
दिल्ली पुलिस ने शनिवार (18 जुलाई 2026) सुबह लगभग 7:00 बजे जंतर-मंतर पर अनशन कर रहे सोनम वांगचुक को वहां से उठाकर सफदरजंग अस्पताल में भर्ती कराया। उनकी तबीयत लगातार बिगड़ रही थी। हाई कोर्ट के निर्देश पर की गई इस कार्रवाई के दौरान सफेद चादरों की ओट में उन्हें स्ट्रेचर पर लिटाकर एम्बुलेंस तक ले जाया गया। कुछ प्रदर्शनकारियों ने इसका विरोध किया और हल्की धक्कामुक्की भी हुई, लेकिन अंततः उन्हें चिकित्सकीय देखभाल के लिए अस्पताल पहुंचा दिया गया।
मेरी दृष्टि में, उस समय यह कदम आवश्यक था। किसी भी अनशनकारी का जीवन बचाना राज्य का संवैधानिक दायित्व है। हालांकि, यह भी उतना ही सच है कि लोकतंत्र में शांतिपूर्ण विरोध का सम्मान होना चाहिए और असहमति का उत्तर संवाद से दिया जाना चाहिए, दमन से नहीं। किसी भी सरकार की परिपक्वता उसकी आलोचना सुनने और बातचीत करने की क्षमता से तय होती है।
अब सोनम वांगचुक चिकित्सा निगरानी में हैं। अभिजीत दीपके के नेतृत्व में चल रहे इस आंदोलन के लिए वांगचुक सबसे बड़ी नैतिक शक्ति और प्रेरणा थे। ऐसे में आंदोलन की वास्तविक परीक्षा अब शुरू होगी। किसी भी जनआंदोलन की स्थायी ताकत उसके उद्देश्य, जनसमर्थन और संगठन में होती है, केवल एक व्यक्ति में नहीं। लोकतंत्र की असली पहचान संवाद, संवेदनशीलता और जवाबदेही है—डर, दमन और चुप्पी नहीं।