संकट में सराज घाटीबंजार,बालीचौकी व जलोड़ी से सोझा
रिपोर्ट: विशेष संवाददाता, बंजार से
सराज घाटी की स्वच्छता को लेकर जहाँ नागरिक और सामाजिक संगठन एकजुट होकर लगातार जागरूकता फैला रहे हैं, वहीं प्रशासनिक उदासीनता इस प्रयास को कमजोर कर रही है। तीर्थन, जिभी, सैंज और नगर पंचायत बंजार जैसे पर्यटन और पर्यावरण के लिहाज से संवेदनशील क्षेत्रों में ठोस अपशिष्ट प्रबंधन की हालत चिंताजनक होती जा रही है।
बढ़ता पर्यटन और बिगड़ता प्रबंधन
स्थानीय नागरिकों और *हिमालय नीति अभियान* जैसे संगठनों का कहना है कि पर्यटक संख्या में तेजी से वृद्धि और अव्यवस्थित निर्माण कार्यों के चलते हर दिन भारी मात्रा में कचरा उत्पन्न हो रहा है, जिसमें अधिकांश प्लास्टिक जैसे गैर-जैविक कचरे का अंबार है। दुर्भाग्यवश, आज भी न तो कोई केंद्रीकृत अपशिष्ट प्रसंस्करण संयंत्र है और न ही स्थानीय निकायों के पास इसके लिए आवश्यक संसाधन या भूमि।
प्रशासनिक चुप्पी बन रही संकट की वजह
प्रशासन की ओर से अब तक इस दिशा में कोई ठोस पहल नहीं की गई है। यह स्थिति न केवल स्थानीय निवासियों, बल्कि यहां आने वाले पर्यटकों के लिए भी स्वास्थ्य और पर्यावरणीय खतरा पैदा कर रही है। जल स्रोतों का प्रदूषण, मिट्टी की गुणवत्ता में गिरावट और कचरे के खुले ढेर अब आम दृश्य बन गए हैं।

**जनभागीदारी बनी मिसाल**
गांवों में लोग जागरूक हो रहे हैं। खुंदन गांव से शुरू हुआ अभियान अब घाटी भर में जनसमर्थन प्राप्त कर रहा है। नागरिक समाज संगठनों ने न केवल सफाई अभियान चलाए हैं, बल्कि पंचायतों और विद्यालयों में जागरूकता कार्यक्रम भी आयोजित किए हैं। **
इस क्रम में, *सोझा टूरिज्म डेवलपमेंट एसोसिएशन* (STDA) के तत्वावधान में आयोजित *टूरिस्ट गाइड प्रशिक्षण शिविर* के प्रतिभागियों ने पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक सराहनीय पहल की। शिविर में भाग ले रहे 35 प्रतिभागियों ने जलोड़ी से सोझा तक सफाई अभियान चलाकर राहगीरों और पर्यटकों को स्वच्छता का संदेश दिया। अभियान के दौरान रास्ते में बिखरे रैपर, प्लास्टिक की खाली बोतलें और अन्य ठोस कचरा एकत्रित कर लगभग एक गाड़ी भर सामग्री जमा की गई।कचरे को पृथक-पृथक बैग में भरकर *एसोसिएशन* की मदद से निर्धारित स्थान पर उचित निपटान के लिए भेजा गया।

*एसटीडीए के वरिष्ठ सलाहकार पदम सिंह* ने बताया कि एसोसिएशन के वालंटियर्स ने न केवल सफाई कार्य में भाग लिया बल्कि स्थानीय लोगों और पर्यटकों को स्वच्छता के प्रति जागरूक भी किया। उन्होंने सार्वजनिक स्थलों पर कूड़ा न फैलाने की अपील की। इस अभियान को सफल बनाने में एसोसिएशन के पदाधिकारियों के साथ-साथ स्थानीय महिलाओं की भागीदारी भी उल्लेखनीय रही।यह प्रयास इस बात का स्पष्ट संकेत है कि यदि नागरिक संगठनों और जागरूक युवाओं को सही मार्गदर्शन और सहयोग मिले, तो वे पर्यावरण संरक्षण की दिशा में अहम भूमिका निभा सकते हैं।—** बावजूद इसके, बगैर सरकारी सहयोग यह प्रयास अधूरे हैं।**मुख्य मांगें जो आज भी अधूरी हैं***
घाटी के लिए एक केंद्रीकृत अपशिष्ट प्रसंस्करण संयंत्र की स्थापना।* संग्रहण एवं पृथक्करण के लिए प्रशिक्षित संसाधन और वित्तीय सहयोग।* ग्रामीण क्षेत्रों में मनरेगा के माध्यम से घर-घर कचरा संग्रहण की व्यवस्था।* निजी कंपनियों के सहयोग से अपशिष्ट सह-प्रसंस्करण की पुरानी प्रणाली का पुनरुद्धार।* व्यापक जनजागरूकता अभियान की शुरुआत और सार्वजनिक जवाबदेही तय करना।यह स्पष्ट है कि जब नागरिक जागरूक हों, स्वयं आगे आकर सफाई की कमान संभालें और सरकारी तंत्र चुप्पी साधे रहे, तब स्थिति असमानता की ओर जाती है।
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सराज घाटी जैसे संवेदनशील और सुंदर क्षेत्र को अपशिष्ट में बदलने से रोकना अब प्रशासन की जिम्मेदारी है।हिमालय नीति अभियान के संयोजक गुमान सिंह ने यह स्पष्ट किया कि यदि प्रशासन तत्काल प्रभाव से ठोस कार्रवाई नहीं करता, तो आने वाले वर्षों में यह घाटी अपनी प्राकृतिक सुंदरता और पर्यटन की संभावनाएं दोनों ही खो सकती है।“जनता जागरूक है, लेकिन व्यवस्था मौन है – अब समय है कि प्रशासन अपनी नींद से जागे।”