सांकेतिक चित्र इंटरनेट से लिया है ।

यह टिप्पणी केवल कानूनी चेतावनी नहीं, बल्कि एक गूंजती हुई घंटी है, जो हिमाचल प्रदेश के नीति-निर्माताओं, प्रशासकों और जनता सभी को यह समझाने के लिए पर्याप्त है कि विकास यदि विनाश की नींव पर टिके, तो उसका भविष्य केवल मलबा और पश्चाताप होता है।

ग्राम परिवेश/मोहिंद्र प्रताप सिंह राणा 

नई दिल्ली :भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने हिमाचल प्रदेश में बिगड़ते पर्यावरणीय असंतुलन पर गहरी चिंता प्रकट करते हुए राज्य सरकार को कठोर शब्दों में चेताया है कि यदि वर्तमान स्थिति में सुधार नहीं हुआ, तो पूरा राज्य “हवा में विलीन” हो सकता है। न्यायालय ने कहा कि हिमाचल की परिस्थितियाँ “बुरे से बदतर” हो गई हैं और जलवायु परिवर्तन का प्रभाव अब स्पष्ट, भयानक और चेतावनी स्वरूप सामने है

राजस्व कमाना सब कुछ नहीं होता, पर्यावरण की कीमत पर नहीं
न्यायमूर्ति जे. बी. पारडीवाला और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने स्पष्ट किया, “हम राज्य सरकार और केंद्र से यह कहना चाहते हैं कि राजस्व कमाना महत्वपूर्ण हो सकता है, लेकिन वह पर्यावरण और पारिस्थितिकी को तिलांजलि देकर नहीं कमाया जा सकता। यदि सब कुछ यूं ही चलता रहा, तो वह दिन दूर नहीं जब हिमाचल प्रदेश का नाम केवल स्मृतियों में रह जाएगा।”

प्राकृतिक आपदा के लिए सिर्फ प्रकृति नहीं, मनुष्य जिम्मेदार
पीठ ने कहा कि केवल प्रकृति को दोष देना उचित नहीं, मनुष्यों की अविवेकपूर्ण गतिविधियाँ—जैसे अंधाधुंध सड़क निर्माण, बहुमंजिला भवन, सुरंगें, चार लेन परियोजनाएं, और अवैज्ञानिक ढंग से लगाए जा रहे जलविद्युत प्रोजेक्ट—पहाड़ों के दरकने, भूमि धंसने और घरों के गिरने जैसे आपदाओं के मुख्य कारण हैं।

प्रकृति रुष्ट है — और उसकी नाराज़गी विनाश में बदल रही है
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि हिमालय की गोद में बसे इस संवेदनशील प्रदेश में विकास परियोजनाओं से पहले भूवैज्ञानिकों, पर्यावरण वैज्ञानिकों और स्थानीय निवासियों की राय लेना अनिवार्य होना चाहिए। यह कहा गया कि राज्य की प्राकृतिक सुंदरता का लाभ उठाकर पर्यटन को बढ़ावा देने की आड़ में अंधाधुंध निर्माण किया गया, जिससे राज्य की जैव विविधता और पारिस्थितिकी खतरे में पड़ गई है।

विकास योजनाओं की रफ्तार और मानव लालच दोनों ने मिलकर आपदा को न्योता दिया
पीठ ने कहा कि हिमाचल प्रदेश की 66% भूमि वनाच्छादित है, लेकिन मनुष्य की बढ़ती लालसा और सरकारी उदासीनता इस प्राकृतिक विरासत को समाप्त करने पर आमादा हैं। बिना पर्यावरणीय योजना के हो रहे निर्माण कार्यों ने जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक आपदाओं की तीव्रता को बढ़ा दिया है।

हिमालयी राज्यों के लिए समन्वित योजना की आवश्यकता
पीठ ने टिप्पणी की कि हिमालयी क्षेत्र की विशेष संवेदनशीलता को ध्यान में रखते हुए सभी संबंधित राज्यों को मिलकर अपने संसाधनों और विशेषज्ञता का समन्वय करना चाहिए ताकि विकास योजनाएं पर्यावरणीय संतुलन को ध्यान में रखकर बनाई जाएं।

अब भी समय है चेतने का
न्यायालय ने कहा कि यद्यपि बहुत कुछ नष्ट हो चुका है, फिर भी “कुछ नहीं से कुछ होना बेहतर है।” सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि इस विषय को एक जनहित याचिका के रूप में दर्ज किया जाए और हिमाचल सरकार से पूछा जाए कि क्या उन्होंने भविष्य के लिए कोई ठोस कार्ययोजना बनाई है और आगे क्या कदम उठाने का प्रस्ताव है।

यह मामला अब आगामी -25 -अगस्त को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया गया है।

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