
राजीव गांधी का छाया चित्र इंटरनेट से ली गई है।
ग्राम परिवेश/मोहिंद्र प्रताप सिंह राणा
शिमला के सुप्रसिद्ध रिज मैदान पर प्रदेश के छह बार मुख्यमंत्री रहे स्वर्गीय वीरभद्र सिंह की प्रतिमा अब स्थापित हो चुकी है। यह मांग लंबे समय से “होली लॉज” और उनके समर्थकों की ओर से उठती रही थी, जिसे हाल ही में मंजूरी मिली है। दौलत सिंह पार्क में स्थापित यह प्रतिमा अब अनावरण की प्रतीक्षा में है।
राजनीतिक गलियारों में यह बात सार्वजनिक हो चुकी है कि वीरभद्र सिंह की प्रतिमा की स्थापना प्रियंका गांधी के हस्तक्षेप के बाद ही संभव हो पाई। यह दावा प्रदेश के उपमुख्यमंत्री मुकेश अग्निहोत्री ने कुछ दिन पूर्व एक मीडिया साक्षात्कार में किया था।
रिज मैदान केवल एक स्थल नहीं, बल्कि देश की स्मृति और सम्मान का प्रतीक स्थल है — जहां राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और भारत की एकता के लिए अपने प्राणों की आहुति देने वाली इंदिरा गांधी की प्रतिमाएं पहले से मौजूद हैं। इस परिसर में किसी नई प्रतिमा का स्थान पाना न केवल उस व्यक्ति के राजनीतिक कद को दर्शाता है, बल्कि उसके ऐतिहासिक योगदान की सार्वजनिक स्वीकृति भी है।
प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री स्व वीरभद्र सिंह इस सम्मान के हकदार को लेकर एक लेख “सियासतदान की प्रतिमा पर सियासत ” ग्राम परिवेश साप्ताहिक में 29 जून से 5 जुलाई 2023 के अंक छपा था और इसे www.gramparivesh.com के archives में जाकर पढ़ा जा सकता है।
परंतु इस सम्मान के साये में एक चुभता प्रश्न फिर से उठ खड़ा हुआ है — *आधुनिक भारत के शिल्पकार* कहे जाने वाले स्वर्गीय राजीव गांधी की स्मृति को यह गौरव क्यों नहीं मिला? क्यों उनकी प्रतिमा को वह स्थान नहीं दिया गया जो उनके योगदान और बलिदान के अनुरूप हो? क्या उनके “डिजिटल इंडिया” और “21वीं सदी के भारत” के स्वप्न को रिज पर जगह नहीं मिली क्योंकि उस समय के सत्ता केंद्र वीरभद्र सिंह व उनके “स्कूल आफ थाट के शिष्यों” की संवेदनाएं मौन थीं और आज भी मौन ही हैं ?
यह विडंबना और भी तीखी हो जाती है जब देखा जाता है कि उसी पार्टी के नेता और उनके पुत्र व पुत्री— राहुल गांधी और प्रियंका गांधी — वीरभद्र सिंह के लिए प्रतिमा के आग्रह में सक्रिय रहते हैं, परंतु राजीव गांधी के प्रति ऐसी कोई पहल नहीं दिखती। क्या यह चयनात्मक श्रद्धांजलि का संकेत है, या फिर बदलते राजनीतिक समीकरणों में स्मृति और सम्मान का मूल्यांकन भी मनोनुकूल होने लगा है?
इन प्रश्नों का उत्तर न केवल अतीत की राजनीति से जुड़ा है, बल्कि भविष्य की स्मृति राजनीति के लिए भी एक गंभीर चिंतन का विषय बन चुका है। रिज मैदान की यह नई प्रतिमा शायद भविष्य में इसी विमर्श की प्रतिध्वनि बनकर खड़ी रहेगी।
