
ज्ञान ठाकुर/मोहिंद्र प्रताप सिंह राणा/ग्राम परिवेश
वित्तीय आंकड़ों के विस्तार में जाने से पहले यह समझ लेना जरूरी है कि अनुपूरक बजट वास्तव में होता क्या है, और आखिर ऐसी कौन-सी परिस्थितियाँ बनीं कि सुक्खू सरकार को इतना बड़ा वित्तीय पुनर्संतुलन प्रस्तुत करना पड़ा।अनुपूरक बजट के मूल अर्थ को समझना हो तो उसे केवल “अतिरिक्त धन की मांग” कह देना उसके गूढ़ार्थ को सीमित कर देना होगा। दरअसल, यह वह वित्तीय दस्तावेज होता है जो तब सामने आता है जब वर्ष के प्रारंभ में बनाए गए बजटीय अनुमान वास्तविकताओं के आगे छोटे पड़ जाते हैं। यानी शासन यह स्वीकार करता है कि परिस्थितियाँ स्थिर नहीं रहीं—कहीं प्राकृतिक आपदाओं ने संसाधनों को निगल लिया, कहीं वेतन-पेंशन और सामाजिक दायित्वों का भार बढ़ गया, तो कहीं विकास योजनाओं की गति बनाए रखने के लिए अतिरिक्त निवेश अनिवार्य हो गया। ऐसे में अनुपूरक बजट उस कमी को भरने का माध्यम बनता है, जो केवल खजाने की नहीं, बल्कि समय और परिस्थितियों की देन होती है।
हिमाचल प्रदेश के संदर्भ में यह अवधारणा और भी अधिक गहरी हो जाती है। यहाँ अनुपूरक बजट केवल लेखा-संशोधन नहीं, बल्कि पहाड़ों की कठिन भौगोलिक सच्चाइयों, सीमित राजस्व आधार और आपदा-जनित अनिश्चितताओं के बीच शासन की जीवंत प्रतिक्रिया है। वर्ष 2025-26 के लिए पारित 40461.95 करोड़ रुपये का अनुपूरक बजट इस दृष्टि से ऐतिहासिक बनता है कि यह अब तक का सबसे बड़ा वित्तीय पुनर्संतुलन है—जहाँ 36374.61 करोड़ रुपये राज्य योजनाओं के लिए और 4087.34 करोड़ रुपये केंद्रीय प्रायोजित योजनाओं के लिए निर्धारित कर यह स्पष्ट किया गया कि सरकार ने केवल व्यय नहीं बढ़ाया, बल्कि प्राथमिकताओं को पुनर्परिभाषित किया है।

सुखविंदर सिंह सुक्खू के नेतृत्व में यह बजट एक साधारण वित्तीय प्रस्ताव से आगे बढ़कर “परिस्थितिजन्य प्रबंधन” का उदाहरण बनकर उभरता है। सीमित संसाधनों, प्राकृतिक आपदाओं के लगातार दबाव और केंद्र से अपेक्षित सहयोग में आई ठंडक के बीच जिस प्रकार राज्य ने 4000 करोड़ से अधिक की केंद्रीय प्रायोजित योजनाओं की राशि को अपने वित्तीय ढांचे में समाहित किया, वह केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक संतुलित रणनीति का परिणाम है। एनडीआरएफ से प्राप्त बड़ी राशि, प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना, आवास, सिंचाई और अन्य योजनाओं के माध्यम से केंद्र से संसाधन खींचना और उसके साथ राज्य की हिस्सेदारी को अनुपूरक बजट के जरिए सुनिश्चित करना—यह उस वित्तीय कारीगरी को दर्शाता है, जहाँ हर उपलब्ध अवसर को विकास में रूपांतरित करने का प्रयास दिखता है।
यही वह बिंदु है जहाँ यह अनुपूरक बजट “व्यवस्था परिवर्तन” की अवधारणा को मूर्त रूप देता दिखाई देता है। एक ओर 26000 करोड़ से अधिक की राशि वेतन, पेंशन और वित्तीय दायित्वों को संतुलित करने में लगाई गई है, तो दूसरी ओर ऊर्जा, स्वास्थ्य, सड़क, जलापूर्ति और सामाजिक सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में लक्षित निवेश यह संकेत देता है कि सरकार केवल तात्कालिक दबाव नहीं संभाल रही, बल्कि दीर्घकालिक संरचना को भी मजबूत कर रही है। विशेष केंद्रीय सहायता, आपदा राहत, और बुनियादी ढांचे में निवेश के माध्यम से यह स्पष्ट किया गया है कि वित्तीय विवेक केवल कटौती में नहीं, बल्कि सही स्थान पर निवेश करने की समझ में निहित होता है।

अंततः यह कहा जा सकता है कि यह अनुपूरक बजट संख्याओं का विस्तार भर नहीं, बल्कि एक ऐसी सोच का दस्तावेज है, जिसमें संकट को अवसर में बदलने की क्षमता दिखाई देती है। यहाँ संसाधनों की कमी बाधा नहीं बनती, बल्कि नीति-निर्माण की सूझबूझ और केंद्र-राज्य संबंधों के संतुलित उपयोग से विकास की नई संभावनाएँ गढ़ी जाती हैं—और यही इस पूरे वित्तीय प्रयास की सबसे बड़ी विशेषता बनकर उभरती है।