
मोहिंद्र प्रताप सिंह राणा/ ग्राम परिवेश
हिमाचल प्रदेश में हिम केयर योजना जिस मानवीय करुणा और जनसेवा की भावना के साथ शुरू हुई थी, वही समय के साथ कुछ निजी अस्पतालों की बेलगाम मुनाफाखोरी और तंत्र की ढिलाई के कारण एक सुनियोजित लूट के औजार में बदलती चली गई। इलाज, जो कभी सेवा का पर्याय था, अब कई स्थानों पर “पैकेज” और “क्लेम” की ठंडी गणनाओं में कैद हो गया। स्वास्थ्य सेवा का पवित्र दायित्व, लाभ के लालच में इस कदर विकृत हुआ कि मरीज नहीं, बल्कि बिलिंग की रकम प्राथमिकता बन गई।
स्थिति तब और गंभीर हो गई जब यह चौंकाने वाला सच सामने आया कि जिन खर्चों का वहन पहले ही सरकारी खजाने से किया जा चुका था, वही रकम हिम केयर के नाम पर दोबारा क्लेम की जा रही थी। यानी जनता की गाढ़ी कमाई पर दोहरी मार—एक बार टैक्स के रूप में, और दूसरी बार योजनागत दुरुपयोग के रूप में। यह केवल वित्तीय अनियमितता नहीं, बल्कि जनविश्वास के साथ खुला विश्वासघात था।

इसी पृष्ठभूमि में मुख्य मंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू की अध्यक्षता में हुई उच्चस्तरीय बैठक ने इस पूरे खेल पर निर्णायक चोट की। सरकार ने स्पष्ट शब्दों में यह संदेश दिया कि “सहायता” के नाम पर अब किसी भी प्रकार की लूट को संरक्षण नहीं मिलेगा। यह केवल समीक्षा नहीं थी, बल्कि एक ऐसी सर्जिकल स्ट्राइक थी, जिसने वर्षों से जड़ जमा चुकी अनियमितताओं को जड़ से उखाड़ने का संकल्प लिया।
सरकार द्वारा लागू किए गए सुधार महज नियमों का फेरबदल नहीं, बल्कि व्यवस्था को पारदर्शिता और जवाबदेही की नई रीढ़ देने का प्रयास हैं। अब हर क्लेम वास्तविक उपचार लागत या निर्धारित पैकेज दर—जो भी कम हो—उसी आधार पर होगा। हर दावे के साथ वास्तविक बिल प्रस्तुत करना अनिवार्य कर दिया गया है, ताकि कागज़ी खेल और मनमानी बिलिंग की गुंजाइश समाप्त हो सके।
इसके साथ ही पंजीकरण शुल्क, बेड चार्ज, नर्सिंग, डॉक्टर फीस, ऑपरेशन थियेटर और दवाइयों जैसी मदों को क्लेम से बाहर कर दिया गया है—क्योंकि इनका खर्च पहले से ही सरकार वहन कर रही है। यह कदम सीधे-सीधे उस दोहरी वसूली के खेल पर प्रहार है, जिसने योजना की आत्मा को खोखला कर दिया था। अब एक सेवा के लिए दो बार भुगतान का रास्ता पूरी तरह बंद कर दिया गया है।
करीब 4.33 लाख परिवारों से जुड़ी इस योजना में यह सुधार केवल प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि जनहित की पुनर्स्थापना का संकल्प है। यह संदेश साफ है—अब स्वास्थ्य सेवा के नाम पर कोई भी अपारदर्शिता या शोषण बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। हिम केयर अब केवल एक योजना नहीं, बल्कि एक जवाबदेह व्यवस्था की मिसाल बनने की दिशा में अग्रसर है, जहां सेवा का धर्म फिर से अपने वास्तविक अर्थों में स्थापित हो रहा है।