
हमीरपुर जिला — भौगोलिक संसाधनों की दृष्टि से भले ही यह जिला झीलों, औद्योगिक विस्तार या पर्यटन की चकाचौंध में अग्रिम पंक्ति में न दिखता हो, परंतु जज़्बे, शिक्षा और सैनिक परंपरा की बात हो तो यह प्रदेश ही नहीं, राष्ट्र के मानचित्र पर स्वर्णाक्षरों में अंकित है।
यह वह भूमि है जहाँ *असाध्य को साधना* जीवन का संस्कार है और -शून्य से शिखर तक पहुँचना- जुनून।
हिमाचल प्रदेश के इस छोटे से भू-भाग ने दशकों से एक अद्भुत परंपरा को जीवित रखा है। 40, 50, 60 और 70 के दशक में यदि किसी परिवार में पाँच बेटे होते थे तो तीन-चार का सेना में होना गौरव की बात थी। हर गाँव में दर्जनों सैनिक — यह यहाँ की सामान्य तस्वीर थी। देशसेवा यहाँ पेशा नहीं, विरासत रही है।
फिर समय ने करवट ली। 70 के दशक में शिक्षा की अलख जगी। हमीरपुर के शिक्षक पूरे प्रदेश में सम्मान के प्रतीक बने। उन्हीं शिक्षकों की संतानों ने नई दिशा पकड़ी — सेना में तो गए, पर इस बार अधिकारी बनकर। आज शायद ही कोई बड़ा या छोटा गाँव हो जहाँ भारतीय थल, जल, वायु सेना या अर्धसैनिक बलों में अधिकारी न हों।
और जब सेना ने महिलाओं के लिए अपने द्वार खोले, तो हमीरपुर की बेटियाँ पीछे क्यों रहतीं? हमीरपुर की बेटियों ने सिद्ध कर दिया कि पराक्रम में कोई भेद नहीं होता — बस मन में आग और लक्ष्य में विश्वास होना चाहिए।”
इसी गौरवगाथा में एक और स्वर्णिम अध्याय जुड़ा है — मोरसू सुल्तानी पंचायत के चुआण गाँव के निवासी शिवकुमार की सुपुत्री **दीपिका पटियाल**। उन्होंने मिलिट्री मेडिकल सेवाओं में लेफ्टिनेंट कर्नल के पद तक पहुँचकर न केवल अपने परिवार, बल्कि समूचे हमीरपुर को गौरवान्वित किया है।
शिलांग स्थित सैन्य अस्पताल में आयोजित गरिमामयी समारोह में जब उनके कंधों पर रैंक के सितारे सजे, तो वह केवल एक पदोन्नति नहीं थी — वह हमीरपुर की मिट्टी के तप, त्याग और तपस्या का सम्मान था। यह उपलब्धि भारतीय सेना की वर्दी में सेवा कर रही उन सभी बेटियों के लिए प्रेरणा है, जो अपने सपनों को राष्ट्रधर्म से जोड़ती हैं।
हमीरपुर की धरती भले ही फसलों की दृष्टि से अत्यधिक उर्वर न मानी जाए, पर यहाँ की मिट्टी और पानी अपने लोगों को अदम्य ऊर्जा देते हैं। यहाँ पसीना केवल श्रम नहीं, संकल्प बनकर बहता है।
दीपिका पटियाल की यह उपलब्धि उस ऐतिहासिक निरंतरता का प्रतीक है जिसमें एक पीढ़ी बंदूक उठाती है, दूसरी कलम, और तीसरी कंधों पर सितारे सजाकर नेतृत्व करती है।
यह केवल एक बेटी की सफलता नहीं — यह हमीरपुर की अस्मिता का उत्कर्ष है।
यह संदेश है कि संसाधनों की कमी कभी भी संकल्प की ऊँचाई को सीमित नहीं कर सकती।