदान को देखते हुए भारत रत्न से विभूषित किया जाए।”
सरलता और ईमानदारी की मिसाल
उद्योग, संसदीय कार्य एवं श्रम मंत्री हर्षवर्धन चौहान ने प्रस्ताव का समर्थन करते हुए डॉ. परमार को आधुनिक हिमाचल की नींव रखने वाला दूरदर्शी नेता बताया। उन्होंने स्मरण किया कि परमार ऐसे जननेता थे जो मुख्यमंत्री रहते हुए भी साधारण बस से यात्रा कर सकते थे और परिवार को केवल वेतन पर ही पालन करते थे। उनके पत्रों में बच्चों की माँगें पूरी न कर पाने की सादगी और ईमानदारी झलकती है। चौहान ने तुलना करते हुए कहा—“आज प्रदेश का बजट 58 हज़ार करोड़ है, जबकि परमार के समय में योजना आकार मात्र 52 करोड़ था। फिर भी उन्होंने कृषि, बागवानी और जलविद्युत के माध्यम से यह दृष्टि दी कि हिमाचल की हथेलियों की रेखाएँ तभी भाग्यशाली बनेंगी जब वे सड़कों की लाइनों से जुड़ेंगी।”
पहाड़ का दर्द समझने वाला नेता
राजस्व, बागवानी और जनजातीय विकास मंत्री जे.एस. नेगी ने कहा कि आज हिमाचल की पहचान सड़कों, शिक्षा, कृषि और बागवानी से है, जिसका श्रेय परमार की दूरदृष्टि को जाता है। उन्होंने याद दिलाया कि वे मुख्यमंत्री रहते हुए भी पैदल दूरस्थ जनजातीय क्षेत्रों में जनता से मिलने जाते थे। नेगी ने उनकी शैक्षिक गहराई का भी उल्लेख किया, खासकर हिमाचल की बहुपत्नी प्रथा पर उनके शोध का। साथ ही उन्होंने विपक्ष की अनुपस्थिति को खेदजनक बताया।
हिमाचल गौरव का शिल्पी
शिक्षा मंत्री रोहित ठाकुर ने उन्हें हिमाचल निर्माता और पहाड़ का प्रेरणास्रोत बताया। उन्होंने कहा कि जिस समय हिमाचल बना तब मात्र छह कस्बों में बिजली थी और बजट गिने-चुने करोड़ों में सीमित था। उच्च न्यायालय से लेकर हिमाचल विश्वविद्यालय जैसी संस्थाएँ उनके समय की देन हैं। ठाकुर ने कहा—“परमार ने राजनीति से ऊपर उठकर हिमाचल की अस्मिता और संस्कृति को प्रतिष्ठा दी।”
विचार बन चुके नेता
पूर्व मंत्री सुखराम चौधरी ने कहा कि इतिहास घटनाओं से नहीं, बल्कि महान नेताओं के कार्यों से गढ़ा जाता है। परमार ने न केवल सड़कों और शिक्षा का विस्तार किया बल्कि हिमाचल की अलग पहचान को स्थापित करने का साहस दिखाया। चौधरी ने सुझाव दिया कि उनका जन्मदिन गाँव-गाँव में मनाया जाए और उनके जीवन को बच्चों के पाठ्यक्रम में शामिल किया जाए, क्योंकि आज की पीढ़ी उन्हें पर्याप्त रूप से नहीं जानती।
सामूहिक भावना का स्वर
सदन में गूंजती आवाज़ एक ही थी—डॉ. परमार केवल प्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री ही नहीं, बल्कि उस विचार और संकल्प का प्रतीक हैं, जिसने पहाड़ को पहचान और अस्मिता दी। उन्हें *भारत रत्न* से सम्मानित करना किसी एक नेता को श्रद्धांजलि नहीं, बल्कि हिमाचल की आत्मा को प्रणाम होगा।